श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 883, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/144-151 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—रथयात्राके मार्गके साथ लगे उपवनमें महाप्रभुने भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन-नृत्य आदि विविध विलास किये। कृष्णदास नामक एक ब्राह्मणने महाप्रभुका अभिषेक किया ॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उपवन'—जिस मार्गसे रथ गुण्डिचा मन्दिर जाता है, उसका नाम बड़दाँड़ है; उसके दोनों ओर जो सब उद्यान हैं, उन्हें 'उपवन' कहा जाता है॥ 144 ॥ नृत्यके अन्तमें जलक्रीड़ा और हेरा-पञ्चमी :— गुण्डिचाते नृत्य-अन्ते कैल जलकेलि। हेरा-पञ्चमी देखिल लक्ष्मीदेवीरे केलि ॥ 145 ॥ अनुवाद—रथयात्राके गुण्डिचा मन्दिर पहुँचनेपर महाप्रभुने नृत्य समाप्तकर जलक्रीड़ा की। हेरा पञ्चमीके दिन उन्होंने लक्ष्मीदेवीकी लीलाका दर्शन किया ॥ 145 ॥ श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीपर गोपलीला :— कृष्णजन्म-यात्राते प्रभु गोपवेश हैल। दधिभार वहिं' तबे लगुड़ फिराइल ॥ 146 ॥ अनुवाद—जन्माष्टमीके दिन महाप्रभुने गोपवेश धारण किया और सिरपर दहीकी मटकियाँ धरकर हाथमें लठिया घुमाते हुए चले ॥ 146 ॥ गौड़ीय भक्तोंको विदायी देना :— गौड़ेर भक्तगणे तबे करिल विदाय। सङ्गेर भक्त लञा करे कीर्त्तन सदाय ॥ 147 ॥ अनुवाद—तत्पश्चात् महाप्रभुने गौड़देशके भक्तोंको विदा किया और नीलाचलमें रहनेवाले भक्तोंके साथ वे सदा कीर्त्तन करते थे ॥ 147 ॥ वृन्दावनके उद्देश्यसे गौड़देश जाते समय प्रतापरुद्रके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— वृन्दावन याइते कैल गौड़ेर गमन। प्रतापरुद्र कैल पथे विविध सेवन ॥ 148 ॥ अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावन जाते हुए गौड़देश गये। उन्हें प्रसन्न करनेके लिये राजा प्रतापरुद्रने मार्गमें उनकी अनेक प्रकारसे सेवाकी व्यवस्था की ॥ 148 ॥ महाप्रभुके साथ-साथ श्रीरायरामानन्दका भद्रक तक आगमन :— पुरीगोसाञि-सङ्गे वस्त्रप्रदान-प्रसङ्ग। रामानन्द राय आइला भद्रक पर्यन्त ॥ 149 ॥ अनुवाद—मार्गमें एक स्थानपर महाप्रभुने पुरी गोसाईंको शचीमाताको देनेके लिये श्रीजगन्नाथके प्रसादी वस्त्र प्रदान किये। श्रीराय रामानन्द उनके साथ भद्रक तक आये ॥ 149 ॥ गौड़देशके विद्यानगरमें आगमन :— आसि' विद्यावाचस्पतिर गृहेते रहिला। प्रभुरे देखिते लोकसंघट्ट हइला ॥ 150 ॥ अनुवाद—विद्यानगर (बङ्गाल) पहुँचकर वे श्रीविद्यावाचस्पतिके घरपर रहे। उनसे मिलनेके लिये आनेवाले लोगोंका ताँता लग गया ॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु वृन्दावन जाते समय जब गौड़मण्डलमें आये, तब वे श्रीविशारदके पुत्र अर्थात् श्रीसार्वभौमके भाई श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें अर्थात् विद्यानगरमें रहे ॥ 150 ॥ कुलियामें आगमन :— पञ्चदिन देखे लोक नाहिक विश्राम। लोकभये रात्रे प्रभु आइला कुलिया-ग्राम ॥ 151 ॥ अनुवाद—पाँच दिनों तक वे लोगोंसे मिलते रहे और उन्हें विश्राम करनेका अवसर ही नहीं मिला। तब वे भीड़से बचनेके लिये रात्रिमें कुलिया-ग्राम आ गये ॥ 151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु विद्यानगरमें पाँच दिन रहे और वहाँ लोगोंकी भीड़ देखकर रात्रिकालमें चुपकेसे कुलिया-ग्राम आ गये। श्रीचैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डके तृतीय अध्यायमें लिखा है,— 30 ।