श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 879, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/112-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अमृतप्रवाह भाष्य— 'रामजपी'—जो ब्राह्मण श्रीराम-नामका जप करता था॥112॥ अनुभाष्य— 'भट्टथारि'—यही वास्तविक शब्द है। 'भट्टथारी'-शब्द ही लिखनेवालेकी असावधानीके कारण बङ्गला ग्रन्थोंमें “भट्टमारि” हो गया है। मालाबार प्रदेशमें पवित्रता-अभिमानी बहुत नम्बुद्रि-ब्राह्मण रहते थे। ये भट्टथारि लोग उनके पुरोहितका कार्य करते थे। इनकी मारण-उच्चाटन- वशीकरण आदि तान्त्रिक याग-यज्ञमें निपुणता विख्यात थी। महाप्रभुके सङ्गी कृष्णदास ब्राह्मणका चित्त चञ्चल और उसकी मति भी चञ्चल थी। वह इनके चङ्गलमें फंसकर जीवके एकमात्र धर्म महाप्रभुके सर्वोत्तम दास्यको भूल गया था। दीन-तारण महाप्रभुने केशोंसे पकड़कर उसे मायाके पाशसे मुक्त करवाके अपने 'अहैतुकी-कृपासिन्धु' नामकी सार्थकताको स्थापित किया। 'भट्टथारिसे कृष्णदासका उद्धार'—मध्यलीला 9/226-233 संख्या देखें॥112॥
श्रीरङ्गपुरीके साथ मिलन, रावणके द्वारा माया-सीताके हरणकी कथा वर्णनकर रामदास विप्रको सान्त्वना :— श्रीरङ्गपुरी सह ताहारि मिलन। रामदास विप्रेर कैल दुःखविमोचन॥113॥ **अनुवाद—**फिर महाप्रभु श्रीरङ्गपुरीसे मिले। तत्पश्चात् रामदास नामक ब्राह्मणके दुःखको दूर किया॥113॥ अनुभाष्य— 'रामसेवक ब्राह्मणपर कृपा'—मध्यलीला 9/180-197, 201-217 संख्या देखें॥113॥
तत्त्ववादी माध्वमठाधीशके साथ विचार :— तत्त्ववादी सह कैल तत्त्वेर विचार। आपनाके हीनबुद्धि हैल ताँ-सबार॥114॥ **अनुवाद—**तत्पश्चात् मध्व-सम्प्रदायके तत्त्ववादियोंके साथ महाप्रभुने तत्त्वकी आलोचना की जिसके फलस्वरूप उन सबने अपने-आपको अल्पज्ञ माना॥114॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य— 'तत्त्ववादियोंका गर्वनाश'—मध्यलीला 9/245-278 संख्या देखें। इन तत्त्ववादाचार्यका नाम उत्तरराढ़ी-मठाधीश श्रीरघुवर्य-तीर्थ-मध्वाचार्य था॥114॥
विष्णुविग्रह-दर्शन :— अनन्त, पुरुषोत्तम, श्रीजनार्द्दन। पद्मनाभ, वासुदेव कैल दरशन॥115॥ **अनुवाद—**उसके बाद महाप्रभुने श्रीअनन्तदेव, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीजनार्द्दन, श्रीपद्मनाभ और श्रीवासुदेवके दर्शन किये॥115॥ अनुभाष्य— 'अनन्त-पद्मनाभ'—त्रिवेन्द्रम जिलेका इस नामसे प्रसिद्ध एक विष्णु-मन्दिर है। 'श्रीजनार्द्दन'—त्रिवेन्द्रम जिलेके छब्बीस मील उत्तरमें बर्कालाके निकट यह विष्णु-मन्दिर है॥115॥
सप्तताल-उद्धार, रामेश्वरमें सेतुबन्ध-तीर्थमें स्नान :— तबे प्रभु कैल सप्तताल-विमोचन। सेतुबन्धे स्नान, रामेश्वर-दरशन॥116॥ **अनुवाद—**तब महाप्रभुने सप्तताल वृक्षोंका उद्धार किया। सेतुबन्धपर स्नान करके महाप्रभुने श्रीरामेश्वरके दर्शन किये॥116॥ अनुभाष्य— 'सप्तताल-विमोचन'—मध्यलीला 9/311-315 संख्या और 'सेतुबन्ध' एवं 'रामेश्वर'—मध्यलीला, 9/200 संख्याका अनुभाष्य देखें॥116॥
रामेश्वर तीर्थसे कूर्मपुराणको लेकर रामदास विप्रके दुःखका मोचन :— ताहाञि करिल कूर्मपुराण श्रवण। मायासीता निलेक रावण, ताहाते लिखन॥117॥ शुनिय़ा प्रभुर आनन्दित हैल मन। रामदास विप्रेर कथा हइल स्मरण॥118॥ सेइ पुरातन पत्र आग्रह करि' निल। रामदासे देखाइय़ा दुःख खण्डाइल॥119॥
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