श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 885, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/155-166 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आगे मन नाहि चले, ना पारे बान्धिते। पथबान्धा ना याय, नृसिंह हैला विस्मिते॥160॥ अनुवाद—महाप्रभुके वृन्दावन जानेका समाचार सुनकर श्रीनृसिंहानन्दने आनन्दित होकर उनके मार्गको मन-ही-मनमें सजाया। उन्होंने मन-ही-मन कुलिया नगरसे वृन्दावनतक सुन्दर मार्गकी कल्पना की और उसके ऊपर रत्न जड़कर पुष्पोंकी कोमल पँखुड़ियोंका गद्दा बिछाया, जिससे महाप्रभुके कोमल चरणोंको कोई कष्ट नहीं हो। मार्गके दोनों ओर उन्होंने छायाके लिये बकुलादि पुष्पोंके वृक्ष लगाये और उनके बीच-बीचमें दिव्य निर्मल जलके सरोवर बनाये। उन अमृतके समान जलवाले सरोवरोंके घाट रत्नोंसे जड़ित थे और उनमें सुगन्धित कमल पुष्प खिले हुए थे। नाना प्रकारके पक्षी मधुर कलरव कर रहे थे। पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर शीतल समीर बह रहा था और इस प्रकार उन्होंने 'कानाइर नाटशाला' तक मार्गका निर्माण कर लिया। परन्तु वहाँसे आगे उनका मन चल नहीं रहा था और वे आगे मार्गका निर्माण करनेमें असमर्थ हो गये। श्रीनृसिंहानन्द बड़े विस्मित हो गये कि वे आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहे हैं? ॥ 155-160 ॥ श्रीनृसिंहानन्दकी भविष्यवाणी :- निश्चय करिया कहे,—"शुन, भक्तगण। एबार ना याबेन प्रभु श्रीवृन्दावन ॥ 161 ॥ 'कानाञ्जिर नाटशाला' हैते आसिब फिरिञा। जानिबे पश्चात्, कहिलु निश्चय करिञा॥" 162 ॥ अनुवाद—तब उन्होंने यह निश्चित करके कहा,—"हे भक्तों ! सुनो, महाप्रभु इस बार श्रीवृन्दावन नहीं जायेंगे। वे 'कानाइर नाटशाला'से ही लौट आयेंगे, यह मैं विश्वासपूर्वक कह रहा हूँ। इस बातकी सत्यताको आप लोग बादमें स्वयं देखेंगे ॥" 161-162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस समय महाप्रभु कुलियासे वृन्दावन जा रहे थे, तब ऐसा हुआ—उस समय महाप्रभुके परमभक्त श्रीनृसिंहानन्दने ध्यानमें कुलियासे वृन्दावनतक मार्गका निर्माण और उसे सजाना आरम्भ किया। जब उन्होंने गौड़देशके निकटवर्ती 'कानाइ-नाटशाला' तक पथ तैयार कर लिया, तब उनका चित्त विचलित होनेसे ध्यान भङ्ग हो गया। तभी श्रीनृसिंहानन्दने कहा,—इस बार महाप्रभु केवल कानाइ-नाटशाला तक ही जायेंगे, वृन्दावन नहीं जायेंगे ॥ 160-162 ॥ अनुभाष्य—'कानाइ नाटशाला'—कोलकातासे लगभग दो सौ मीलकी दूरी पर 'तिनपहाड़' स्टेशनपर उतरकर फिर शाखा-लाईनसे राजमहल-स्टेशनसे प्राय छह मीलकी दूरीपर है (वर्तमानमें 'तालझाड़ि' स्टेशनसे दो मीलकी दूरीपर है) ॥ 162 ॥ महाप्रभुकी कुलियासे वृन्दावनकी यात्रा :— गोसाञि कुलिया हैते चलिला वृन्दावन। सङ्गे सहस्रेक लोक यत भक्तगण ॥ 163 ॥ अनुवाद—महाप्रभु कुलियासे वृन्दावनकी ओर चले और उनके साथ हजारों भक्त लोग भी चले ॥ 163 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये असंख्य लोगोंकी भीड़ :— याहाँ याय प्रभु, ताँहा कोटिसंख्य लोक। देखिते आइसे, देखि' खण्डे दुःख-शोक ॥ 164 ॥ अनुवाद—जहाँ-जहाँ महाप्रभु जाते, वहाँ असंख्य लोग उनके दर्शनके लिये आते और उनके दर्शन करके उनके सभी दुःख-शोक दूर हो जाते ॥ 164 ॥ याहाँ याहाँ प्रभुर चरण पड़ये चलिते। से मृत्तिका लय लोक, गर्त्त हय पथे ॥ 165 ॥ अनुवाद—जहाँ-जहाँ महाप्रभुके चरण पड़ते, वहाँसे लोग धूल उठाते और उन लोगोंके धूल उठानेसे मार्गमें गड्ढे पड़ जाते ॥ 165 ॥ रामकेलिमें आगमन :— ऐछे चलि' आइला प्रभु 'रामकेलि' ग्राम। गौड़ेर निकट ग्राम अति अनुपम ॥ 166 ॥ 32 ।