भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 880, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 880

पहला अध्याय 1/117-126 ] अनुवाद-वहाँ उन्होंने कूर्मपुराणका श्रवण किया जिसमें लिखा है कि रावणने मायासीताका ही हरण किया था, वास्तविक सीताका नहीं। यह कथा सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और उन्हें रामदास ब्राह्मणकी बात स्मरण हो आयी (वह सीताजीका भक्त सदा दुःखी रहता था कि सीताजीको उस राक्षसने स्पर्श किया था)। महाप्रभुने कूर्मपुराणका पाठ करनेवाले ब्राह्मणोंसे विनम्रतापूर्वक आग्रह करके कूर्मपुराणकी वह पुरातन पोथी लेकर उसकी नकल करवाकर उन्हें दे दी और वह पुरातन पोथी रामदासको दिखाकर उसके दुःखको दूर किया ॥ 117-119 ॥ अनुभाष्य- 'रामदास ब्राह्मणको कूर्मपुराणका पत्रार्पण'-मध्यलीला 9/201-217 संख्या देखें ॥ 117 ॥ 'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत' - दो ग्रन्थोंको लाना :- ब्रह्मसंहिता, कर्णामृत, दुइ पुँथि पाञा। दुइ पुस्तक लञा आइला उत्तम जानिञा ॥ 120 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको ब्रह्मसंहिता और कृष्णकर्णामृत नामक दो ग्रन्थ प्राप्त हुए और उन्हें उत्तम जानकर वे अपने साथ ले आये ॥ 120 ॥ अनुभाष्य- 'ब्रह्मसंहिता' - मध्यलीला 9/237-241 संख्या और अनुभाष्य; एवं 'कर्णामृत'- मध्यलीला 9/305-309, 323-325 संख्या देखें ॥ 120 ॥ पुरीमें वापिस लौटना और स्नानयात्रा-दर्शन :- पुनरपि नीलाचले गमन करिल। भक्तगणे मेलिया स्नानयात्रा देखिल ॥ 121 ॥ अनुवाद-उन्होंने पुनः नीलाचलकी ओर गमन किया और वहाँ पहुँचकर भक्तोंसे भेंटकर करके श्रीजगन्नाथजीकी स्नान यात्राका दर्शन किया ॥ 121 ॥ अनवसरमें आलालनाथ जाना और वहाँपर वास :- अनवसरे जगन्नाथ ना पाञा दरशन। विरहे आलालनाथ करिला गमन ॥ 122 ॥ अनुवाद-स्नानयात्राके बाद श्रीजगन्नाथजीकी अस्वस्थ-लीलाके कारण उनके दर्शन न होनेके कारण वे विरहमें दुःखी होकर अलालनाथ चले गये ॥ 122 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अनवसर'-स्नानयात्राके बाद 'नवयौवन'-दर्शनके पूर्व दिन तक कुछ दिन श्रीजगन्नाथजीके दर्शन नहीं होते हैं, उस समयको 'अनवसर' कहते हैं ॥ 122 ॥ अनुभाष्य- 'आलालनाथ'-इसका दूसरा नाम 'ब्रह्मगिरि' है। पुरीसे समुद्रके तटके साथ-साथ रेतीले मार्गसे जानेपर लगभग चौदह मील दूरीपर यह मन्दिर है। [टीका लिखनेके समय] वहाँ एक थाना और डाकघर है (मध्यलीला 7/59 संख्याका अमृतप्रवाह-भाष्य देखें) ॥ 122 ॥ गौड़ीय भक्तोंके आगमनका श्रवण :- भक्तसने दिन कत ताहाञि रहिल। गौड़ेर भक्त आइसे, समाचार पाइल ॥ 123 ॥ महाप्रभुको पुरीमें लाना :- नित्यानन्द-सार्वभौम आग्रह करिञा। नीलाचले आइला महाप्रभुके लइञा ॥ 124 ॥ महाप्रभुका रात-दिन कृष्णविरह :- विरहे विह्वल प्रभु गोङाय रात्रि-दिने। हेनकाले आइला गौड़ेर भक्तगणे ॥ 125 ॥ सबे मिलि' युक्ति करि' कीर्त्तन आरम्भिल। कीर्त्तन-आवेशे प्रभुर मन स्थिर हैल ॥ 126 ॥ अनुवाद-भक्तोंके साथ वे कुछ दिन आलालनाथमें रहे और तब उन्हें समाचार मिला कि गौड़देशसे भक्त उनसे मिलने आ रहे हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत आग्रह करके महाप्रभुको पुरी ले आये। महाप्रभु दिन-रात श्रीजगन्नाथके (श्रीकृष्णके) विरहमें विह्वल रहते थे। तभी वहाँ गौड़देशके भक्त आ पहुँचे। महाप्रभुकी विरह दशा देखकर भक्तोंने एक युक्ति सोची और सभी मिलकर कीर्तन करने लगे। महाप्रभु । 27