भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 864

पहला अध्याय 1/42–45 ]

श्रीजीवेरे आज्ञा दिला करिते शोधन॥ 792 ॥ आज्ञा पाइया श्रीजीव लघूतोषणी करिला। यैछे करिलेन ताहा तथाइ लिखिला॥ 793 ॥ चौद्दशत सप्तछये (1476) सम्पूर्ण 'बृहत्'। पनरशत चारि (1504) शके 'लघु' सुसम्मत॥ 794 ॥ तथाहि लघु-तोषण्याम्— “तयोरनुजसृष्टेषु काव्यं श्रीहंसदूतकम्। श्रीमदुद्धवसन्देशश्छन्दोऽष्टादशकं तथा॥ 796 ॥ स्तवस्योत्कलिकावल्ली गोविन्दविरुदावली। प्रेमेन्दुसागराद्याश्च बहवः सुप्रतिष्ठिताः॥ 797 ॥ विदग्ध-ललिताग्र-माधवं नाटकद्वयम्। भाणिका दानकेल्याख्या रसामृतयुगं पुनः॥ 798 ॥ मधुरामहिमा पद्यावली नाटकचन्द्रिका। संक्षिप्त-श्रीभागवतामृतमेते च संग्रहाः॥ 799 ॥ तथाग्रजकृतेष्वग्रं श्रील-भागवतामृतम्। हरिभक्तिविलासश्च तट्टीका दिक्प्रदर्शिनी॥ 800 ॥ लीलास्तवटिप्पनी च सेयं वैष्णवतोषणी। या संक्षिप्ता मया क्षुद्रजीवेनापि तदाज्ञया॥ 801 ॥ शके षट्सप्ततिमन्नौ पूर्णेयं टिप्पणी शुभा। संक्षिप्ता युगशून्याग्रपञ्चैकगणिते तथा॥ 803 ॥” श्रीजीवेर शिष्य कृष्णदास अधिकारी। तिँह निज-ग्रन्थे इहा कहिल विस्तारि'॥ 805 ॥ “तयोर्येष्ठस्य कृतिषु श्रीसनातननामिनः। सिद्धान्तग्रन्थसन्दोहाल्लेखोल्लेखो विधीयते॥ 809 ॥ प्रथमादिद्वयं खण्डयुग्मं भागवतामृतम्। हरिभक्तिविलासश्च तट्टीका-दिक्प्रदर्शिनी। लीलास्तव-टिप्पनी च नाम्ना वैष्णवतोषणी॥ 810 ॥ तयोरनुजसृष्टेषु काव्यं श्रीहंसदूतकम्। श्रीमदुद्धवसन्देशः कृष्णजन्मतिथेर्विधिः॥ 822 ॥ बृहल्लघुतया ख्याता श्रीगणोद्देशदीपिका। श्रीकृष्णस्य प्रियाणाञ्च स्तवमाला मनोहरा॥ 823 ॥ विदग्धमाधवः ख्यातस्तथा ललितमाधवः। दानलीलाकौमुदी च तथा भक्तिरसामृतम्॥ 824 ॥ उज्ज्वलाख्यो नीलमणिः प्रयुक्ताख्यातचन्द्रिका। मधुरामहिमा पद्यावली नाटकचन्द्रिका॥ 825 ॥ संक्षिप्त-श्रीभागवतामृतमेते च संग्रहाः 1826 (क)। श्रीमद्वल्लभपुत्र-श्रीजीवस्य कृतिषूच्यते। शब्दानुशासनं नाम्ना हरिनामामृतं तथा॥ 843 ॥ तत्सूत्रमालिका तत्र प्रयुक्तो धातुसंग्रहः। कृष्णार्थादीपिका सूक्ष्मा गोपालविरुदावली॥ 844 ॥ रसामृतस्य शेषश्च श्रीमाधवमहोत्सवः। सङ्कल्प-कल्पवृक्षो यश्चम्पूभावार्थसूचकः॥ 845 ॥ टीका गोपालतापन्याः संहितायाश्च ब्रह्मणः। रसामृतस्योज्ज्वलस्य योगसार-स्तवस्य च॥ 846 ॥ तथा चाग्निपुराणस्थ-गायत्रीविवृतिरपि। श्रीकृष्णपदचिह्नानां पाद्मोक्तानामथापि च॥ 847 ॥ लक्ष्मीविशेषरूपा या श्रीमद्वृन्दावनेश्वरी। तस्याः करपदस्थानां चिह्नानाञ्च समाहतिः॥ 848 ॥ पूर्वोत्तरतया चम्पूद्वयी या च त्रयी त्रयी। सन्दर्भाः सप्तविख्याताः श्रीमद्भागवतस्य वै॥ 849 ॥ तत्त्वाख्यो भगवत्संज्ञः परमात्मारव्य एव च। कृष्णभक्तिप्रीतिसंज्ञाः क्रमाख्यः सप्तमः स्मृतः॥ 850 ॥ सम्बन्धश्चाभिधेयश्च प्रयोजनमिति त्रयम्। हस्तामलकवद् येषु सद्भिराधैः प्रकाशितम्॥ 851 ॥”

अर्थात् “श्रीमद्भागवतका अर्थ जिस रूपमें श्रीसनातन गोस्वामीने आस्वादन किया, उसे उन्होंने अपने द्वारा रचित श्रीवैष्णवतोषणी-टीकामें प्रकाशित किया। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीसनातन और श्रीरूप गोस्वामीने अपने ग्रन्थोंमें जितना वर्णन किया, वह समस्त जगत्में व्याप्त हुआ। श्रीरूप गोस्वामीने हंसदूतादि ग्रन्थोंकी रचना की। श्रीसनातन गोस्वामीने भागवतामृतादिकी रचना की। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीवैष्णवतोषणीकी रचना करके श्रीजीव गोस्वामीको उसका संशोधन करनेकी आज्ञा दी। आज्ञा प्राप्त करके श्रीजीवने वैष्णवतोषणीके अनुरूप ही लघुतोषणीकी रचना की। 1476 शकाब्दमें बृहद्-वैष्णवतोषणी सम्पूर्ण हुई और 1504 शकाब्दमें लघुतोषणी पूर्ण हुई, यह सर्वसम्मत है। श्रीसनातन गोस्वामीके छोटे भाई श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा लिखित श्रीहंसदूत काव्य, श्रीमद्-उद्धवसन्देश, छन्दोऽष्टादशक ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। (इनके अतिरिक्त) उनके स्तवमाला, गोविन्दविरुदावली, प्रेमेन्दुसागरादि बहुत सुप्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। (इन सबके अतिरिक्त) ललितमाधव और विदग्धमाधव नामसे दो नाटक, दानकेली-नाटिका, रसामृत-युगल, मधुरामहिमा, नाटक-चन्द्रिका तथा संक्षिप्त (लघु) श्रीभगवतामृत आदि संग्रह ग्रन्थ हैं।

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