भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 863, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 863

[ 1/38-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'लघुभागवतामृत'—यह ग्रन्थ कृष्णामृत और भक्तामृत—दो खण्डोंमें विभक्त है। प्रथम खण्डमें— शब्द-प्रमाणकी श्रेष्ठता, तत्पश्चात् सर्वप्रथम स्वयंरूप श्रीकृष्ण, उनके विलास स्वांश और आवेश भेदसे तदेकात्मरूप, तीन पुरुषावतार, तीन गुणावतारोंमें विष्णु और विष्णुभक्तिकी निर्गुणता, पच्चीस लीलावतार (चतुःसन, नारद, वराह, मत्स्य, यज्ञ, नरनारायण ऋषि, सेश्वर, कपिल, दत्तात्रेय, हयग्रीव, हंस, पृश्निगर्भ, ऋषभ, पृथु, नृसिंह, कूर्म, धन्वन्तरि, मोहिनी, वामन, परशुराम, दाशरथि रामचन्द्र, कृष्णद्वैपायन, बलराम अथवा शेष सङ्कर्षण, वासुदेव, बुद्ध और कल्कि); चौदह मन्वन्तरावतार (यज्ञ, विभु, सत्यसेन, हरि, वैकुण्ठ, अजित, वामन, सार्वभौम, ऋषभ, विष्वक्सेन, धर्मसेतु, सुदामा, योगेश्वर और बृहद्भानु); चार प्रकारके युगावतार (शुक्ल, रक्त, श्याम और कृष्णवर्ण); विभिन्न कल्प और उनके अवतारसमूह तथा “आवेश, प्राभव, वैभव और पर”—ये चार अवस्थामें अवस्थित अवतार-विचार। लीलाभेदसे भगवन्नाम-महिमा-वैचित्र्य, शक्ति और शक्तिमान् विचार, भगवत्ताके परस्पर-विरुद्ध गुणसमूहका अचिन्त्य समन्वय; श्रीकृष्णकी स्वयं भगवत्ता, वे सबसे श्रेष्ठ हैं, वे सभी अवतारोंके अवतारी हैं, सभी अवतार उनके अंश हैं, वे सर्वेश्वर हैं, निर्विशेष-ब्रह्म श्रीकृष्णकी अङ्गप्रभामात्र है, श्रीकृष्णकी द्विभुज-नरलीलाका माधुर्य असमोध्र्व है, अप्राकृत वैकुण्ठवस्तुके देह और देहीमें भेद नहीं है, श्रीकृष्ण अजन्मा हैं और अनादिकालसे उनका आविर्भाव होता आ रहा है—ये परस्पर विरोधी दिखनेपर भी इनमें कोई विरोध नहीं है; लीलाकी नित्यता, प्रकट और अप्रकट भेदसे दो प्रकारकी लीला, प्रकटलीलाका रस-वैचित्र्य, व्रज, मथुरा और द्वारका लीलाकी नित्यता, विभिन्न धामतत्त्व और माहात्म्य-विचार, 'बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन'-भेदसे आयु-भेदका माधुर्य-वैचित्र्य एवं चार विशेष माधुरियाँ (ऐश्वर्य, क्रीड़ा, वेणु और श्रीविग्रह) आदि विषयोंका वर्णन हुआ है। द्वितीय खण्डमें—भक्तके द्वारा पूजाका प्रयोजन, भजनके तारतम्यसे भक्तोंका तारतम्य; प्रह्लाद, पाण्डवों, यादवों, उद्धव और व्रजगोपियों एवं सर्वापेक्षा श्रीमती राधिका और राधाकुण्डके माहात्म्यका वर्णन हुआ है॥38-41॥ श्रीजीव गोस्वामी :- ताँर भ्रातृपुत्र नाम-श्रीजीवगोसाञि। यत भक्तिग्रन्थ कैल, तार अन्त नाइ॥ 42 ॥ श्रीभागवतसन्दर्भ-नाम ग्रन्थ-विस्तार। भक्तिसिद्धान्त ताते लिखियाछेन सार॥ 43 ॥ गोपालचम्पू-नामे ग्रन्थ महाशूर। नित्यलीला स्थापन याहे व्रजरस-पूर॥ 44 ॥ ग्रन्थकी रचना और सपरिवार वृन्दावन वास :- एइ मत नाना ग्रन्थ करिया प्रकाश। गोष्ठी सहिते कैला वृन्दावने वास॥ 45 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन और श्रीरूप गोस्वामीके भतीजे श्रीजीव गोस्वामी हैं और उन्होंने जितने भक्तिग्रन्थ लिखे हैं, उसका कोई अन्त नहीं है। श्रीभागवतसन्दर्भ नामक ग्रन्थमें उन्होंने भक्ति-सिद्धान्तका सार लिखा है। गोपालचम्पू तो उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति है, जिसमें उन्होंने श्रीकृष्णकी व्रजमें माधुर्य-प्रधान (पारकीय रसकी) नित्यलीलाका निरूपण किया है। इस प्रकार अपने परिवार (श्रीरूप और सनातन गोस्वामी)के साथ वृन्दावनमें वास करते हुए उन्होंने अनेक ग्रन्थोंका प्रकाश किया॥ 42-45 ॥ अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया है— श्रीमद्भागवत-अर्थ यैछे आस्वादिल। ताहा श्रीवैष्णवतोषणीते प्रकाशिल॥ 535 ॥” × × × “हेन सनातन-रूप प्रभुर आज्ञाते। वर्णिल यतेक ताहा व्यापिल जगते॥ 790 ॥ श्रीरूप श्रीहंसदूत-आदि ग्रन्थ कैला। सनातन भागवतामृतादि वर्णिला॥ 791 ॥ श्रीवैष्णव-तोषणी करिया सनातन। 10 ।