भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 862

पहला अध्याय 1/38–41 ] गोविन्द-विरुदावली, ताहार लक्षण। मथुरा-माहात्म्य, आर नाटक-वर्णन ॥ 40 ॥ लघुभागवतामृतादि के करु गणन। सर्वत्र करिल व्रजविलास वर्णन ॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके प्रमुख ग्रन्थ हैं- श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु, विदग्धमाधव, ललितमाधव, उज्ज्वलनीलमणि, दानकेलिकौमुदी, अठारह लीलाछन्द, पद्यावली, बहु-स्तवावली अर्थात् स्तवमाला, गोविन्द-विरुदावली और उसके लक्षण, मथुरा-माहात्म्य और नाटक-वर्णन। इसके अतिरिक्त लघुभागवतामृतादि अन्य ग्रन्थोंकी कौन गणना कर सकता है? उन्होंने सभी ग्रन्थोंमें व्रजकी लीलाओंका वर्णन किया है॥ 38-41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘बहु-स्तवावली’ अर्थात् ‘स्तवमाला’ ग्रन्थ। ‘गोविन्दविरुदावली’—यह स्तवमालाके अन्तर्गत ही है। ‘नाटक-वर्णन’—नाटकचन्द्रिका ॥ 38-40 ॥ अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें वर्णन है कि श्रीलरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की। आदिलीला 10/84 संख्या देखें। ‘श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु’—यह श्रीकृष्णभक्ति और भक्तिरस-सम्बन्धी संग्रह ग्रन्थ है। इस ग्रन्थकी रचना 1463 शकाब्दमें हुई। इसमें पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर—ये चार विभाग हैं। पूर्व विभागका नाम— ‘स्थायिभावोत्पादन’ है; इसमें सामान्यभक्ति, साधनभक्ति, भावभक्ति और प्रेमभक्ति—ये चार लहरियाँ हैं। दक्षिण विभागका नाम—‘भक्तिरस-सामान्य-निरूपण’ है; इसमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी और स्थायीभाव—ये पाँच लहरियाँ हैं। पश्चिम विभागका नाम— ‘मुख्यभक्तिरस-निरूपण’ है; इसमें शान्त, प्रीतिभक्तिरस अथवा दास्य, प्रेयोभक्तिरस अथवा सख्य, वात्सल्यभक्तिरस, और मधुरभक्तिरस—ये पाँच लहरियाँ हैं। उत्तर विभागका नाम—‘गौणभक्तिरसादि-निरूपण’ है; इसमें हास्य-भक्तिरस, अद्भुत-भक्तिरस, वीर-भक्तिरस, करुण-भक्तिरस, रौद्र-भक्तिरस, भयानक-भक्तिरस, वीभत्स-भक्तिरस, रसोंकी मैत्री-वैर-स्थिति और रसाभास—ये नौ लहरियाँ वर्तमान हैं। ‘विदग्धमाधव’—यह श्रीकृष्णकी व्रजलीला विषयक नाटक ग्रन्थ है। 1454 शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना हुई थी। इस नाटकमें सात अङ्क हैं। पहले अङ्कका नाम—वेणुनादविलास; दूसरे अङ्कका नाम—मन्मथलेख; तीसरे अङ्कका नाम—राधासङ्ग; चौथे अङ्कका नाम—वेणुहरण; पाँचवें अङ्कका नाम—राधाप्रसादन; छठे अङ्कका नाम—शरद्-विहार; सातवें अङ्कका नाम—गौरीविहार है। ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’—यह अप्राकृत मधुर-व्रजरस- विषयक अलङ्कार ग्रन्थ है। इसके द्वितीय श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामी लिखते हैं— मुख्यरसेषु पुरा यः संक्षेपेणोदितोऽति रहस्यत्वात्। पृथगेव भक्तिरसराट् सविस्तारेणोच्यतेऽत्र मधुरः ॥ अर्थात् ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ ग्रन्थमें शान्तादि मुख्यरससमूहमें अति रहस्यमय मधुररसका संक्षेपमें ही वर्णन किया था। श्रीउज्ज्वलनीलमणि ग्रन्थमें पृथक् रूपसे केवल इस भक्तिरसराज मधुररसका ही वर्णन है। इसमें नायकभेद, सहायभेद, कृष्णवल्लभा, श्रीराधिका, नायिकाभेद, यूथेश्वरीभेद, दूतीभेद, सखी, हरिवल्लभा, उद्दीपन, अनुभाव, उद्भास्वर, सात्त्विक एवं व्यभिचारीभाव, स्थायीभाव, शृङ्गारभेदके अन्तर्गत विप्रलम्भ, पूर्वराग, मान, प्रेमवैचित्त्य, प्रवास, संयोगवियोगस्थिति, सम्भोग (मुख्य और गौण) आदि विषयोंका वर्णन है। ‘ललितमाधव’—यह श्रीकृष्णकी द्वारकालीला विषयक नाटकग्रन्थ है। 1459 शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना हुई। इस नाटकमें दस अङ्क हैं। पहले अङ्कका नाम—सायं उत्सव; दूसरे अङ्कका नाम—शङ्खचूड़ वध; तीसरे अङ्कका नाम—उन्मत्ता राधिका; चौथे अङ्कका नाम—राधिकाभिसार; पाँचवें अङ्कका नाम—चन्द्रावलीलाभ; छठे अङ्कका नाम—ललिता-प्राप्ति; सातवें अङ्कका नाम—नववृन्दावन-सङ्गम; आठवें अङ्कका नाम— नववृन्दावन-विहार; नौवें अङ्कका नाम—चित्रदर्शन; दसवें अङ्कका नाम—पूर्णमनोरथ है। । 9