भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 870

पहला अध्याय 1/59-65 ] एकमात्र स्वरूप दामोदर ही महाप्रभुके भावोंके ज्ञाता :— एइ श्लोकेर अर्थ जाने एकेला स्वरूप। दैवे से वत्सर ताहाँ गियाछेन रूप ॥ 59 ॥ अनुवाद—केवल श्रीस्वरूप दामोदर ही इस श्लोकके पाठके पीछे महाप्रभुके अप्राकृत भावोंको जानते थे। दैववश उस वर्ष श्रीरूप गोस्वामी भी वहाँ उपस्थित थे ॥ 59 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'एकेला स्वरूप'—उक्त श्लोक अत्यन्त तुच्छ नायक-नायिकाके सम्बन्धमें रचित है। महाप्रभु इसका जो इतने आदरके साथ पाठ कर रहे थे, उसका गूढ़ तात्पर्य स्वरूप-दामोदरके अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं जानता था ॥ 59 ॥ श्रीरूपके द्वारा उसके अनुरूप स्वरचित श्लोक :— प्रभुमुखे श्लोक शुनि' श्रीरूपगोसाञि। सेइ श्लोकेर अर्थ-श्लोक करिला तथाइ ॥ 60 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे इस श्लोकको सुनकर श्रीरूप गोस्वामीने उनके भावोंके अनुरूप एक श्लोककी रचना की ॥ 60 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, 13/111-159 संख्या देखें ॥ 53-60 ॥ महाप्रभु और श्रीरूपके द्वारा रचित श्लोककी कथा :— श्लोक करि' एक तालपत्रेते लिखिया। आपन वासार चाले राखिला गुञ्जिया ॥ 61 ॥ श्लोक राखि' गेला समुद्रस्नान करिते। हेनकाले आइला प्रभु ताँहारे मिलिते ॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने श्लोककी रचना करके उसे एक तालपत्रपर लिखा और अपने वास स्थानपर फूसकी छतमें उसे फंसाकर रख दिया और समुद्रमें स्नानके लिये चले गये। तभी इसी बीच महाप्रभु उनसे मिलनेके लिये वहाँ आये ॥ 61-62 ॥ ब्राह्मणोंके गुरु अप्राकृत वैष्णवाचार्य होनेपर भी दीनतावश मर्यादाका पालन करते हुए तीन व्यक्तियोंकी श्रीजगन्नाथ-मन्दिरमें जानेकी अनिच्छा :— हरिदास ठाकुर, श्रीरूप-सनातन। जगन्नाथ-मन्दिरे ना या'न तिन जन ॥ 63 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामी, ये तीनों श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें दर्शनके लिये नहीं जाते थे ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हरिदास ठाकुर काजीके पुत्र थे। मन्दिरकी मर्यादा भङ्ग न हो, इसलिये वे मन्दिरके भीतर नहीं जाते थे। श्रीरूप-सनातन दैन्यवशतः अपनेको तृणसे भी सुनीच मानते थे और उन्होंने नीच जातिके लोगोंकी नौकरी की थी, इसलिये अपनेको नीच जातिका ही मानकर मन्दिरमें नहीं जाते थे ॥ 63 ॥ महाप्रभु जगन्नाथेर उपल-भोग देखिया। निजगृहे या'न एइ तिनरे मिलिया ॥ 64 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन श्रीजगन्नाथदेवका उपल- भोग देखकर इन तीनोंसे मिलकर अपने वास स्थानपर जाते थे ॥ 64 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'उपल-भोग'—छत्र-भोग। श्रीजगन्नाथदेवके अन्य सभी भोग मणिकोठाके भीतर अर्पित किये जाते हैं। गरुड़-स्तम्भके पीछे एक बहुत बड़ा पत्थरसे बना स्थान है, दिनमें दोपहर बारह बजेके बाद जो बृहत् (बड़ा) भोग होता है, वह इस पत्थरके ऊपर लगाया जाता है। उपलका अर्थ होता है—पत्थर। उस पथरीली भूमिके ऊपर जो भोग लगाया जाता है, उसे 'उपल-भोग' कहते हैं ॥ 64 ॥ एइ तिन मध्ये यबे थाके येइ जन। ताँरे आसि' आपने मिले,–प्रभुर नियम ॥ 65 ॥ अनुवाद—इन तीनोंमें जो भी उस स्थानपर होते थे, उनसे महाप्रभु आकर भेंट करते थे—ऐसा उनका नित्यका नियम था ॥ 65 ॥ । 17