श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 866, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय [1/35–45]
बलदेव आदिका महासङ्कर्षणत्व, कृष्णमें सभी अंशोंके प्रवेशका विचार और उनमें नित्यस्थिति, द्विभुजत्व, गोलोक-निरूपण, वृन्दावनादि कृष्णके नित्यधाम, गोलोक और वृन्दावन एक ही वस्तु, यादव और गोप कृष्णके नित्य परिकर, प्रकट-अप्रकट लीलाकी व्यवस्था, प्रकट-अप्रकट लीलाका समन्वय, श्रीकृष्णका गोकुलमें सर्वाधिक प्रकाश, पट्टमहिषियोंका स्वरूप-शक्तित्व, उनकी अपेक्षा गोपियोंका उत्कर्ष, उनके नाम और राधिकाकी सर्वोत्कर्षता। पञ्चम 'भक्ति-सन्दर्भ' में-भगवद्भक्ति साक्षात् अभिधेय तत्त्व, अन्वय और व्यतिरेक भावसे भक्तितत्त्वका निरूपण, सर्वशास्त्र-श्रवण, वर्णाश्रम आचार और उसके अन्तर्भुक्त ज्ञानके द्वारा अन्वय भावसे कर्मका अनादर, हरिविमुख ब्राह्मणकी निन्दा, भगवदर्पित कर्मका अनादर, योगका अनादर, ज्ञानके श्रमत्व-प्रदर्शनसे और अन्याश्रयोंकी (अन्य देवी-देवताओंकी) स्वतन्त्रताके अनादरके द्वारा उन देवी-देवताओंका भगवान्के भक्तरूपमें आदर-विधान, अभक्तमात्रका अनादर, जीवन्मुक्त और परम मुक्त शिवादि तक भक्तोंकी भक्तिकी नित्यता और अभिधेयत्व, भक्तिमें सर्वफल देनेकी योग्यता, निर्गुणता, स्व-प्रकाशता और परमसुखरूपता, भगवत्-प्रीति हेतु वैशिष्ट्य, भजनाभाससे भी फललाभ, निष्काम भक्तिकी प्रशंसा, अधिकारी-भेदसे पुनः निष्काम-भक्तिकी स्थापना, साधुसङ्गका मूल कारण, महाभागवतोंमें भेद और विशेषता, सर्वाश्रय-विवेक, भक्ति-भेद-निरूपणमें ज्ञानका लक्षण, अहंग्रहोपासनाका लक्षण, भक्ति-लक्षण, आरोपसिद्धा आदिके लक्षण, वैधीभक्तिमें शरणागति, गुरुसेवा, महाभागवत-प्रसङ्ग, उनकी परिचर्या, साधारण वैष्णवसेवा; श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, अपराध और उनको दूर करनेके उपाय, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन; रागानुगा भक्तिका विचार, कृष्ण-भजनका वैशिष्ट्य और सिद्धिका क्रम। छठे 'प्रीति-सन्दर्भ' में-प्रीतिका परम पुरुषार्थ निरूपण, मुक्तिमें सविशेष और निर्विशेष भेद, जीवन्मुक्ति (शरीर रहते हुए मुक्ति) और उत्क्रान्त (देहत्यागके बाद) मुक्तिमें भेद, सभी प्रकारकी मुक्तियोंकी अपेक्षा भगवत्-प्रीतिका आधिक्य, परतत्त्वके साक्षात्कारसे परम-पुरुषार्थकी प्राप्ति, सद्यो-मुक्ति, क्रम-मुक्ति, ब्रह्मसाक्षात्कार और भगवत्-साक्षात्कार- लक्षणारूपा जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्त मुक्ति। अन्तर और बाहरके भेदसे भगवत्-साक्षात्कारके लक्षणोंके दो प्रकार, ब्रह्मसाक्षात्कार-लक्षणाकी अपेक्षा श्रेष्ठत्व, बाहरी साक्षात्कार लक्षणा जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्त मुक्ति, सालोक्यादि भेद, सामीप्यका आधिक्य, भक्तिका मुक्तित्व और उपादेयत्व; उसकी उपपत्ति, प्रीतिका स्वरूप-लक्षण, गुणातीत प्रीतिका तटस्थ लक्षण और आविर्भाव-भेद, प्रीति-रति आदिका भेद, व्रजदेवियोंके कामका शुद्धप्रेमके रूपमें स्थापन, ज्ञान-भक्ति आदिका मिश्रत्व, परिकर अभिमानी गणोंकी प्रीतिका उत्कर्ष, ऐश्वर्य और माधुर्यके अनुभवका तारतम्य, गोकुलवासियोंकी श्रेष्ठता, उनकी अपेक्षा सखाओं, पितृगणों, गोपियों और राधिकाका उत्तरोत्तर श्रेष्ठत्व, अनुकरण-कार्यमें रसत्व, लौकिक रसकी अपेक्षा श्रेष्ठता, आलम्बन-विभाग, उद्दीपन-विभाग, गुण, धीरोदात्तादि भेद, माधुर्यकी उत्तमता, अनुभाव, सञ्चारी, रसके पाँच प्रकार, गौणरसके सात प्रकार; रसाभास, शान्त, दास्य, प्रश्रय (सख्य), वात्सल्य और उज्ज्वलमें वल्लभभेद, स्थायी, सम्भोग और विप्रलम्भ-भेद, पूर्वराग, मान, प्रेमवैचित्त्य, प्रवास और श्रीराधिका देवीकी महिमा। गोपालचम्पूके दो विभाग हैं—पूर्व और उत्तर। पूर्वचम्पूमें तैंतीस पूरण और उत्तरचम्पूमें सैंतीस पूरण हैं। पूर्वचम्पू 1510 शकाब्द (1588 ईसवी) में सम्पूर्ण हुआ। पूर्व चम्पूके पूर्व विभागके 33 पूरण-1) वृन्दावन और गोलोक, 2) प्रस्तावना, पूतनावध लीला वर्णन, यशोदाके आदेशसे गोपियोंका गृह-गमन, राम-कृष्णका स्नान, स्निग्धकण्ठ और मधुकण्ठ, 3) यशोदाजीका स्वप्न, 4) जन्मोत्सव, 5) नन्द-वसुदेवका मिलन, पूतनावध, 6) औत्थानिक (उठनेकी) लीला, शकटभञ्जन, नामकरण, 7) तृणावर्तवध, मिट्टी-भक्षण, बाल-चापल्य, चोरी करना, 8) दधिमन्थन, स्तनपान, दधिभाण्ड-भञ्जन,
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