भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 890

ब्राह्मणोंका वध करनेवालोंका सङ्ग करते हैं॥ 196-197॥ अमृतप्रवाह भाष्य-म्लेच्छ दो प्रकारके हैं- जन्मके द्वारा म्लेच्छ और सङ्गके द्वारा म्लेच्छ। म्लेच्छोंका सङ्ग करनेके कारण हम भी जन्मसे म्लेच्छके जैसे हैं। हमने पतित होकर अनेक प्रकारसे म्लेच्छ व्यवहार किया है, विशेषतः जो सब गो-ब्राह्मणद्रोही म्लेच्छ हैं, हम उनके सङ्गी हैं॥ 197॥ अति कातर स्वरसे दोनोंका दैन्य-विलाप :- मोर कर्म, मोर हाते-गलाय बान्धिया। कु-विषय-विष्ठा-गर्ते दियाछे फेलिया॥ 198॥ अनुवाद-हमारे पापकर्मोंने हमारे हाथ-गलेको बाँधकर हमें विष्ठा-रूपी सांसारिक विषय भोगोंके गर्तमें धकेल दिया है॥ 198॥ अनुभाष्य- 'कु-विषय-विष्ठा-गर्ते'– भोगके वशीभूत होकर इन्द्रियोंकी चेष्टाओंके द्वारा संसारमें जिसे ग्रहण किया जाता है, उसे ही 'विषय' कहते हैं। जिससे पुण्य अर्जित होता है, उसे 'सुविषय' और जिससे पाप अर्जित होता है, उसे 'कुविषय' कहते हैं। सब जड़सुखभोग विष्ठा-जातीय (मलके समान) हैं। श्रीकृष्ण- सेवा ही जीवके लिये परम कल्याणकारी होनेके कारण ग्रहण करनेकी वस्तु है। इन्द्रिय-सेवा घृणित और विसर्जनीय है, इसलिये मलके समान त्यागने योग्य है। त्याग किये हुए मलमें जैसे केवल मलके कीड़ेका अधिकार है, वैसे ही जीव अपनी वास्तविक स्थितिको भूलकर उस मलके कीड़ेके समान विषयरूपी मलमें रहनेको अपना श्रेय (कल्याण) मानकर मात्र मलके कीड़ेकी रुचिका अनुसरण करनेवाला है। गड्ढेमें गिरा व्यक्ति जिस प्रकार स्वयं उससे नहीं निकल सकता, विषयी जीव भी वैसे श्रीकृष्णकी ओर उन्मुख होनेकी चेष्टा करनेपर भी अपने बलपर विषय-मलके गड्ढेरूपी जड़भोगोंको छोड़कर निकलनेमें समर्थ नहीं होता है॥ 198॥ आमा उद्धारिते बली नाहि त्रिभुवने। पतितपावन तुमि-सबे तोमा बिने॥ 199॥ आमा उद्धारिया यदि राख निज-बल। 'पतितपावन' नाम तबै से सफल॥ 200॥ अनुवाद-जो हमारा उद्धार कर सके, ऐसा महाबली तो तीनों लोकोंमें नहीं है। आप ही एकमात्र पतितोंका उद्धार करनेवाले हो, इसलिये आपके बिना हमारा और कोई आश्रय नहीं है। हमारा उद्धार करके अपना दिव्य बल दिखाओ, तभी त्रिभुवनमें प्रसिद्ध आपका 'पतितपावन' नाम सार्थक होगा॥ 199-200॥ सत्य एक बात कहौं, शुन, दयामय। मो-बिनु दयार पात्र जगते ना हय॥ 201॥ मोरे दया करि' कर स्वदया सफल। अखिल ब्रह्माण्ड देखुक तोमार दया-बल॥ 202॥ अनुवाद-हे दयानिधान! हम एक सत्य बात कहते हैं, उसे कृपा करके सुनें, - जगत्में आपकी दयाका योग्यपात्र हमारे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। हमपर दया करके अपनी दयाको सफल करो, जिससे सारा ब्रह्माण्ड आपकी दयाका बल देखे ॥ 201-202॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हम जैसे अत्यन्त पतित व्यक्तिपर दया करके आप अपना स्वदया अर्थात् निज दयालु नाम सफल करें ॥ 202॥ श्रीयमुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न-श्लोक (50) :- न मृषा परमार्थमेव मे शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः। यदि मे न दयिष्यसे तदा दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥ 203 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 203॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आपसे हम एक निवेदन कर रहे हैं, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है, अपितु यह