श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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पहला अध्याय 1/49–56 ] वर्ष रथयात्राके समय नीलाचल आते और महाप्रभुके साथ मिलकर 'गुण्डिचा-यात्रा'के दर्शन करते ॥ 49 ॥ अन्तिम चौबीस वर्षोंमेंसे बारह वर्षोंतक भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन :— द्वादश वत्सर ऐछे कैला गतागति। अन्योऽन्ये दुँहार दुँहा बिना नाहि स्थिति ॥ 50 ॥ अनुवाद—भक्त लोग बारह वर्षोंतक प्रतिवर्ष महाप्रभुसे मिलने नीलाचल आते रहे, क्योंकि उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि वे एक दूसरेके बिना नहीं रह सकते थे ॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु और उनके भक्त एक-दूसरेसे मिले बिना सुखी नहीं हो सकते ॥ 50 ॥ अन्तिम बारह वर्षोंमें महाप्रभुका श्रीकृष्णविरह :— तार शेष येइ रहे द्वादश वत्सर। कृष्णेर विरहलीला प्रभुर अन्तर ॥ 51 ॥ अनुवाद—नीलाचलमें अन्त्यलीलाके जो बाकी बारह वर्ष थे, महाप्रभुने उनमें केवल श्रीकृष्ण-विरहमें विप्रलम्भ रसका आस्वादन किया ॥ 51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंकी श्रीकृष्णविरह-लीला महाप्रभुके अन्तःकरणमें सदा जाग्रत रहती थी ॥ 51 ॥ रात-दिन कृष्णविरहसे उत्पन्न दिव्योन्माद :— निरन्तर रात्रि-दिन विरह उन्मादे। हासे, कान्दे, नाचे, गाय परम विषादे ॥ 52 ॥ अनुवाद—दिन-रात निरन्तर वे विरहके उन्मादमें ग्रस्त होकर कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते और कभी दुःखमें विकल होकर गाते ॥ 52 ॥ दीर्घ-विरहके अन्तमें श्रीराधिकाके कृष्णदर्शनसे उत्पन्न भावोंमें विभोर भावमय महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ दर्शन :— ये-काले करेन जगन्नाथ-दरशन। मने भावेन, कुरुक्षेत्रे पाञाछि मिलन ॥ 53 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब भी श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते, उनके हृदयमें कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णसे मिल रहीं राधाजीके भाव उदित हो जाते ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने कुरुक्षेत्रमें यज्ञका आयोजन किया और व्रजवासियोंको उसमें आमन्त्रित किया। गोपियोंने वहाँ जाकर श्रीकृष्णदर्शन-सुखको प्राप्त किया। महाप्रभुके अन्तःकरणमें सदा श्रीकृष्णविरहके भाव उद्दीप्त रहते थे। केवल जब-जब वे श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते, तब-तब कुरुक्षेत्र-मिलन-भाव उनके हृदयमें उदित होते थे ॥ 53 ॥ रथके आगे नृत्य करते समय महाप्रभुका गान :— रथयात्राय आगे यबे करेन नर्त्तन। ताहाँ एइ पद मात्र करये गायन ॥ 54 ॥ वह पद :— “ 'सेइत' पराण-नाथ पाइनु। याहा लागि' मदनदहने झुरि' गेनु ॥” 55 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब रथयात्रामें श्रीजगन्नाथजीके सामने नृत्य करते, तब वे यही एक पद गाया करते थे—मैंने उन्हीं प्राणनाथको पा लिया है, जिनके विरहमें मैं कामाग्निकी ज्वालामें जलकर म्लान हो रही थी ॥ 54-55 ॥ श्रीजगन्नाथजीके गुण्डिचा जाते समय महाप्रभुके भाव :— एइ धुया-गाने नाचेन द्वितीय प्रहर। कृष्ण लञा व्रजे याइ—एभाव अन्तर ॥ 56 ॥ अनुवाद—राधाजी श्रीकृष्णको वृन्दावन ले जा रही हैं, अन्तरमें इस राधा-भावसे महाप्रभु द्वितीय प्रहरमें विशेष रूपसे यही गान करते हुए नाचते ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुरुक्षेत्रमें मिलनसे सन्तोष प्राप्त नहीं हुआ, इसलिये श्रीकृष्णको व्रजमें ले जाकर वहाँ उनके साथ मिलन हो, ऐसे भाव महाप्रभुके हृदयमें सदा उठते थे ॥ 56 ॥ । 15