भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 869

[ 1/53-58 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—महाप्रभुने राधाभावमें विभावित होकर सुदीर्घ माथुरविरहभावको ग्रहण किया। इसके द्वारा निरन्तर सम्भोगके पुष्टिकारक विप्रलम्भ-रसके मूर्त्तिमान् विग्रह बनकर उन्होंने जीवोंके एकमात्र भजन-साधनको जगत्को जनाया है। श्रीमद्भागवतके दसवें स्कन्धके 82वें अध्यायमें वर्णित है कि श्रीकृष्ण दर्शनके लिये उत्सुका गोकुलवासिनी सभी व्रजगोपियाँ स्यमन्तपक्षके ग्रहणके उपलक्ष्यमें कुरुक्षेत्र गयी थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जिस प्रकार हृदयके भावोंका प्रकाश किया था, दूसरी बार वही भाव श्रीगौरसुन्दरने नीलाचलपति श्रीजगन्नाथके दर्शनमें प्रकाशित किये थे। कुरुक्षेत्रमें गोपियाँ जिस प्रकार श्रीकृष्णके ऐश्वर्य-भावको दूर करके उन्हें गोकुलके माधुर्य-आस्वादनमें ले जानेका प्रयास कर रही थीं, उसी प्रकार श्रीगौरहरि कुरुक्षेत्ररूप नीलाचल मन्दिरसे श्रीकृष्णरूप श्रीजगन्नाथदेवको वृन्दावनरूप गुण्डिचा मन्दिरकी ओर ले जा रहे थे। रथके सामने श्रीगौरसुन्दर स्वयंमें उदित वृषभानुनन्दिनीके हृदयके भावका गान करते हुए श्रीकृष्णको पारकीय विहारस्थली गुण्डिचामें ले जा रहे थे॥ 53-56॥ गुह्य श्लोक :— एइभावे नृत्यमध्ये पड़े एक श्लोक। सेइ श्लोकेर अर्थ केह नाहि बूझे लोक॥ 57॥ अनुवाद—इस भावमें डूबकर नृत्य करते हुए महाप्रभुने एक श्लोक पढ़ा जिसका गूढ़ अर्थ कोई नहीं समझ सका॥ 57॥ पूर्वोक्त भावद्योतक श्लोक :— काव्यप्रकाश (1/4); साहित्य-दर्पण (1/10); पद्यावली (382) :— यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठ्यते॥ 58॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 58॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिसने कौमारकालमें रेवानदीके तटपर मेरा चित्त हरण किया था, वही अब मेरा पति है; वही मधुमासकी रात्रि भी है; खिले हुए मालती पुष्पोंकी सुगन्ध भी है; कदम्बवनसे वायु भी मधुररूपमें बहकर आ रही है; सुरत-व्यापारलीलाके (प्रेममय विहारके) लिये मैं वही नायिका भी उपस्थित हूँ; तथापि मेरा चित्त इस अवस्थामें सन्तुष्ट नहीं होकर रेवानदीके तटपर वेतसी वृक्षके तलपर जानेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहा है॥ 58॥ अनुभाष्य— [हे सखि], यः [कान्तः] कौमारहरः (कौमारं हरति अपनयति यः सः) स एव हि वरः, ताः एव चैत्रक्षपाः (मधुचैत्रमासस्य ज्योत्स्नावत्यः रजन्यः), [तथा] ते च उन्मीलितमालतीसुरभयः (उन्मीलितानिः विकशितानिः यानि मालती पुष्पाणि तैः सुरभयः सुगन्धाः), प्रौढाः (घनसखप्रदाः) कदम्बानिलाः (कदम्ब-सुरभिपूर्णाः समीराणाः) [वहन्ति], सा च अहमेवास्मि, तथापि तत्र रेवारोधसि (रेवानदीतटे) वेतसीतरुतले (वेतसीकण्टक-वेष्टिते निर्जन-सुशीतलप्रदेशे) सुरतव्यापारलीलाविधौ (नायकसङ्गाकाङ्क्षायां यत्र पूर्वसङ्गमो जातस्तत्रैव) चेतः (मनः) समुत्कण्ठते (विहर्तुं उत्सहते)। श्लोक-भावानुवाद—एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती है,–“जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके तटपर निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है॥” 58॥ 16 ।