श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 887, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/175–185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—‘दबिरखास’—श्रीरूपको उस समयके यवन राजाके द्वारा दिया गया नाम॥175॥ श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके माहात्म्यका कीर्तन :— “ये तोमारे राज्य दिल, ये तोमार गोसाञा। तोमार देशे, तोमार भाग्ये जन्मिला आसिञा॥176॥ तोमार मङ्गल वाञ्छे, वाक्यसिद्ध हय। इहार आशीर्वादे तोमार सर्वत्रइ जय॥177॥ बादशाहकी प्रशंसा :— मोरे केन पुछ, तुमि पुछ आपन–मन। तुमि नराधिप हओ, विष्णु–अंश सम॥178॥ तोमार चित्ते चैतन्येरै कैछे हय ज्ञान। तोमार चित्ते येइ लय, सेइ त’ प्रमाण॥”179॥ अनुवाद—“ये वही आपके अल्लाह (परमेश्वर) हैं, जिन्होंने आपको यह राज्य दिया है और जिनको आप पैगम्बर मान रहे हो। इनका आपके राज्यमें जन्म ग्रहण करनेसे आपके सौभाग्यका उदय हुआ है। ये आपका मङ्गल चाहते हैं, इनकी कृपासे आपके सभी वाक्य सिद्ध हो जायेंगे और इनके आशीर्वादसे सर्वत्र आपकी जय होगी। परन्तु, आप मुझसे यह सब क्यों पूछ रहे हैं? आप स्वयं अपने मनसे पूछिये (वह आपको यथार्थ उत्तर देगा) क्योंकि आप राजा होनेके कारण भगवान् विष्णुके अंश समान हैं। आपके हृदयमें श्रीचैतन्यके प्रति कैसे भाव आते हैं? जो भाव आपके हृदयमें आते हैं, वे ही इस बातका प्रमाण हैं॥”176–179॥ अनुभाष्य—मनुसंहिता(7/8)— “महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति॥” अर्थात् “(राजा) ही नररूपमें महान् देवता है॥”178॥ बादशाहका महाप्रभुको ईश्वरके रूपमें मानना :— राजा कहे,—“शुन, मोर मने येइ लय। साक्षात् ईश्वर इँह, नाहिक संशय॥”180॥ अनुवाद—राजाने कहा,—‘सुनो! मेरे मनमें यही विश्वास उठता है कि ये तो साक्षात् भगवान् हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥”180॥ एत कहि’ राजा गेला निज अभ्यन्तरे। तबे दबिर खास आइला आपनार घरे॥181॥ श्रीरूप-सनातनका विचार-विमर्श :— घरे आसि’ दुइ भाइ युकति करिञा। प्रभु देखिबारे चले वेश लुकाञा॥182॥ अनुवाद—यह कहकर राजा अपने महलके अन्तःपुरमें चले गये। तब दबिर खास अपने घर आ गये। घरमें आकर उन्होंने अपने भाई (श्रीसनातन)से विचार-विमर्श किया और वे दोनों वेश बदलकर महाप्रभुके दर्शनके लिये चल पड़े॥181-182॥ दोनोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये जाना और सबसे पहले श्रीनिताइ और हरिदासके साथ मिलन :— अर्धरात्रे दुइ भाइ आइला प्रभु-स्थाने। प्रथमे मिलिला नित्यानन्द-हरिदास-सने॥183॥ अनुवाद—वे आधी रातमें महाप्रभुके स्थानपर पहुँचे और पहले श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीहरिदास ठाकुरसे मिले॥183॥ ताँरा दुइजन जानाइला प्रभुर गोचरे। रूप, साकरमल्लिक आइला तोमा’ देखिबारे॥184॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुरने महाप्रभुके पास आकर कहा कि रूप और साकरमल्लिक (सनातन) आपके दर्शनके लिये आये हैं॥184॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘साकरमल्लिक’—जिस प्रकार श्रीरूपका नाम दबिरखास हुआ था, उसी प्रकार श्रीसनातनका भी उस समयके राजाके द्वारा दिया गया नाम ‘साकर-मल्लिक’ प्रसिद्ध था॥184॥ दोनोंका दैन्य प्रदर्शन :— दुइ गुच्छ तृण दुँहे दशने धरिञा। गले वस्त्र बान्धि’ पड़े दण्डवत् हञा॥185॥ 34 ।