श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 882, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/134-144 ]
अनुवाद—उस उद्यानमें उन्होंने राजा प्रतापरुद्रपर कृपा की। जब गौड़ीय भक्त वापिस लौटने लगे, तब उन्हें विदा करते हुए महाप्रभुने आज्ञा दी कि वे प्रति वर्ष श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्राके दर्शन करने आते रहें। इस आज्ञाके छलसे महाप्रभु अपने भक्तोंसे मिलना चाहते थे ॥ 135-136 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला तेरहवें अध्यायमें रथके आगे नृत्य, चौदहवें अध्यायमें उद्यानमें जाना और प्रतापरुद्रपर कृपा वर्णित है॥ 134-135 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा देना, उनके जामाता अमोघका अपराध और उद्धार :- सार्वभौम-घरे प्रभुर भिक्षा-परिपाटी। षाठीर माता कहे, याते राण्डी हउक् षाठी ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुको अपने घर प्रति मास पाँच दिन भिक्षा कराते थे। एक दिन जब महाप्रभु प्रसाद पा रहे थे, तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके दामादने महाप्रभुको खूब प्रसाद पाते देखकर उन्हें बड़े अपशब्द कहे। यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पत्नीने कहा—“अच्छा हो कि षाठी (उनकी पुत्री) विधवा हो जाय अर्थात् उनके दामादकी मृत्यु हो जाय ॥" 137 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 137 ॥ दूसरे वर्ष श्रीअद्वैतादि भक्तोंका गौड़देशसे आगमन :- वर्षान्तरे अद्वैतादि भक्तेर आगमन। प्रभुरे देखिते सबे करिला गमन ॥ 138 ॥ अनुवाद—वर्षके अन्तमें अर्थात् दूसरे वर्ष श्रीअद्वैताचार्य आदि सभी भक्त भारी संख्यामें महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचल आये ॥ 138 ॥ महाप्रभुके द्वारा सभीकी व्यवस्थाका सम्पादन :- आनन्दे सबारे निया देन वासस्थान। शिवानन्दसेन करे सबार पालन ॥ 139 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सबसे मिलकर बड़े आनन्दित हुए और उनके रहनेकी व्यवस्था की। श्रीशिवानन्दसेनने सभीके भोजन, शयन आदिका उत्तरदायित्व सम्भाला॥ 139 ॥ शिवानन्दके साथ आये कुत्तेका महाप्रभुके चरण दर्शनके बाद अन्तर्धान होना :- शिवानन्देर सङ्गे आइला कुक्कुर भाग्यवान्। प्रभुर चरण देखि' कैल अन्तर्धान ॥ 140 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दसेनके सङ्ग एक कुत्ता भी आया था और वह सौभाग्यवान् महाप्रभुके चरणोंके दर्शन करते ही अन्तर्धान हो गया (अर्थात् शरीर त्यागकर भगवद्-धामको चला गया) ॥ 140 ॥ पुरी आनेवाले भक्तोंका काशीकी ओर जा रहे श्रीसार्वभौमके साथ मार्गमें मिलन :- पथे सार्वभौम सह सबार मिलन। सार्वभौम भट्टाचार्येर काशीते गमन ॥ 141 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जब एक बार काशी जा रहे थे, तब मार्गमें उनके साथ नीलाचल आते हुए गौड़भक्तोंका मिलन हुआ था ॥ 141 ॥ भक्तोंके साथ जल क्रीड़ा :- प्रभुरे मिलिला सर्व वैष्णव आसिया। जलक्रीड़ा कैल प्रभु सबारे लइया ॥ 142 ॥ अनुवाद—नीलाचल आनेपर सभी वैष्णव महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने सबको साथ लेकर जलक्रीड़ा की ॥ 142 ॥ रथके आगे नृत्य और गुण्डिचा-मार्जन :- सबा लञा कैल गुण्डिचा-गृह-संमार्जन। रथयात्रा-दरशने प्रभुर नर्त्तन ॥ 143 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और रथयात्रामें सभीने उनके नृत्यका आनन्दसे दर्शन किया ॥ 143 ॥ विप्रलम्भ-भावमय महाप्रभुका विलास :- उपवने कैल प्रभु विविध विलास। प्रभुर अभिषेक कैल विप्र कृष्णदास ॥ 144 ॥
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