भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 859

[ 1/24-32 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रचारकवर्ग—(1) गौड़मण्डलमें निजगणोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुका प्रचार :— नित्यानन्द-गोसाञिरे पाठाइल गौड़देशे। तेंहो गौड़देश भासाइल प्रेमरसे ॥ 24 ॥ कृष्णप्रेमकी बाढ़में गौड़देशका डूबना :— सहजेइ नित्यानन्द—कृष्णप्रेमोद्दाम। प्रभु-आज्ञाय कैल याहाँ ताहाँ प्रेमदान ॥ 25 ॥ श्रीनित्यानन्द-वन्दना और गुण-वर्णन :— ताँहार चरणे मोर कोटि नमस्कार। चैतन्येर प्रिय येहाँ लओयाइल संसार ॥ 26 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको नीलाचलसे गौड़देश (बङ्गाल) कृपा वितरणके लिये भेजा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने पूरे गौड़देशको श्रीकृष्णप्रेममें डुबो दिया। श्रीनित्यानन्द प्रभुमें स्वाभाविक रूपसे कृष्णप्रेम विराजमान है और महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने उसे जहाँ-तहाँ-सर्वत्र ही दान किया। उनके श्रीचरणोंमें मेरा करोड़ों बार नमस्कार है, उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभुकी भक्तिको लाकर सम्पूर्ण जगत्में वितरित किया है॥ 24-26 ॥ श्रीगौराङ्गके 'गौरवके भाई' और स्वयं प्रभु होनेपर भी श्रीनिताइका गौर-दासाभिमान :— चैतन्य-गोसाञि याँरे बोले 'बड़ भाई'। तेंहो कहे, मोर प्रभु—चैतन्य-गोसाञि ॥ 27 ॥ यद्यपि आपनि हुये प्रभु बलराम। तथापि चैतन्येर करे दास-अभिमान ॥ 28 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु उन्हें अपना बड़ा भाई कहते हैं, परन्तु वे चैतन्य महाप्रभुको अपना स्वामी कहते हैं। यद्यपि श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वयं बलराम हैं, तथापि सदा वे अपनेमें महाप्रभुका दास होनेका अभिमान रखते हैं॥ 27-28 ॥ अचित्की सेवा और भोग छोड़कर नित्य चिद्-ईश्वरकी सेवासे ही जीवको नित्य-आनन्दकी प्राप्ति :— 'चैतन्य' सेव, 'चैतन्य' गाओ, लओ 'चैतन्य'-नाम। 'चैतन्य' ये भक्ति करे, सेइ मोर प्राण ॥ 29 ॥ महापापी तक सभीको ही विभु चित्की सेवामें नियुक्त करना और उनका उद्धार :— एइ मत लोके चैतन्य-भक्ति लओयाइल। दीन-हीन, निन्दक, सबारे निस्तारिल ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु सभीसे यही भिक्षा करते हैं कि 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु' की सेवा करो, 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु' की लीलाओंका गान करो और 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु'के नामका जप करो। जो ऐसी 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु'की भक्ति करता है, उसे श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने प्राणोंके समान प्रिय मानते हैं। इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुने संसारमें श्रीचैतन्य-भक्तिका मुक्त-हस्तसे वितरण करके सभी दीन-हीन (भक्तिहीन) और निन्दक व्यक्तियोंका भी उद्धार किया॥ 29-30 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 6/50-51 संख्या देखें॥ 27-30 ॥ (2) माथुरमण्डलमें श्रीरूप-सनातनके द्वारा प्रचार :— तबे प्रभु व्रजे पाठाइल रूप-सनातन। प्रभु-आज्ञाय दुइ भाइ आइला वृन्दावन ॥ 31 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीको व्रजमें भेजा। महाप्रभुकी आज्ञासे दोनों भाई उनकी मनोभीष्ट सेवाके लिये वृन्दावनमें आकर वास करने लगे॥ 31 ॥ (क) शुद्धभक्ति प्रचार, (ख) लुप्ततीर्थ उद्धार, (ग) मठादि-स्थापनके द्वारा श्रीमूर्त्तिसेवा प्रचार :— भक्ति प्रचारिये सर्वतीर्थ प्रकाशिल। मदनगोपाल-गोविन्देर सेवा प्रचारिल ॥ 32 ॥ अनुवाद—उन्होंने व्रजमें श्रीकृष्ण-भक्तिका प्रचार किया, व्रजमें लुप्त श्रीकृष्ण लीला-स्थलियाँका जगत्में प्रकाश किया। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीमदनगोपाल और श्रीरूप गोस्वामीने श्रीगोविन्ददेवजीके विग्रहोंको प्रकट करके उनकी सेवा परिपाटीको जगत्में स्थापित किया॥ 32 ॥ अनुभाष्य—अप्राकृत सेवामें रत और संसारसे विरक्त शुद्ध श्रीकृष्णभक्त ही भक्तिका प्रचार कर सकते 6 |