भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 884, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 884

पहला अध्याय 1/151-159 ] “गङ्गा प्रति महा-अनुराग बाड़ाइया। अति शीघ्र गौड़देशे आइला चलिया ॥ 272 ॥ सार्वभौम-भ्राता 'विद्या-वाचस्पति' नाम।273 (क)। ++आचम्बिते आसि' उत्तरिला तार घर ॥ 274 (ख) ॥ ++नवद्वीप आदि सर्वदिके हैल ध्वनि। वाचस्पति घरे आइलेन न्यासिमणि ॥ 286 ॥ ++कुलियाय आइलेन वैकुण्ठ-ईश्वर। 345 (क)। ++सबे गङ्गा-मध्ये नदीयाय-कुलियाय। शुनि मात्र सर्वलोक महानन्दे धाय ॥ 380 ॥ " अर्थात् “गङ्गाके प्रति महा-अनुराग बढ़ाकर महाप्रभु अति शीघ्र गौड़देशमें चले आये। महाप्रभु अचानक श्रीसार्वभौमके भाई श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें आ पधारे। नवद्वीप आदि सभी जगह यह बात फैल गयी कि श्रीवाचस्पतिके घर संन्यासी शिरोमणि पधारे हैं। (अनेक लोगोंकी भीड़के कारण श्रीवाचस्पतिको भी बिना बताये) महाप्रभु कुलिया चले आये। नदीया और कुलियाके बीचमें गङ्गा बहती हैं, महाप्रभुके कुलिया आनेका समाचार पाकर सब लोग आनन्दसे उधर दौड़ पड़े।” चैतन्यभागवतके इस अध्यायका श्रीलोचनदासके वर्णनके साथ पाठ करनेसे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान 'नवद्वीप' नामक जो स्थान है, वही प्राचीन नवद्वीपके दूसरे पार स्थित उस समयका 'कुलिया-ग्राम' था। उसी स्थानपर देवानन्द पण्डित, गोपाल चापाल और अन्य कई लोगोंका अपराध भञ्जन (क्षमा) हुआ था। तब विद्यानगरसे कुलिया आनेके लिये गङ्गाकी एक धाराको पार करना होता था और कुलियासे नवद्वीप जानेके लिये मूल भागीरथीको (गङ्गाको) पार करना होता था। आजकल इन सब स्थानोंको देखनेसे ऐसा लगता है कि उस समय कुलिया-ग्राममें 'चिनाडाङ्गा' आदि पल्ली और 'कुलियार गञ्ज' जिसे अब 'कोलेर गञ्ज' कहते हैं, वह समस्त भूमि उस समयके कुलियाके बचे हुए अंशके रूपमें है ॥ 151 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़ :- कुलिया-ग्रामेते प्रभुर शुनिया आगमन। कोटि कोटि लोक आसि' कैल दरशन ॥ 152 ॥ अनुवाद-कुलिया ग्राममें महाप्रभुके आगमनका समाचार सुनकर लाखों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये एकत्रित हो गये ॥ 152 ॥ कुलियामें देवानन्द और चापाल-गोपालके अपराध-भञ्जन :- कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देरे प्रसाद। गोपाल-विप्रेरे क्षमाइल श्रीवासापराध ॥ 153 ॥ पाषण्डी निन्दक आसि' पड़िला चरणे। अपराध क्षमि' तारे दिल कृष्णप्रेमे ॥ 154 ॥ अनुवाद-उन्होंने कुलिया ग्राममें देवानन्द पण्डितपर कृपा की और गोपाल-चापाल नामक ब्राह्मणका श्रीवासके चरणोंमें जो अपराध हुआ था, उसे क्षमा करवाया। अनेक नास्तिक और भगवान् एवं भक्तोंकी निन्दा करनेवालोंने महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा याचना की और महाप्रभुने उन्हें क्षमा करके श्रीकृष्णप्रेमका दान किया ॥ 153-154 ॥ अनुभाष्य—'चापाल-गोपालका उद्धार'-आदिलीला 17/55-59 संख्या देखें ॥ 153 ॥ महाप्रभुकी व्रजयात्राको श्रवणकर श्रीनृसिंहानन्दके द्वारा ध्यानमें कानाई-नाटशाला तक मार्ग-सजाना और उसे रत्नोंके द्वारा जड़ना :- वृन्दावन याबेन प्रभु शुनि' नृसिंहानन्द। पथ साजाइल मने करिया आनन्द ॥ 155 ॥ कुलिया नगर हैते पथ रत्ने बान्धाइल। निवृन्त पुष्पशय्या उपरे पातिल ॥ 156 ॥ पथे दुइदिके पुष्पबकुलेर श्रेणी। मध्ये मध्ये दुइपाशे दिव्य पुष्करिणी ॥ 157 ॥ रत्नबन्ध-घाट, ताहे प्रफुल्ल कमल। नाना पक्षि-कोलाहल, सुधा-सम जल ॥ 158 ॥ शीतल समीर बहे नाना गन्ध लञा। 'कानाइर नाटशाला' पर्यन्त लैल बान्धिञा ॥ 159 ॥ । 31