श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 881, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/123-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भी कीर्तनमें सम्मिलित हो गये और कीर्तनके आवेशमें उनका मन स्थिर हो गया॥ 123-126॥ श्रीरामानन्दका पुरीमें आकर महाप्रभुके साथ कृष्ण-कथालोचना :— पूर्वे यबे प्रभु रामानन्देर मिलिला। नीलाचले आसिबारे ताँरे आज्ञा दिला॥ 127॥ राज-आज्ञा लञा तेँहो आइला कत दिने। रात्रि-दिने कृष्णकथा रामानन्द-सने॥ 128॥ अनुवाद—पहले दक्षिण भारत यात्रामें जब महाप्रभु श्रीराय रामानन्दसे मिले थे, तब उन्हें नीलाचल आनेकी आज्ञा दी थी। राजा प्रतापरुद्रसे सेवा-निवृत्तिकी आज्ञा लेकर श्रीराय रामानन्द कुछ दिनों बाद नीलाचल आ गये। महाप्रभु रात-दिन श्रीराय रामानन्दके साथ श्रीकृष्णकथाकी चर्चा करते॥ 127-128॥ काशीमिश्र और प्रद्युम्नमिश्र एवं परमानन्द पुरी, श्रीगोविन्द और काशीश्वरके साथ मिलन :— काशीमिश्रे कृपा, प्रद्युम्न मिश्रादि-मिलन। परमानन्दपुरी-गोविन्द-काशीश्वरागमन॥ 129॥ अनुवाद—महाप्रभुने काशीमिश्रपर अपनी कृपा की और फिर प्रद्युम्न मिश्र आदिसे उनकी भेंट हुई। तब श्रीपरमानन्दपुरी, श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर नीलाचल आये॥ 129॥ श्रीस्वरूप दामोदर और शिखि-माहितिके साथ मिलन :— दामोदर स्वरूप-मिलने परम आनन्द। शिखिमाहिति-मिलन, राय भवानन्द॥ 130॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे मिलकर महाप्रभुको परम आनन्द हुआ। वे शिखिमाहिति और श्रीराय भवानन्दसे भी मिले॥ 130॥ अनुभाष्य—मध्यलीला दसवाँ अध्याय देखें॥ 121-130॥ गौड़देशसे आये कुलीन ग्रामवासियोंके साथ मिलन :— गौड़ हइते सर्व वैष्णवेर आगमन। कुलीनग्रामवासि-सङ्गे प्रथम मिलन॥ 131॥ अनुवाद—गौड़देशसे सभी वैष्णवोंका नीलाचलमें आगमन होने लगा। कुलीनग्रामवासी भक्तोंका महाप्रभुसे यह पहला मिलन था॥ 131॥ खण्डवासी और शिवानन्दके साथ मिलन :— नरहरि दास आदि यत खण्डवासी। शिवानन्द-सङ्गे मिलिला सबे आसि'॥ 132॥ अनुवाद—नरहरि आदि खण्डवासी शिवानन्दसेनके साथ आकर महाप्रभुसे मिले॥ 132॥ अनुभाष्य—मध्यलीला ग्यारहवाँ अध्याय देखें॥ 131-132॥ भक्तोंके साथ स्नानयात्रा-दर्शन और गुण्डिचा मार्जन :— स्नानयात्रा देखि' प्रभु-सङ्गे भक्तगण। सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन॥ 133॥ अनुवाद—महाप्रभुने सब भक्तोंके साथ स्नानयात्राका दर्शन किया। रथयात्रासे एक दिन पूर्व महाप्रभुने सब भक्तोंको लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया॥ 133॥ अनुभाष्य—मध्यलीला बारहवाँ अध्याय देखें॥ 133॥ रथके आगे नृत्य-कीर्तन :— सबा-सङ्गे रथयात्रा कैल दरशन। रथ-अग्रे नृत्य करि' उद्याने गमन॥ 134॥ अनुवाद—महाप्रभुने सबके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी रथयात्राके दर्शन किये और रथके आगे नृत्य करते हुए चले। रथके आगे उद्दण्ड नृत्य करनेके बाद थोड़ा विश्राम करनेके लिये वे मार्गके साथ एक उद्यानमें गये॥ 134॥ प्रतापरुद्रपर कृपा और प्रति वर्ष गौड़ीय-भक्तोंको आमन्त्रण :— प्रतापरुद्रेर कृपा कैल सेइ स्थाने। गौड़भक्ते आज्ञा दिल विदायेर दिने॥ 135॥ 'प्रत्यब्द आसिबे रथयात्रा-दरशने।' एइ छले चाहे भक्तगणेर मिलने॥ 136॥ 28 ।