श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 1/35-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीरूपके बड़े भाई श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा लिखित ग्रन्थोंमें पहले श्रीभागवतामृत, उसके बाद दिग्दर्शिनी-टीका सहित हरिभक्तिविलास, उसके बाद लीलास्तव और अनन्तर यह दशमटिप्पनी वैष्णवतोषणी उनकी आज्ञासे क्षुद्रजीव होनेपर भी मेरे (जीव गोस्वामीके) द्वारा संक्षिप्त रूपमें लिखी गयी है। 1476 शकाब्दमें यह मङ्गल प्रदान करनेवाली वैष्णवतोषणी टिप्पणी पूर्ण हुई। और 1504 शकाब्दमें लघुतोषणी समाप्त हुई। श्रीजीव गोस्वामीके प्रिय शिष्य श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी हैं, जिन्होंने अपने ग्रन्थमें इस विषयमें विस्तारसे लिखा है। श्रीसनातन गोस्वामी, जो ज्येष्ठ भ्राता हैं, उनके द्वारा रचित सिद्धान्तग्रन्थ-समूहसे उनके द्वारा रचित ग्रन्थमालाका नाम उल्लेख कर रहा हूँ। श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके द्वारा लिखित ग्रन्थ ये हैं—प्रथम और द्वितीय खण्डयुक्त भागवतामृत, हरिभक्तिविलास, उसकी दिग्दर्शिनी टीका, लीलास्तव और वैष्णवतोषणी नामक टिप्पणी। श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा प्रणीत कुछ विशिष्ट ग्रन्थोंके नाम—श्रीहंसदूत काव्य, श्रीमद्-उद्धवसन्देश, श्रीकृष्णजन्मतिथि-विधि, श्रीबृहद्-गणोद्देशदीपिका, श्रीलघुगणोद्देशदीपिका, श्रीकृष्ण और उनके प्रिय गणोंकी मनोहर स्तवमाला, प्रसिद्ध विदग्धमाधव और ललितमाधव, दानलीलाकौमुदी, भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि, प्रयुक्ताख्यातचन्द्रिका, मथुरा-महिमा, पद्यावली, नाटकचन्द्रिका तथा लघुभागवतामृत आदि संग्रह ग्रन्थ। श्रीवल्लभके पुत्र श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा रचित ग्रन्थोंमें कुछके नाम इस प्रकार हैं—श्रीहरिनाममृत नामक व्याकरण, उसकी सूत्रमालिका, उसके साथ धातुसंग्रह, अल्प आकारमें कृष्ण-अर्चन-दीपिका, गोपालविरुदावली रसामृतका शेष अंश, श्रीमाधवमहोत्सव, सङ्कल्प-कल्पवृक्ष, भावार्थसूचक-चम्पू, गोपालतापनी-टीका, ब्रह्मसंहिता-टीका, भक्तिरसामृतसिन्धुकी टीका, उज्ज्वलनीलमणिकी टीका, योगसार-स्तवकी टीका, अग्निपुराणमें वर्णित गायत्रीकी विवृति, पद्मपुराणमें उक्त श्रीकृष्णपदचिह्नकी विवृति, मूललक्ष्मीरूपा श्रीवृन्दावनेश्वरी श्रीराधिकाके हस्त-पदके चिह्नसमूहका संग्रह, गोपालचम्पू- पूर्वभाग, गोपालचम्पू-उत्तरभाग। श्रीमद्भागवतके विख्यात सात सन्दर्भ, जैसे—तत्त्वसन्दर्भ, भगवत्सन्दर्भ, परमात्म-सन्दर्भ, कृष्णसन्दर्भ, भक्तिसन्दर्भ, प्रीतिसन्दर्भ और क्रमसन्दर्भ—जिनके द्वारा श्रेष्ठ महाजन श्रीजीव गोस्वामीने सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन, इन तीनों तत्त्वोंको हथेलीमें रखे आँवलेके समान सहज ही समझ आनेवाले रूपमें प्रकाशित किया है।” 'भागवतसन्दर्भ'—इसका दूसरा नाम 'षट्सन्दर्भ' है। प्रथम 'तत्त्वसन्दर्भ' में—सभी प्रमाणोंकी अपेक्षा श्रीमद्भागवतकी श्रेष्ठता और तत्त्व-निरूपण। द्वितीय 'भगवत्-सन्दर्भ' में—ब्रह्म-परमात्माका विचार, वैकुण्ठ और विशुद्धसत्त्वका निरूपण, भगवद्-स्वरूपका स्वशक्तित्व, श्रीभगवान् विरुद्ध शक्तियोंके आश्रय, उनमें अचिन्त्य शक्ति है और यह अनेक प्रकारकी है; अन्तरङ्गादि भेद, मायाशक्ति, स्वरूपशक्तिके गुण स्वरूपभूत हैं, भगवान्का श्रीविग्रह नित्य है, उनकी विभुता, सर्वाश्रयता, स्थूल-सूक्ष्मसे पृथक्ता, उनका स्वप्रकाशत्व, रूप-गुण- लीलामयत्व, अप्राकृतत्व, पूर्ण स्वरूपत्व; परिकर-समूहका स्वरूपांशत्व; वैकुण्ठ, पार्षद और त्रिपादविभूतिका अप्राकृतत्व, ब्रह्म और भगवान्का तारतम्य, भगवत्तामें पूर्णत्व, सभी वेदोंका अभिधेयत्व, स्वरूप शक्तिका विवरण, श्रीभगवान् एकमात्र भक्ति-ग्राह्य। तृतीय 'परमात्म-सन्दर्भ' में—परमात्मा, उनके भेद, गुणावतारोंका तारतम्य, जीव, माया, जगत्, परिणामवाद-स्थापन, विवर्त्त-समाधान, जगत् और परमात्माका अनन्यत्व, जगत्की सत्यता और श्रीधर स्वामीका मत, निर्गुण ईश्वरकी कर्तृत्व-योजना, लीलावतार-समूहकी भक्तोंके उद्देश्यसे प्रवृत्ति, छह प्रकारके चिह्नोंके (लक्षणोंके) द्वारा भगवान्का ही तात्पर्यत्व। चतुर्थ 'कृष्ण सन्दर्भ' में—कृष्णकी स्वयं भगवत्ता, कृष्ण-लीलागुण, पुरुषावतारोंका कर्तृत्व, श्रीधर स्वामीकी सम्मति, सभी शास्त्रोंमें कृष्ण-समन्वय,
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