भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 873, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 873

[ 1/81–84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


किन्तु अस्माकं सहजगृहधर्मपराणां तव विरहसिन्धुनिमग्नानां नोद्धर्त्तुं शक्नुयात्, यतः वयं न ध्यानपरा योगिनः, न च पतिपुत्रादिकथारताः कृपणाः संसारिणः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इस श्लोकमें गोपियोंके गूढ़ भाव इस प्रकार हैं,—“हे कृष्ण! आपके चरणकमल सांसारिक विषयरस-विष्ठासे उद्धार करनेमें समर्थ और योगियोंके ध्यानके विषय हैं, किन्तु हमारे जैसी सहज गृहधर्म परायणा जो आपके विरह-समुद्रमें डूब रही हैं, उनका उद्धार करनेमें सक्षम नहीं हैं, क्योंकि हम न तो ध्यानपरायण योगिनी हैं और न ही पति-पुत्रादिमें आसक्त कृपण संसारी नारी हैं।”] ॥ 81 ॥

दीर्घ विरहके अन्तमें मिलनकी आकाङ्क्षा :— तोमार चरण मोर व्रजपुरघरे। उदय करये यदि, तबे वाञ्छा पूरे ॥ 82 ॥

अनुवाद—यदि तुम अपने चरण पुनः मेरे घर वृन्दावनमें रखोगे, तभी मेरी अभिलाषा पूर्ण होगी ॥ 82 ॥

अनुभाष्य—गोपियाँ विशुद्ध कृष्णसेवा-परायणा हैं, उन्हें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य या अन्य किसी वैभवसे कोई प्रयोजन नहीं हैं। इसलिये कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके हाथी, घोड़ों और राजवेशमें उनकी कोई रुचि नहीं है। जिस प्रकार गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण गोपियोंके निर्मल प्रेमभावके वशीभूत हैं, उसी प्रकार गोपियाँ भी गोपीजनवल्लभकी नित्य सेविकाएँ हैं। योगीजन जिस प्रकार समस्त सांसारिक कामनाओंका त्यागकर एकाग्र चित्तसे अखिल वैभवके स्वामी श्रीकृष्णका ध्यान करते हैं, गोपियाँ उस प्रकार श्रीकृष्णका ध्यान करनेकी चेष्टा नहीं करती हैं। अथवा विषयोंमें आसक्त लोग जिस प्रकार अपनी समृद्धिके लिये अपने देह-पुत्र-परिवारके लौकिक मङ्गल अथवा स्वयं भवसागरसे मुक्त होनेके उद्देश्यसे हरिपादाश्रय करते हैं, गोपियोंकी उस प्रकारके सत्कर्मोंमें रुचि या निपुणता नहीं हैं। वे तो अपनी समस्त इन्द्रियोंके द्वारा काय-मनो-वाक्यसे श्रीकृष्णकी शुद्धसेवामें निरन्तर रत रहती हैं। गोपियाँ नीरस शुष्क तर्क-विचार अथवा प्राकृत रसके भोग अथवा त्याग—इन सबसे परे हैं। गोपियाँ यह नहीं चाहतीं कि उनके प्राणवल्लभ अन्य किसी कार्यमें व्यस्त रहें अथवा मर्यादाका पालन करनेके लिये वृन्दावनके अतिरिक्त किसी अन्य स्थानमें रहें। वे तो श्रीवृन्दावनमें अपनी समस्त इन्द्रियोंसे सेवाके द्वारा व्रजेन्द्रनन्दनको सुखी करके ही सुखका अनुभव करती हैं ॥ 82 ॥

भागवतेर श्लोकार्थ विचार करिया। रूप-गोसाञि श्लोक कैल लोक बुझाइञा ॥ 83 ॥

अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने एक ही श्लोकमें भागवतके गूढ़ रहस्यको प्रकाशित कर दिया जिसे साधारण लोग भी समझ सकते हैं ॥ 83 ॥

विरहके कारण चिरकालसे मधुर-स्मृतिमय मिलनकी आकाङ्क्षा :— ललितमाधव (10/38) — या ते लीलारसपरिमलोद्गारिवन्यापरीता धन्या क्षौणी विलसति वृता माधुरी माधुरीभिः। तत्रास्माभिश्चटुलपशूपीभावमुग्धान्तराभिः सम्बीतस्त्वं कलय वदनोल्लासि-वेणुर्विहारम् ॥ 84 ॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 84 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण! तुम्हारी लीला-रस- गन्धको विस्तार करनेवाले वनसमूहके द्वारा व्याप्त, मथुरामण्डलीय माधुरीके द्वारा परिवेष्टित और भावके द्वारा मुग्धचित्त हम गोपियोंके द्वारा परिसेवित होकर जिस धन्य वृन्दावनमें विलास करते थे, हे वंशीवदन! (वहीं) तुम हमारे सङ्ग वही लीला-विहार करो ॥ 84 ॥

अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी श्रीमती राधिकासे अभीष्ट वर माँगनेकी प्रार्थना करनेपर श्रीमतीकी उक्ति,— लीलारसपरिमलोद्गारिवन्यापरीता (लीलारस-सुरभि-निःसारिणी या वन्या वनसमूहतया परीता व्याप्ता), माधुरी (मथुरा-सम्बन्धिनी) माधुरीभिः (सौन्दर्यैः) वृता (आवृता) धन्या (प्रशंसनीया), या


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