श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 889, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/190-197 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नास्ति, कश्चन् अपराधी न (नास्ति); परिहारे (अपराधक्षमापणविषये) अपि मे (मम) लज्जा (व्रीडात्मकः सङ्कोचः) [अतः अहं] किं ब्रुवे (कथयामि) [-मम प्रार्थनावसरोऽपि नास्ति इत्यर्थः] । श्लोक-भावानुवाद-मेरे समान न तो कोई पापी है और न ही कोई अपराधी भी है। हे पुरुषोत्तम ! क्या कहूँ? अपने दोषोंको क्षमा करनेकी प्रार्थना करनेमें भी मुझे लज्जा आती है अर्थात् मेरे पाप-अपराध अनन्त और प्रायश्चितके अयोग्य हैं ॥ 190 ॥ पतितपावन-हेतु तोमार अवतार। आमा-बइ जगते, पतित नाहि आर ॥ 191 ॥ जगाइ-मधाइकी अपेक्षा अपनेको अधिक हीन और पापी समझना :- जगाइ-माधाइ दुइ करिले उद्धार। ताँहा उद्धारिते श्रम नहिल तोमार ॥ 192 ॥ ब्राह्मण-जाति तारा, नवद्वीपे घर। नीच-सेवा नाहि करे, नहे नीचेर कूर्पर ॥ 193 ॥ नामाभासके द्वारा ही उनका पापनाश और उद्धार :- सबे एक दोष तार, हय पापाचार। पापराशि दहे नामाभासेइ तोमार ॥ 194 ॥ तोमार नाम लञा तोमार करिल निन्दन। सेइ नाम हइल तार मुक्तिर कारण ॥ 195 ॥ अनुवाद-पतितोंका उद्धार करनेके लिये आपने अवतार लिया है और हमसे अधिक पतित इस जगत्में कोई नहीं है। हे प्रभो ! आपने जगाइ-मधाइ, दोनोंका उद्धार किया है और उनका उद्धार करनेमें आपको कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ा था। (क्योंकि) वे दोनों जातिसे ब्राह्मण थे और उन्होंने पावन नवद्वीपमें जन्म लिया था। उन्होंने नीच लोगोंकी सेवा भी नहीं की थी और वे नीच लोगोंके अधीन भी नहीं थे। उनका तो मात्र एक ही दोष था, वह था पापका आचरण। आपके नामाभाससे ही कूट पापराशि जलकर भस्म हो जाती है। आपका नाम लेकर उन्होंने आपकी निन्दा की और वही नाम (नामाभास) उनकी (पापोंसे) मुक्तिका कारण बन गया ॥ 191-195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जगाइ-मधाइका उद्धार करनेमें आपको अधिक श्रम नहीं हुआ। हम तो उनसे अधिक अधम हैं, हमारा उद्धार करनेके लिये आपको विशेष यत्न करना पड़ेगा। जगाइ-मधाइ तो उच्च ब्राह्मण जातिके थे और वे महातीर्थ नवद्वीपमें वास करते थे। हमारे जैसे उन्होंने कभी भी नीच लोगोंकी सेवा नहीं की थी, वे नीच लोगोंके अधीन भी नहीं थे अर्थात् उनका पालन नीच लोगोंने नहीं किया था; वे केवलमात्र पापाचारी थे। आपके नामाभाससे ही सारे पाप जलकर समाप्त हो जाते हैं; उन्होंने आपका नाम लेकर आपकी निन्दा की थी, वह नाम ही उनकी पापोंसे मुक्तिका कारण बन गया ॥ 192-195 ॥ अनुभाष्य-जगाइ और मधाइ यद्यपि पापी थे, तथापि उन्होंने नीच व्यक्तिके सेवक बनकर स्वयंको बेचकर स्वामीके लिये निन्दनीय कर्म नहीं किये थे। हम उनकी अपेक्षा भी घृणित हैं, क्योंकि हम नीच व्यक्तिके हाथोंकी कठपुतली हैं। हमारा स्वामी हमारे द्वारा ही अनेक प्रकारके नीच कार्य करवाता है। साधुकी निन्दा करनेसे अपराध होता है। विष्णुकी निन्दासे जो अपराध होता है, वह उनका नाम ग्रहण करनेसे विनष्ट हो जाता है ॥ 193-195 ॥ जगाइ-माधाइसे भी अपनेको अधम माननेकी उक्ति :- जगाइ-माधाइ हैते कोटी कोटी गुण। अधम पतित पापी आमि दुइ जन ॥ 196 ॥ म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि म्लेच्छकर्म। गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम ॥ 197 ॥ अनुवाद-जगाइ और मधाइसे भी करोड़ों-करोड़ों गुणा हम दोनों अधम, पतित और पापी हैं। हम म्लेच्छ जातिके हैं, क्योंकि हम म्लेच्छोंका सङ्ग करते हैं और म्लेच्छों जैसे कर्म करते हैं। हाय! हम गो और 36 ।