भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 872

पहला अध्याय 1/76-81 ] राधा हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है; तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमसुरके आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है ॥76॥ अनुभाष्य- हे सहचरि (सखि), सः (मम कान्तः) अयं प्रियः (प्राणारामः) कृष्णः कुरुक्षेत्रमिलितः (कुरुक्षेत्रे प्राप्तः) तथा सा राधा अहं उभयोः तत् इदं सङ्गमसुखं (मिथो मिलनेन यद्यपि सुखं जातं); तथापि अन्तःखेलन्मधुर-मुरली-पञ्चमजुषे (अन्तः हृदयाभ्यन्तरे वृन्दावनमध्ये वा खेलन् क्रीडन् मधुरो यः वंश्याः पञ्चमो रागः तं जुषते सेवते तस्मै) कालिन्दीलिनविपिनाय (कालिन्द्याः यमुनायाः पुलिनं तटस्थलं तस्मिन् यत् विपिनं तरु-समाकीर्णं निर्जनं काननं तस्मै वंशीनिनादपूर्णयामुनतटान्तस्थ-वृन्दावनाय) मे (मम) मनः स्पृहयति (गमनाय समुत्कण्ठितो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥76॥ श्लोकमें श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे महाप्रभुके भाव व्यक्त :- एइ श्लोकेर संक्षेपार्थ शुन, भक्तगण। जगन्नाथ देखि' यैछे प्रभुर भावन ॥77॥ अनुवाद-हे भक्तों ! इस श्लोकका संक्षेपमें अर्थ सुनो। श्रीजगन्नाथको देखकर महाप्रभुमें जैसे भाव आते थे ॥77॥ कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्ण दर्शनसे राधिकाका भाव :- श्रीराधिका कुरुक्षेत्रे कृष्णेर दरशन। यद्यपि पायेन, तबु भावेन ऐछन ॥78॥ विधिधर्म और ऐश्वर्य त्याग करवाके श्रीकृष्णको ब्रजमें दीन गोपियोंके मध्य प्राप्त करनेकी आकाङ्क्षा :- राजवेश, हाती, घोड़ा, मनुष्य गहन। काहाँ गोपवेश, काहाँ निर्जन वृन्दावन ॥79॥ सेइ भाव, सेइ कृष्ण, सेइ वृन्दावन। यबे पाइ, तबे हय वाञ्छित-पूरण ॥80॥ अनुवाद-कुरुक्षेत्रमें श्रीमती राधिकाने श्रीकृष्णके दर्शन किये और वे साक्षात् उनके सामने थे, परन्तु उनके भाव इस प्रकार थे—यहाँ कृष्णका राजवेश है, चारों ओर हाथी, घोड़े और मनुष्योंकी भीड़ लगी है और कहाँ निर्जन वृन्दावनमें कृष्णका गोपवेश होता था। वही प्रेमके भाव, वही गोपवेशमें कृष्ण और वही वृन्दावनका परिवेश हो, तभी मेरी वाञ्छा पूर्ण होगी ॥78-80॥ श्रीकृष्णसे स्वगृहमें मिलनकी आकाङ्क्षा :- श्रीमद्भागवत (10/82/48)- आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः। संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥81॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥81॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियोंने कहा,-'हे कमलनाभ ! संसार-कूपमें पतित लोगोंके पार होनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं, जो ब्रह्मादि अति ज्ञानवान् योगेश्वरोंके हृदयमें ही सर्वतोभावेन (सभी प्रकारसे) चिन्तनीय हैं, वे चरणकमल हम गृहसेवियोंके मनमें सदा उदित हों।" किसी-किसी पाठमें निम्नलिखित श्लोक दिखायी देता है (श्रीमद्भागवत 10/83/2)- "त एवं लोकनाथेन परिपृष्टाः सुसत्कृताः। प्रत्युचुर्हृष्टमनसस्तत्पादैकाहतांहसः ॥"81॥ अनुभाष्य-स्यमन्तपञ्चक अर्थात् कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णदि प्रमुख वृष्णियोंके साथ गोप-गोपियोंके मिलनके बाद श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंकी उक्ति- गोप्यः आहुः-हे नलिननाभ (पद्मनाभ), अगाधबोधैः (बुद्धेः पारङ्गतैः) योगेश्वरैः (विषयनिवृत्तैः) हृदि (मनसि) विचिन्त्यं (सर्वतोभावेन चिन्तनीयं) संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं (संसार एव कूपः तस्मिन् पतिताः ये तेषां उत्तरणाय उद्धाराय अवलम्बम् आश्रयरूपं विषयैरतानां मुक्त्युपायरूपं) ते (तव) पदारविन्दं (चरणकमलं) गेहं (गोपभवनं वृन्दावनं) जुषां (सेवमानानां सहजगृहधर्मनिरतानां गोपीनां) अपि नः (अस्माकं) मनसि सदा उदियात्। [सांसारिकविषयरसाविष्ठानां उद्धरणसमर्थं विषयरहितानां योगीनां च ध्यानविषयात्मकं तव पदकमलं, । 19