श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 886, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/166-175 ]
याँहा नृत्य करे प्रभु प्रेमे अचेतन। कोटि कोटि लोक आइसे देखिते चरण ॥ 167 ॥
अनुवाद—इस प्रकार चलते हुए महाप्रभु 'रामकेलि' ग्राम पहुँचे। गौड़देशकी सीमाके निकट यह ग्राम अति मनोहर था। वहाँ नृत्य करते हुए महाप्रभु प्रेमके आवेशमें मूर्च्छित हो गये थे। असंख्य लोग उनके चरणकमलोंके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 166-167 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'रामकेलिग्राम'—गौड़देशके निकट गङ्गाके तटपर रामकेलिग्राम है, श्रीरूप-सनातन उस समय वहीं रहते थे ॥ 166 ॥
बादशाहके द्वारा अपने कर्मचारियोंको महाप्रभुके स्वतन्त्र भ्रमणमें बाधा न देनेका आदेश :- गौड़ाध्यक्ष यवन-राजा प्रभाव शुनिञा। कहिते लागिल किछु विस्मित हञा ॥ 168 ॥ “बिना दाने एत लोक याँर पाछे हय। सेइ त' गोसाञा, इहा जानिह निश्चय ॥ 169 ॥ काजी, यवन इहार ना करिह हिंसन। आपन-इच्छाय बुलुन, याहाँ उँहार मन॥”170 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके अद्भुत प्रभावके विषयमें सुनकर बङ्गालका यवन-राजा विस्मित होकर ऐसा कहने लगा,—“ये लोगोंको कुछ दान भी नहीं कर रहे हैं, तो भी यदि इतने लोग उनके पीछे जा रहे हैं, तो निश्चय ही ये पैगम्बर हैं। हे काजी! हे मुसलमानों! इन हिन्दू पैगम्बरसे ईर्ष्या-द्वेष मत करना। अपनी इच्छानुसार वे जहाँ जाना चाहें, उन्हें वहाँ जाने देना॥”168-170 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गौड़ाध्यक्ष यवनराजा'—हुसेनशाह बादशाह ॥ 168 ॥
क्षत्रिय केशवकी महाप्रभुके लिये शुभ इच्छा और उसके अनुसार ही बादशाहको समझाना :- केशव-छत्रीरे राजा वार्त्ता पूखिल। प्रभुर महिमा छत्री उड़ाइया दिल ॥ 171 ॥
“भिखारी संन्यासी करे तीर्थ पर्यटन। ताँरे देखिबारे आइसे दुइ चारि जन ॥ 172 ॥ यवने तोमार ठाञि करये लागानि। ताँर हिंसाय लाभ नाहि, हय आर हानि ॥”173 ॥
अनुवाद—यवन-राजाने अपने सैनिक अधिकारी केशव क्षत्रियसे महाप्रभुके प्रभावके बारेमें जिज्ञासा की, तो उसने महाप्रभुकी महिमाको छिपाते हुए कहा,—“वह एक भिखारी संन्यासी है और तीर्थ भ्रमण करता रहता है। दो-चार लोग ही उससे मिलने आते हैं। आपके मुसलमान सेवक उससे ईर्ष्याके कारण आपको उकसा रहे हैं। उससे ईर्ष्या करनेमें मैं कोई लाभ नहीं देखता हूँ, अपितु इसमें हानि ही हो सकती है॥”171-173 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—क्षत्रिय केशवको महाप्रभुके तत्त्वका ज्ञान था। परन्तु यह विचार करके कि बादशाह यदि अधिक अनुसन्धान करेगा, तो वह महाप्रभुसे शत्रुता करने लगेगा,—इसी आशङ्कासे उसने बादशाहकी बातको बढ़ने नहीं दिया ॥ 171 ॥
गुप्तचरके द्वारा महाप्रभुसे अन्य स्थानपर चले जानेका अनुरोध :- राजारे प्रबोधि' केशव, ब्राह्मण पाठाञा। चलिबार तरे प्रभुके कहिल याञा ॥ 174 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राजाको इस प्रकार समझाकर सैनिक कर्मचारी केशवने एक ब्राह्मणको भेजकर महाप्रभुसे वहाँसे शीघ्र चले जानेका अनुरोध किया॥ 174 ॥
श्रीरूपसे महाप्रभुके विषयमें बादशाहकी जिज्ञासा :- दबिर खासरे राजा पुछिल निभृते। गोसाञिर महिमा तेंहो लागिल कहिते ॥ 175 ॥
अनुवाद—यवन राजाने एकान्तमें दबिर खास (श्रीरूप गोस्वामी)से महाप्रभुके विषयमें जिज्ञासा की, तो वे कहने लगे ॥ 175 ॥
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