भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 860, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 860

पहला अध्याय 1/32-36 ] हैं तथा उनके द्वारा ही तीर्थके स्वरूपका प्रकाश होता है। कृत्रिम भक्तवेशधारी बाउलिया तो स्वयं ही चरित्रहीन होते हैं और वे केवल अपनी इन्द्रियोंके भोगोंके लिये भक्तिके प्रचार कार्य और मन्दिरोंके निर्माणमें प्रवृत्त होते हैं, इसलिये उनके इन कार्योंसे वैकुण्ठ तीर्थ प्रकाशित नहीं होते। वह तो केवल मायाकी क्रीड़ामात्र है॥ 32 ॥ (घ) सात्वतशास्त्र-प्रचार, (ङ) अधम-तारण :- नाना शास्त्र आनि' कैला भक्तिग्रन्थ सार। मूढ़ अधमजनेरे तैं हो करिला निस्तार ॥ 33 ॥ सर्वशास्त्र-मीमांसा और अप्राकृत व्रज-रागभक्ति-प्रचार :- प्रभु-आज्ञाय कैल सब शास्त्रेर विचार। व्रजेर निगूढ़ भक्ति करिल प्रचार ॥ 34 ॥ अनुवाद-वे अनेक शास्त्रोंको व्रजमें लेकर आये और उनके सारको अपने व्रजकी प्रेमाभक्तिके प्रतिपादक ग्रन्थोंमें प्रकाश किया। इस प्रकार उन्होंने अज्ञानी और पतित जीवोंका उद्धार किया। महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने समस्त शास्त्रोंका विचार करके सर्वश्रेष्ठ और परम रहस्यमयी व्रजकी मधुर रसमयी भक्तिका प्रचार किया ॥ 34-35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'निगूढ़भक्ति'—पाठान्तरमें निगूढ़ रस ॥ 34 ॥ अनुभाष्य-प्राकृत सहजिया लोग शास्त्रविचारका त्याग करके कृत्रिम आँसू बहाकर भगवान्‌के लिये रोनेका नाटक करते हैं, जिस कारण सत्यस्वरूप (प्रेममयी) भगवत्सेवा उनके अश्रुओंमें बह जाती है। अर्थात् वे सेवाका त्याग करके केवल कृत्रिम भावोंके प्रदर्शनके द्वारा भक्त होनेका अभिनय करते हैं। इस प्रकार वे महाप्रभुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं। शास्त्रके सिद्धान्तोंको भली-भाँति समझनेवाले भक्तोंके द्वारा ही निगूढ़ व्रजसेवा प्रचारित होती है, अन्यथा इन्द्रिय-भोगके विचार आकर भक्तिसिद्धान्तोंको उलट देते हैं॥ 34 ॥ श्रीसनातन गोस्वामीके चार ग्रन्थ :- हरिभक्तिविलास, आर भागवतामृत। दशम-टिप्पनी, आर दशम-चरित ॥ 35 ॥ एइ सब ग्रन्थ कैल गोसाञि सनातन। रूपगोसाञि कैल यत, के करु गणन ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीहरिभक्तिविलास, बृहद्भागवतामृत, दशम-टिप्पनी और दशम-चरित आदि ग्रन्थोंकी रचना की। श्रीरूप गोस्वामीने जितने ग्रन्थोंकी रचना की, कौन उसकी गणना कर सकता है? ॥ 35-36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भागवतामृत' अर्थात् बृहद्भागवतामृत। 'दशम-टिप्पनी' अर्थात् दशम स्कन्धकी 'बृहद्-वैष्णवतोषणी' नामक टीका। 'दशम-चरित' अर्थात् दशम स्कन्धमें वर्णित श्रीकृष्णलीला-चरित (श्रीलीलास्तव) ॥ 34-36 ॥ अनुभाष्य- 'हरिभक्तिविलास'-श्रील सनातन गोस्वामी प्रभुके द्वारा रचित तथा श्रील गोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुके द्वारा सङ्कलित वैष्णव-स्मृतिग्रन्थ है, इसमें कुल बीस विलास हैं। पहले विलासमें-गुरु, शिष्य और मन्त्र; दूसरे विलासमें-दीक्षा; तीसरे विलासमें-सदाचार, स्मरण और शुचि (स्नान और सन्ध्या); चौथे विलासमें-संस्कार, तिलक, मुद्रा, माला और गुरुपूजा; पाँचवें विलासमें-आसन, प्राणायाम, न्यास, शालग्रामादि श्रीमूर्त्ति; छठे विलासमें-श्रीमूर्त्तिका आह्वान, स्नान कराना और आनुषङ्गिक आवश्यक कृत्य; सातवें विलासमें-श्रीविष्णुपूजा योग्य पुष्पोंका विवरण; आठवें विलासमें-श्रीमूर्तिके सम्मुख धूप, दीप, नैवेद्य, नृत्य, वाद्य, आरती, स्तुति, नमस्कार और अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना; नवें विलासमें-तुलसी, वैष्णव-श्राद्ध और नैवेद्य; दसवें विलासमें-भगवद्भक्त अथवा वैष्णव अथवा साधु; ग्यारहवें विलासमें-श्रीमूर्त्तिका अर्चन, श्रीहरिनाम, श्रीनामका जप और कीर्तन, नामापराध और उनका मोचन, भक्तिका माहात्म्य और शरणागति; बारहवें विलासमें-एकादशी-विधि; तेरहवें विलासमें-उपवास, महाद्वादशी-व्रत; चौदहवें विलासमें-विभिन्न मासोंमें किये । 7