श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 867, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/35-49 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
बन्धन, यमलार्जुन भञ्जन, यशोदा-विलाप, 9) वृन्दावन 34) राधाकृष्णका अलङ्करण, 35) राधामाधव-विवाह प्रवेश, 10) वत्सासुरवध, बकासुरवध, व्योमासुरवध, निर्वाह, 36) राधा-माधवका मिलन, 37) गोलोक प्रवेश। 11) अघासुरवध, ब्रह्ममोहन, 12) गोष्ठ गमन, आदिलीला 10/85 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 35-44 ॥ 13) गोचारण, कालियदमन, 14) गर्दभासुरवध, कृष्णलालन, महाप्रभुके संन्यासके बादके पहले वर्षमें श्रीअद्वैतादि 15) गोपियोंका पूर्वानुराग, 16) प्रलम्बासुरवध, दावाग्नि-पान, गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें गमन :— 17) गोपियोंकी कृष्णचेष्टा अर्थात् कृष्णकी लीलाओंका प्रथम वत्सरे अद्वैतादि भक्तगण। अनुकरण, 18) गोवर्धन धारण, 19) कृष्णाभिषेक, प्रभुरे देखिते कैला नीलाद्रि-गमन॥ 46 ॥ 20) वरुणालयसे नन्द महाराजको लाना, गोपोंका पुरीमें कीर्तनादिके द्वारा चातुर्मास्य व्यतीत करना :— गोलोक दर्शन, 21) कात्यायनीव्रतानुष्ठान, 22) यज्ञपत्नियोंसे रथयात्रा देखि' ताहाँ रहिला चारिमास। अन्नभिक्षा, 23) गोपियोंका मिलन, 24) गोपीविहार, प्रभुसङ्गे नृत्यगीत परम उल्लास॥ 47 ॥ राधा-कृष्णका अन्तर्धान होना, गोपियोंके द्वारा ढूँढ़ना, अनुवाद-महाप्रभुके संन्यास ग्रहणके एक वर्ष बाद 25) कृष्णका प्रकट होना, 26) गोपियोंका सङ्कल्प, श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये 27) जलविहार, 28) सर्पग्रस्त नन्द महाराजका उस बङ्गालसे नीलाचल गये। नीलाचलमें उन्होंने श्रीजगन्नाथदेवकी बन्धनसे मोचन, 29) विविध रहःक्रीड़ा, 30) शङ्खचूड़वध, रथयात्रामें भाग लिया और महाप्रभुके सङ्ग नृत्य-गीत होली, 31) अरिष्टासुरवध, 32) केशीवध, 33) नारदका करते हुए आनन्दसे चार मास बिताये॥ 46-47 ॥ आगमन, ग्रन्थ रचनाका शक और सम्वत्। महाप्रभुका भक्तोंको प्रति वर्ष रथयात्रा-दर्शनके उत्तरचम्पूके 37 पूरण-1) ब्रजानुराग, 2) अक्रूरकी लिये आनेका आमन्त्रण :— क्रूरता, 3) मथुरापुर नामक स्थानमें प्रस्थान, 4) मथुरान्त विदाय-समय प्रभु कहिला सबारे। प्रदेशका निर्देश, 5) कंसवध, 6) ब्रजपति-विसर्जन-कष्ट "प्रत्यब्द आसिबे सबे गुण्डिचा देखिबारे॥" 48 ॥ (अर्थात् नन्द महाराजको ब्रजमें भेजनेका कष्ट), अनुवाद-चार मासके अन्तमें महाप्रभुने उन्हें विदा 7) नन्दका ब्रजमें प्रवेश, 8) अध्ययन आदि, करते हुए प्रत्येक वर्ष श्रीजगन्नाथदेवकी गुण्डिचा मन्दिर 9) गुरुपुत्रको लाना, 10) उद्धवका ब्रजागमन, तककी रथयात्राके दर्शनके लिये आनेके लिये आमन्त्रित 11) भ्रमरमें दूतका भ्रम, 12) उद्धवका वापिस लौटना, किया॥ 48 ॥ 13) जरासन्ध-बन्धन, 14) यवन जरासन्ध, अमृतप्रवाह भाष्य-'गुण्डिचा'-श्रीजगन्नाथदेव रथयात्रामें 15) बलभद्र-विवाह, 16) रुक्मिणी विवाह, 17) सप्तविवाह, 'सुन्दराचल'-नामक स्थानमें 'गुण्डिचा'-नामक मन्दिरमें 18) नरकासुर वध, पारिजात हरण, सोलह हज़ार जाकर नौ दिन लीला करते हैं, इसलिये रथयात्राको महिषियोंके साथ विवाह, 19) बाणासुरपर विजय, उड़ीसावासी 'गुण्डिचा-यात्रा' कहते हैं॥ 48 ॥ 20) बलरामजीकी व्रजमें जानेकी कामना, 21) पौण्ड्र प्रति वर्ष गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें रथयात्रा-दर्शन :— 22) द्विविध-वध, हस्तिनापुर आलोचना, 23) कुरुक्षेत्रकी प्रभु-आज्ञाय भक्तगण प्रत्यब्द आसिया। यात्रा, 24) व्रजवासियोंकी कुरुक्षेत्र यात्रा, 25) उद्धव-मन्त्रणा, गुण्डिचा देखिया या'न प्रभुरे मिलिया॥ 49 ॥ 26) राज-मोचन, 27) राजसूय, 28) शाल्व-वध, अनुवाद-महाप्रभुकी आज्ञानुसार भक्त लोग प्रति 29) व्रज आगमन-विषयक विचार, 30) कृष्णका व्रज-आगमन, 31) राधादिकी बाधाका समाधान, 32) सर्वसमाधान, 33) राधामाधव-अधिवास,
14 ।