भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 861

[ 1/35-39 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

जानेवाले अनेकानेक कृत्य; पन्द्रहवें विलासमें-निर्जला एकादशी, तप्तमुद्रा-धारण, चातुर्मास्य, जन्माष्टमी, पार्श्व एकादशी, श्रवणाद्वादशी, रामनवमी, विजयादशमी; सोलहवें विलासमें-कार्तिक मासके कृत्य अथवा दामोदर (ऊर्जा) व्रत, दीपदानादि, गोवर्धन-पूजा, रथयात्रा; सत्तरहवें विलासमें-पुरश्चरण, जप और माला; अठारहवें विलासमें-विष्णुकी श्रीमूर्तिके विभिन्न प्रकार; उन्नीसवें विलासमें-श्रीमूर्तिकी प्रतिष्ठा करना तथा उनको स्नानादि कराना; बीसवें विलासमें-श्रीमन्दिर-निर्माणादि और ऐकान्तिक भक्तोंके कृत्य वर्णित हैं। मध्यलीला 24/325-341 संख्या देखें। 'हरिभक्तिविलास' ग्रन्थके कुछ अंश जिनका श्रीमद् गोपालभट्ट गोस्वामीने सङ्कलन किया था, उसका विवरण श्रील कविराज गोस्वामीने मध्यलीलाके चौबीसवें अध्यायमें लिखा है। श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके द्वारा सङ्कलित ग्रन्थमें अब वैष्णवस्मृतिका पूर्ण विकास लक्षित नहीं होता। श्रीगौरसुन्दरके आदेशानुसार श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा किये गये विपुल स्मृति-संग्रहके तात्कालोचित आंशिक विषयसमूह ही इस ग्रन्थमें प्रकाशित हुए हैं। वैष्णवस्मृति-कल्पद्रुमके अथवा श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा सङ्कलित पूर्ण श्रीहरिभक्तिविलासके प्रकाशित होनेसे ही वैष्णवसमाजमें सभी व्यवहारिक अभाव दूर होंगे। श्रीहरिभक्तिविलासमेंसे श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुने 'भक्तिविलास'-ग्रन्थ संक्षिप्त रूपमें लिखा था और उस समय स्मार्त्तकुलका अधिक प्रभाव होनेके कारण इस भक्तिविलास-ग्रन्थके द्वारा सभी व्यवहारिक कार्योंकी मीमांसा प्राप्त नहीं होती। श्रीसनातन गोस्वामीने स्वसङ्कलित श्रीहरिभक्तिविलासकी 'दिग्दर्शिनी' नामक टीका भी स्वयं ही लिखी थी, इस टीकाके कुछ अंश वर्तमानकालके भक्तिविलास-ग्रन्थमें टीकारूपमें प्रकाशित हुए हैं, परन्तु कोई-कोई श्रीगोपीनाथ पूजाधिकारीके द्वारा सङ्कलित 'दिग्दर्शनी' कहकर उसका प्रचार करते हैं। ये श्रीगोपीनाथ वृन्दावनमें श्रीराधारमणजीकी सेवामें रत श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुके एक शिष्य हैं।

'बृहद्भागवतामृत'-यह दो खण्डोंमें विभाजित भगवद्भक्तिसिद्धान्तपूर्ण ग्रन्थ है। पहले खण्डका नाम- 'भगवत्कृपाभरनिर्द्धार' है; इसमें भौम, दिव्य, ब्रह्मलोक और वैकुण्ठ, भक्त, प्रिय, प्रियतम और पूर्ण-ये सात अध्याय हैं। दूसरे खण्डका नाम 'गोलोक-माहात्म्यनिरूपण' है; इसमें वैराग्य, ज्ञान, भजन, वैकुण्ठ, प्रेम, अभीष्टलाभ और जगदानन्द-ये सात अध्याय हैं; कुल चौदह अध्यायोंमें ग्रन्थ सम्पूर्ण होता है। 'दशम-टिप्पनी'-यह श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धकी टीका है, जो 'बृहद्वैष्णवतोषणी'के नामसे प्रसिद्ध है। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया है- "चौदह सौ छहत्तर (1476) शकाब्द (1554 ईसवी) में 'बृहत्' (वैष्णवतोषणी) सम्पूर्ण हुई। पन्द्रह सौ चार (1504) शकाब्द (1582 ईसवी) में लघु (तोषणी) पूर्ण हुई। आदिलीला 10/84 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 35-36 ॥ श्रीरूपके अनेक ग्रन्थ मधुरसेवा-विषयक :- प्रधान प्रधान किछु करिये गणन। लक्ष ग्रन्थे कैल व्रजविलास वर्णन ॥ 37 ॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीके कुछ मुख्य-मुख्य ग्रन्थोंकी गणना करूँगा, उन्होंने लाखों श्लोकोंमें व्रजविलासका वर्णन किया है ॥ 37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ग्रन्थ'-अनुष्टुप्। (एक श्लोक परिमाणमें शब्द-संख्या) ॥ 37 ॥ अनुभाष्य-'ग्रन्थ'-अनुष्टुप। ग्रन्थका तात्पर्य यहाँ पुस्तकसे नहीं है। एक श्लोकके चार पाद अथवा चार ग्रन्थ-इस प्रकार समझना चाहिये। गद्य-ग्रन्थका अर्थ भी इसी प्रकारसे ही है॥ 37 ॥ श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा विरचित ग्रन्थ :- रसामृतसिन्धु, आर विदग्धमाधव। उज्ज्वलनीलमणि, आर ललितमाधव ॥ 38 ॥ दानकेलिकौमुदी, आर बहु स्तवावली। अष्टादश लीलाछन्द, आर पद्यावली ॥ 39 ॥

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