भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 871

[ 1/66–76 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दैवे आसि' प्रभु यबे ऊर्ध्वेते चाहिल। चाले गोंजा तालपत्रे सेइ श्लोक पाइल ॥ 66 ॥ श्लोक पड़ि' आछे प्रभु आविष्ट हइया। रूपगोसाञि आसि' पड़े दण्डवत् हञा ॥ 67 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब वहाँ पहुँचे, तो अचानक उनकी दृष्टि ऊपर गयी और उन्हें वह तालपत्र दिखलायी दिया। श्लोक पढ़कर महाप्रभु भावमें आविष्ट हो गये और तभी श्रीरूप गोस्वामी वहाँ आये और उन्होंने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 66–67 ॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी अकृत्रिम स्नेह-कृपा :- उठि' महाप्रभु ताँरे चापड़ मारिया। कहिते लागिला किछु कोलेते करिया ॥ 68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनको उठाकर प्रेमसे एक चाँटा मारा और अपनी गोदमें बैठाकर कुछ पूछने लगे ॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उठि'—पाठान्तर, 'उठाइ' ॥ 68 ॥ “मोर श्लोकेर अभिप्राय ना जाने कोन जने। मोर मनेर कथा तुञि जानिलि केमने ? ॥” 69 ॥ एत बलि' ताँरे बहु प्रसाद करिया। स्वरूप-गोसाञिरे श्लोक देखाइल लञा ॥ 70 ॥ अनुवाद—मेरे श्लोकका अभिप्राय कोई नहीं जानता है, तो मेरे मनके भाव तुमने कैसे जान लिये ? यह कहकर महाप्रभुने उन्हें बहुत आशीर्वाद दिये और वह श्लोक दिखानेके लिये श्रीस्वरूप दामोदरजीके पास आये ॥ 69–70 ॥ श्रीस्वरूपको श्रीरूपके द्वारा रचित श्लोक दिखलाकर प्रश्न :- स्वरूपे पुछेन प्रभु हइया विस्मिते। “मोर मनेर कथा रूप जानिल केमते ? ॥” 71 ॥ अनुवाद—महाप्रभु विस्मित होकर श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछने लगे कि मेरे मनके भावोंको रूपने कैसे जान लिया ? ॥ 71 ॥ स्वरूप कहे, —“याते जानिल तोमार मन। ताते जानि, —हय तोमार कृपार भाजन ॥” 72 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा—"यदि उसने आपके मनके भावोंको जान लिया है, तो यह निश्चित है कि वह आपका कृपापात्र ही है ॥" 72 ॥ प्रभु कहे, —“तारे आमि सन्तुष्ट हञा। आलिङ्गन कैलुँ सर्वशक्ति सञ्चारिया ॥ 73 ॥ योग्यपात्र हय गूढ़रस-विवेचने। तुमिओ कहिओ तारे गूढ़रसाख्याने ॥” 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं उससे सन्तुष्ट हुआ हूँ और उसका आलिङ्गन करके मैंने अपनी सारी शक्ति उसमें सञ्चारित की है। भक्तिरसके गूढ़ तत्त्वोंको समझनेका वह योग्य पात्र है। तुम उसको भक्तिरसके गूढ़ उपाख्यान समझाना ॥” 73–74 ॥ एसब कहिब आगे विस्तार करिया। संक्षेपे उद्देश कैल प्रस्ताव पाइया ॥ 75 ॥ अनुवाद—(श्रीकृष्णदास कह रहे हैं) इन सबको विस्तारसे आगेके अध्यायोंमें कहूँगा, यहाँ तो मैंने केवल प्रसङ्गवशतः संक्षेपमें वर्णन किया है ॥ 75 ॥ पद्यावलीमें श्रीरूपकृत श्लोक (387) :- प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित- स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्। तथाप्यन्तः खेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति ॥ 76 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरी ! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही 18 ।