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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

ब्राह्मणोंका वध करनेवालोंका सङ्ग करते हैं॥ 196-197॥ अमृतप्रवाह भाष्य-म्लेच्छ दो प्रकारके हैं- जन्मके द्वारा म्लेच्छ और सङ्गके द्वारा म्लेच्छ। म्लेच्छोंका सङ्ग करनेके कारण हम भी जन्मसे म्लेच्छके जैसे हैं। हमने पतित होकर अनेक प्रकारसे म्लेच्छ व्यवहार किया है, विशेषतः जो सब गो-ब्राह्मणद्रोही म्लेच्छ हैं, हम उनके सङ्गी हैं॥ 197॥ अति कातर स्वरसे दोनोंका दैन्य-विलाप :- मोर कर्म, मोर हाते-गलाय बान्धिया। कु-विषय-विष्ठा-गर्ते दियाछे फेलिया॥ 198॥ अनुवाद-हमारे पापकर्मोंने हमारे हाथ-गलेको बाँधकर हमें विष्ठा-रूपी सांसारिक विषय भोगोंके गर्तमें धकेल दिया है॥ 198॥ अनुभाष्य- 'कु-विषय-विष्ठा-गर्ते'– भोगके वशीभूत होकर इन्द्रियोंकी चेष्टाओंके द्वारा संसारमें जिसे ग्रहण किया जाता है, उसे ही 'विषय' कहते हैं। जिससे पुण्य अर्जित होता है, उसे 'सुविषय' और जिससे पाप अर्जित होता है, उसे 'कुविषय' कहते हैं। सब जड़सुखभोग विष्ठा-जातीय (मलके समान) हैं। श्रीकृष्ण- सेवा ही जीवके लिये परम कल्याणकारी होनेके कारण ग्रहण करनेकी वस्तु है। इन्द्रिय-सेवा घृणित और विसर्जनीय है, इसलिये मलके समान त्यागने योग्य है। त्याग किये हुए मलमें जैसे केवल मलके कीड़ेका अधिकार है, वैसे ही जीव अपनी वास्तविक स्थितिको भूलकर उस मलके कीड़ेके समान विषयरूपी मलमें रहनेको अपना श्रेय (कल्याण) मानकर मात्र मलके कीड़ेकी रुचिका अनुसरण करनेवाला है। गड्ढेमें गिरा व्यक्ति जिस प्रकार स्वयं उससे नहीं निकल सकता, विषयी जीव भी वैसे श्रीकृष्णकी ओर उन्मुख होनेकी चेष्टा करनेपर भी अपने बलपर विषय-मलके गड्ढेरूपी जड़भोगोंको छोड़कर निकलनेमें समर्थ नहीं होता है॥ 198॥ आमा उद्धारिते बली नाहि त्रिभुवने। पतितपावन तुमि-सबे तोमा बिने॥ 199॥ आमा उद्धारिया यदि राख निज-बल। 'पतितपावन' नाम तबै से सफल॥ 200॥ अनुवाद-जो हमारा उद्धार कर सके, ऐसा महाबली तो तीनों लोकोंमें नहीं है। आप ही एकमात्र पतितोंका उद्धार करनेवाले हो, इसलिये आपके बिना हमारा और कोई आश्रय नहीं है। हमारा उद्धार करके अपना दिव्य बल दिखाओ, तभी त्रिभुवनमें प्रसिद्ध आपका 'पतितपावन' नाम सार्थक होगा॥ 199-200॥ सत्य एक बात कहौं, शुन, दयामय। मो-बिनु दयार पात्र जगते ना हय॥ 201॥ मोरे दया करि' कर स्वदया सफल। अखिल ब्रह्माण्ड देखुक तोमार दया-बल॥ 202॥ अनुवाद-हे दयानिधान! हम एक सत्य बात कहते हैं, उसे कृपा करके सुनें, - जगत्में आपकी दयाका योग्यपात्र हमारे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। हमपर दया करके अपनी दयाको सफल करो, जिससे सारा ब्रह्माण्ड आपकी दयाका बल देखे ॥ 201-202॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हम जैसे अत्यन्त पतित व्यक्तिपर दया करके आप अपना स्वदया अर्थात् निज दयालु नाम सफल करें ॥ 202॥ श्रीयमुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न-श्लोक (50) :- न मृषा परमार्थमेव मे शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः। यदि मे न दयिष्यसे तदा दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥ 203 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 203॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आपसे हम एक निवेदन कर रहे हैं, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है, अपितु यह

[ 1/203–208 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परमार्थसे (सत्यसे) परिपूर्ण है; वह यह है कि यदि आप हमारे प्रति दया नहीं करेंगे, तब हे नाथ! आप उपयुक्त दयाका पात्र और कहाँ पायेंगे? ॥ 203 ॥ अनुभाष्य— हे नाथ (प्रभो,) [तव] अग्रतः (पुरतः) मे (मम) एकं परमार्थं (वास्तवं) एव विज्ञापनं (निवेदनं) शृणु, - न [तत्] मृषा (मिथ्या); यदि मे (मम सम्बन्धे मयि) न दयिष्यसे (दयां करिष्यसि), तदा तव दयनीयः (दयार्हः) दुर्लभः। [सर्वार्धमत्वात् दयायोग्यपात्रत्वात् मम अपकृष्टत्वस्य आधिक्यम्]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य देखें ॥ 203 ॥ आपने अयोग्य देखि' मने पाङ क्षोभ। तथापि तोमार गुणे उपजय लोभ ॥ 204 ॥ वामन हञा चाँद धरिते इच्छा करे। तैछे मोर एइ वाञ्छा उठये अन्तरे ॥"205 ॥ अनुवाद—अपनेको आपकी कृपाके अति अयोग्य जानकर हमारे मनमें क्षोभ हो रहा है, परन्तु आपके दिव्य गुणोंको देखकर हमारे हृदयमें लोभ भी उत्पन्न हो रहा है। जैसे बौना व्यक्ति चाँदको पकड़नेकी असम्भव इच्छा करे, वैसे ही हमारे मनमें भी ऐसी महत् कामना जाग्रत हो रही है॥"204-205 ॥ श्रीमद्यमुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न-श्लोक (46) :— भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्तनिःशेषमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामि सनाथजीवितम् ॥ 206 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपकी निरन्तर सेवाके द्वारा अन्य मनोरथोंसे सर्वथा रहित होकर प्रशान्तभावसे मैं कब अपनेको आपके नित्यदास कहकर दास्यजीवनके सहित आनन्दसे प्रफुल्लित होऊँगा ? ॥ 206 ॥ अनुभाष्य— हे नाथ, (प्रभो,) प्रशान्तनिःशेष-मनोरथान्तरः (प्रशान्तं निश्चलं निःशेषं सम्पूर्णं मनोरथानां वासनानां अन्तरं यस्य सः) ऐकान्तिकनित्यकिङ्करः (दृढ़नित्यदासः सन्) सः अहं भवन्तं (मम सेव्यं त्वम्) एव निरन्तरः (सान्द्रः) अनुचरन् (परिचर्यां कुर्वन् घनमनुगच्छन्) कदा (कस्मिन्काले) जीवितं (प्राणान्) प्रहर्षयिष्यामि (सर्वतोभावेन सुखयिष्यामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206 ॥ श्रीरूपको लक्ष्य करके दोनोंके लिये महाप्रभुके कृपामय वचन :— शुनि' महाप्रभु कहे, — “शुन, दबिर खास। तुमि दुइ भाइ—मोर पुरातन दास ॥ 207 ॥ आजि हैते दुँहार नाम 'रूप' 'सनातन'। दैन्य छाड़, तोमार दैन्ये फाटे मोर मन ॥ 208 ॥ अनुवाद—उनकी प्रार्थना सुनकर महाप्रभु बोले,— “सुनो, दबिर खास, तुम दोनों भाई मेरे प्राचीन (नित्य) दास हो। आजसे तुम दोनोंके नाम रूप और सनातन होंगे। अपनी दीनताका त्याग करो, तुम्हारे दैन्य भावसे मेरा हृदय फटा जा रहा है॥ 207-208 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने प्रसादके रूपमें दबिरखासका नाम 'रूप' और साकर मल्लिकका नाम 'सनातन' रखा। गुरुके द्वारा वैध कनिष्ठ-अधिकारीका नामकरण एक संस्कार है। जो गुरुके द्वारा प्रदान किये नाम-प्रसादकी अवज्ञा करते हैं अर्थात् उसका अनादर करते या उसमें दोष देखते हैं, उनके द्वारा हरिभक्तिकी सम्भावना नहीं है; वे जड़ जगत्की प्रतिष्ठामें मत्त रहते हैं। “शङ्खचक्राद्यूर्ध्वपुण्ड्र तन्नामकरणञ्चैव वैष्णवत्वमिहोच्यते ॥” अर्थात् “शङ्ख, चक्र, पद्म, गदा आदि विष्णु चिह्न और उर्ध्वपुण्ड्र करना एवं गुरुके द्वारा उनका नामकरण—ये सभी कनिष्ठ वैष्णवोंके लक्षण हैं।” प्राकृत सहजियोंमें विष्णु-दास्यपरक नामकरण नहीं होनेसे उन्हें अब 'गौड़ीय वैष्णव' नहीं कहा जा सकता। अवैष्णव लोग वैष्णव-गुरुसे नाम नहीं प्राप्त करते। 38 ।

पहला अध्याय 1/208-216 ] इसलिये वे देहात्मबुद्धिके वशीभूत होकर हरिसे अपने सम्बन्धको न जाननेके कारण सामाजिक वर्णोचित नामादिके संरक्षणमें ही प्रमत्त रहते हैं ॥ 208 ॥ दैन्यपत्री लिखि' मोरे पाठाले बार बार। सेइ पत्रीद्वारा जानि तोमार व्यवहार ॥ 209 ॥ तोमार हृदय आमि जानि पत्र-द्वारे। तोमा शिखाइते श्लोक कहिलुँ बारे-बारे ॥ 210 ॥ अनुवाद—तुमने अनेक दैन्यपत्र लिखकर मुझे भेजे थे। उन्हें पढ़कर मैं तुम्हारे व्यवहारको अच्छी प्रकार जान गया था। तुम्हारे हृदयके भावोंको पत्रोंके द्वारा भली-भाँति जानकर मैंने तुम्हें शिक्षा देनेके लिये एक श्लोक (निम्नलिखित) को बार-बार लिखकर भेजा था ॥ 209-210 ॥ रागमार्गीय भक्तका लोक-व्यवहार :- महाप्रभुके द्वारा उक्त श्लोक- परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मसु। तमेवास्वादयत्यन्तर्नवसङ्गरसायनम् ॥ 211 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परपुरुषमें अनुरक्त रमणी (नारी) सभी गृहकर्मोंमें व्यग्रता दिखानेपर भी अन्तःकरणमें (अपने प्रेमीके साथ) नूतन सङ्गरसका आस्वादन करती है॥ 211 ॥ अनुभाष्य- परव्यसनिनी (निजपतिभिन्नापरपुरुषसङ्गामोदिनी) नारी (कुलरमणी) गृहकर्मसु व्यग्रा (पतिपुत्रसेवादिषु सेवैकपरताप्रदर्शनपरा) अपि अन्तः (हृदयाभ्यन्तरे) तं नवसङ्गरसायनं (नवनवकान्तसङ्गसुखरसस्थानम्) एव आस्वादयति। [यथा पत्यन्तर-भजनपरा नारी स्व-गृहधर्मपरा भूत्वा संसारे स्थित्वापि जारसङ्गसुखेन दिनानि यापयति, तथा वैधवर्णाश्रम-धर्मपालनेन मूढान् वञ्चयित्वा, चतुराणां वैष्णवानां हरिदास्यमेव भजन-चातुर्यम्]। श्लोक-भावानुवाद—जो कुलरमणी अपने पतिके बदले किसी दूसरे पुरुषसे प्रेम करती है, वह पति-पुत्रादिकी सेवामें अत्यन्त तत्परता दिखलाती है, परन्तु अपने हृदयमें वह अपने प्रेमीसे मिलनेके नव-नव रसोंका आस्वादन करती है। [जैसे पतिके स्थानपर अन्य पुरुषसे प्रेम करनेवाली नारी अपने गृहधर्म पालन करके संसारमें रहकर प्रेमीके सङ्गके सुखको हृदयमें आस्वादन करती हुई दिन यापन करती है, वैसे ही वैध-वर्णाश्रम- धर्मका पालन करके मूढ़ लोगोंकी वञ्चना करते हुए चतुर वैष्णवोंका हरिदास्यमें ही भजन-चातुर्य है।]॥ 211 ॥ रूप-सनातनको देखनेके लिये महाप्रभुका रामकेलिमें आगमन :- गौड़-निकट आसिते नाहि मोर प्रयोजन। तोमा-दुँहा देखिते मोर इँहा आगमन ॥ 212 ॥ एइ मोर मनेर कथा केह नाहि जाने। सबे बोले, केने आइला रामकेलि-ग्रामे ॥ 213 ॥ उत्कण्ठित दोनों भाइयोंको महाप्रभुका आश्वासन देना :- भाल हैल, दुइ भाइ आइला मोर स्थाने। घरे याह, भय किछु ना करिह मने ॥ 214 ॥ जन्मे जन्मे तुमि दुइ-किङ्कर आमार। अचिराते कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥" 215 ॥ अनुवाद-गौड़देशके निकट आनेका मेरा कोई प्रयोजन नहीं था, मैं तो केवल तुम दोनोंसे मिलनेके लिये यहाँ आया हूँ। मेरे मनकी यह बात कोई नहीं जानता है, इसलिये सब मुझसे रामकेलि ग्राममें आनेके कारणकी जिज्ञासा करते हैं। यह बहुत अच्छा हुआ कि तुम दोनों भाई मुझसे मिलने आये। अब तुम अपने घरको लौट जाओ और मनमें कोई भय मत करो। तुम मेरे जन्म-जन्मके सेवक हो, श्रीकृष्ण शीघ्र ही तुम्हारा उद्धार करेंगे॥" 212-215 ॥ दोनोंका महाप्रभुके श्रीचरणोंको शीशपर धारण करना :- एत बलि' दुँहार शिरे धरिल दुइ हाते। दुइ भाइ धरि' प्रभुर पद निल माथे ॥ 216 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने अपने दोनों हाथ । 39

[ 1/216-226 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उन दोनोंके सिरपर रख दिये और उन दोनों भाइयोंने महाप्रभुके चरणोंको अपने सिरपर धारण किया॥ 216॥ कृपासे द्रवित महाप्रभुका दोनोंपर भक्तोंसे कृपा करनेका आवेदन :- दौँ हा आलिङ्गिया प्रभु बलिल भक्तगणे। “सबे कृपा करि' उद्धार' एइ दुइ जने॥” 217॥ अनुवाद—महाप्रभुने दोनोंको उठाकर उनका आलिङ्गन किया और सभी भक्तोंको उन दोनोंपर कृपा करके उनका उद्धार करनेको कहा॥ 217॥ भक्तोंका विस्मय और आनन्द :- दुइजने प्रभुर कृपा देखि' भक्तगणे। 'हरि' 'हरि' बोले सबे आनन्दित-मने॥ 218॥ अनुवाद—उन दोनोंपर महाप्रभुकी कृपा देखकर सभी भक्त आनन्दित होकर 'हरि' 'हरि' बोलने लगे॥ 218॥ सभी भक्तोंके चरणोंमें कृपाकी याचना और सबके द्वारा धन्यवादकी प्राप्ति :- नित्यानन्द, हरिदास, श्रीवास, गदाधर। मुकुन्द, जगदानन्द, मुरारि, वक्रेश्वर॥ 219॥ सबार चरणे धरि' पड़े दुइ भाइ। सबे बोले, -धन्य तुमि, पाइले गोसाञि॥ 220॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीमुकुन्द दत्त, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीवक्रेश्वर पण्डित आदि महाप्रभुके जितने भक्त वहाँ उपस्थित थे, श्रीरूप और सनातन, दोनों भाइयोंने गिरकर सबके चरणकमलोंको पकड़ा और सभी भक्त उन्हें आशीर्वाद देते कहने लगे कि तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने महाप्रभुकी कृपा प्राप्त की है॥ 219-220॥ विदायीके समय श्रीसनातनका महाप्रभुको सत्परामर्श :- सबा-पाश आज्ञा मागि' चलन-समय। प्रभु-पदे कहे किछु करिया विनय॥ 221॥ “इहाँ हैते चल, प्रभु, इँहा नाहि काज। यद्यपि तोमारे भक्ति करे गौड़राज॥ 222॥ तथापि यवन जाति, ना करिह प्रतीति। तीर्थयात्राय एत संघट्ट, भाल नहे रीति॥ 223॥ अपने भजन-क्षेत्रमें बहुत बहिरङ्ग लोगोंका होना अप्रयोजनीय :- याहाँ सङ्गे चले एइ लोक लक्षकोटि। वृन्दावन याइबार ए नहे परिपाटी॥” 224॥ अनुवाद—चलते समय दोनोंने सभीसे जानेकी आज्ञा माँगी और महाप्रभुके चरणकमलोंमें एक निवेदन किया। (श्रीसनातन गोस्वामी) ने कहा, - “हे प्रभो! यद्यपि बङ्गालका राजा आपका बहुत सम्मान करता है, तथापि आपका अब यहाँ और कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिये आप यहाँसे प्रस्थान करें। राजा यवन जातिका है, इसलिये उसका अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता है। तीर्थयात्रापर इतनी भीड़के साथ जानेकी रीति अच्छी नहीं है। आपके साथ हजारों-लाखों लोग जा रहे हैं, वृन्दावन जानेकी यह परिपाटी नहीं है॥” 221-224॥ स्वयं परमेश्वर होते हुए भी आचार्यरूपसे कनिष्ठाधिकारीको शिक्षाका सुयोग प्रदान :- यद्यपि वस्तुतः प्रभुर किछु नाहि भय। तथापि लौकिकलीला, लोक-चेष्टामय॥ 225॥ अनुवाद—यद्यपि वास्तवमें महाप्रभुको किसीसे कोई भय नहीं है, तो भी उन्होंने लौकिक लीलाके अनुरूप जगत्में शिक्षा देनेके लिये साधारण मनुष्यके जैसा आचरण किया॥ 225॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 16/265-276 संख्या देखें॥ 221-225॥ दोनों भाइयोंका विदायी ग्रहण करना :- एत बलि' चरण वन्दि' गेला दुइजने। प्रभुर सेइ ग्राम हैते चलिते हैल मन॥ 226॥ 40 ।

पहला अध्याय 1/226-235 ]

अनुवाद-ऐसा कहकर दोनों भाई महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना करके अपने घरको लौट गये। तब महाप्रभुने रामकेलि ग्रामसे प्रस्थान करनेका निश्चय किया॥ 226 ॥

रामकेलिसे ‘कानाइ नाट्यशाला' :- प्राते चलि' आइला 'कानाइर नाटशाला'। देखिल सकल ताँहा कृष्णचरित्र-लीला ॥ 227 ॥

अनुवाद-प्रातः कालमें महाप्रभु ‘कानाइ-नाटशाला' में आये और उन्होंने वहाँ श्रीकृष्णकी अनेक लीलाओंका दर्शन किया॥ 227 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- ‘कृष्णचरित्र-लीला'-उस समयमें गौड़देशके अनेक स्थानोंपर ‘कानाइ-नाटशाला' नामक स्थानकी व्यवस्था थी। गौड़देशके निकट जो कनाइ- नाटशाला थी, वहाँ महाप्रभुने कृष्णलीलाके नाना प्रकारके चित्रवर्णन देखे॥ 227 ॥

सनातनके परामर्शके अनुसार महाप्रभुके द्वारा वृन्दावन जानेकी इच्छाका त्याग :- सेइ रात्रे ताँहा प्रभु चिन्ते मने मन। 'सङ्गे संघट्ट भाल নহে, बोले सनातन ॥ 228 ॥ मथुरा याइब आमि एत लोक सङ्गे। किछु सुख ना हइबे, हवे रसभङ्गे ॥ 229 ॥ एकाकी याइब, किम्वा सङ्गे एक जन। तबे से शोभय वृन्दावनेरे गमन ॥ '230 ॥

अनुवाद-उस रात्रिमें श्रीसनातनकी बातपर विचार करके महाप्रभुने निर्णय लिया, - 'इतने लोगोंको साथ लेकर वृन्दावन जाना उचित नहीं है। यदि मैं मथुरा इतने लोगोंके साथ जाऊँगा, तो कोई आनन्द नहीं आयेगा और रस भङ्ग हो जायेगा। यदि मैं अकेले अथवा केवल एक व्यक्तिको लेकर जाऊँगा, तो वृन्दावनकी यात्रा बड़ी सुखप्रद होगी ॥ '228-230 ॥

अनुभाष्य-मध्यलीला 16/265-276 संख्या देखें ॥ 229-230 ॥

नीलाचलकी ओर जाते हुए शान्तिपुरमें आगमन और वहाँ पाँच-सात दिन ठहरना :- एत चिन्ति' प्रातःकाले गङ्गास्नान करि'। 'नीलाचले याब' बलि' चलिला गौरहरि ॥ 231 ॥ एइमत चलि' चलि' आइला शान्तिपुरे। दिन पाँच-सात रहिला आचार्येर घरे ॥ 232 ॥

अनुवाद-इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन्होंने प्रातःकाल गङ्गामें स्नान किया और अपनी यात्रा आरम्भ करते हुए सबसे कहा, - 'मैं नीलाचल जाऊँगा।' चलते-चलते वे शान्तिपुर आये और वे श्रीअद्वैताचार्यके घरमें पाँच-सात दिन रहे ॥ 231-232 ॥

श्रीअद्वैताचार्यके घरमें शचीमाताके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- शचीदेवी आसि' ताँरे कैल नमस्कार। सातदिन ताँर ठाञि भिक्षा-व्यवहार ॥ 233 ॥

अनुवाद-महाप्रभुके शान्तिपुर आनेका समाचार सुनकर शचीमाता भी वहाँ आयीं और महाप्रभुने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने सात दिन वहाँ रहकर महाप्रभुके लिये भोजन बनाया ॥ 233 ॥

अनुभाष्य-मध्यलीला 16/212-216, 223, 234, 245-250 संख्या और चैः भाः अन्त्यखण्ड तीसरा अध्याय देखें ॥ 232-233 ॥

सब भक्तोंको विदायी देना और रथयात्राके समय पुरीमें मिलनेका आदेश :- ताँर आज्ञा लञा पुनः करिला गमने। विनय करिया विदाय दिल भक्तगणे ॥ 234 ॥ “जना दुइ सङ्गे आमि याब नीलाचले। आमारे मिलिबा आसि' रथयात्रा-काले ॥ "235 ॥

अनुवाद-शचीमातासे आज्ञा लेकर महाप्रभु नीलाचलकी ओर चले, तो भक्त लोग उनके पीछे-पीछे चलने लगे। महाप्रभुने उनसे अनुनय-विनय करके

। 41

[ 1/234-243 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वापिस लौट जानेको कहा और उनसे विदायी ली। महाप्रभुने भक्तोंसे कहा,—“मैं नीलाचल केवल दो लोगोंको साथ लेकर जाऊँगा और बाकी सभी लौट जाँय और रथयात्राके समय मुझसे श्रीजगन्नाथपुरीमें आकर मिलना॥” 234-235 ॥ बलभद्र और दामोदर पण्डितके साथ पुरीमें आगमन :- बलभद्र भट्टाचार्य, आर पण्डित दामोदर। दुइजन-सङ्गे प्रभु आइला नीलाचल ॥ 236 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बलभद्र भट्टाचार्य और दामोदर पण्डितको अपने साथ लेकर नीलाचल आये ॥ 236 ॥ अनुभाष्य—'दामोदर पण्डित'—आदिलीला 10/31 संख्या और अन्त्यलीला तीसरा अध्याय देखें ॥ 236 ॥ कुछ दिन पुरीमें रहनेके बाद वृन्दावनकी यात्रा :- दिन कत रहि' ताँहा चलिला वृन्दावन। लुकाञा चलिला रात्रे, ना जाने कोन जन ॥ 237 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें कुछ दिन रहनेके बाद एक रात्रिमें बिना किसीको बताये वे वृन्दावनकी ओर चल पड़े ॥ 237 ॥ महाप्रभुके साथ एकमात्र बलभद्र भट्ट :- बलभद्र भट्टाचार्य रहे मात्र सङ्गे। झारिखण्ड-पथे काशी आइला नानारङ्गे ॥ 238 ॥ अनुवाद—उन्होंने केवल बलभद्र भट्टाचार्यको ही अपने साथ लिया और झारखण्डके रास्तेसे होते हुए वे आनन्दपूर्वक काशी पहुँचे ॥ 238 ॥ अनुभाष्य— 'बलभद्र'—आदिलीला, 10/146 संख्या और 'झारिखण्ड पथसे महाप्रभुका काशीगमन'—मध्यलीला, 17/3-82 संख्या देखें ॥ 236-238 ॥ काशीमें आगमन और चार दिन तक वास करनेके बाद मथुरा-गमन :- दिन चारि काशीते रहि' गेला वृन्दावन। मथुरा देखिया देखे द्वादश कानन ॥ 239 ॥ अनुवाद—वे चार दिनों तक काशीमें रहे और फिर वे वृन्दावनकी ओर चले। मथुराके दर्शन करके उन्होंने व्रजके बारह वन देखे ॥ 239 ॥ अनुभाष्य— 'द्वादशकानन'—काम्यवन, तालवन, तमालवन, मधुवन, कुसुमवन, भाण्डीरवन, बिल्ववन, भद्रवन, खदिरवन, लोहवन, कुमुदवन और गोकुल- महावन ॥ 239 ॥ वृन्दावनमें प्रेमोन्माद, तत्पश्चात् मथुरा होकर प्रयाग :- लीलास्थल देखि' प्रेमे हइला अस्थिर। बलभद्र कैल ताँरे मथुरार बाहिर ॥ 240 ॥ अनुवाद—लीलास्थलियोंके दर्शन करके महाप्रभु प्रेममें भावाविष्ट हो गये। बलभद्र उन्हें किसी प्रकारसे मथुरासे बाहर लेकर आये ॥ 240 ॥ प्रयागमें दशाश्वमेधघाटपर श्रीरूपके साथ मिलन :- गङ्गातीर-पथे लञा प्रयागे आइला। श्रीरूप प्रभुरे आसि' तथाइ मिलिला ॥ 241 ॥ दण्डवत् करि' रूप भूमिते पड़िला। परम आनन्दे प्रभु आलिङ्गन दिला ॥ 242 ॥ अनुवाद—मथुरासे निकलकर वे गङ्गाके किनारे चलते-चलते प्रयाग पहुँचे और श्रीरूप गोस्वामी वहाँ आकर उनसे मिले। श्रीरूप गोस्वामीने भूमिपर गिरकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने बड़े आनन्दसे उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 241-242 ॥ श्रीरूपको शिक्षा देकर वृन्दावन भेजना और स्वयं काशीमें गमन :- श्रीरूपे शिक्षा कराइ' पाठा'न वृन्दावन। आपने करिला वाराणसी आगमन ॥ 243 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीको शिक्षा देकर उन्हें वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी और वे स्वयं वाराणसी आ गये ॥ 243 ॥ 42 ।

पहला अध्याय 1/241-253 ] अनुभाष्य—'श्रीरूप-मिलन और शिक्षा'-मध्यलीला उन्नीसवाँ अध्याय देखें ॥ 241-243 ॥ काशीमें श्रीसनातनके साथ मिलन और उनको शिक्षा प्रदान :- काशीते प्रभुके आसि' मिलिला सनातन। दुइ मास रहि' ताँरे कराइला शिक्षण ॥ 244 ॥ श्रीसनातनको मथुरामण्डलमें भेजना और प्रकाशानन्दका उद्धार :- मथुरा पाठाइला ताँरे दिया भक्तिबल। संन्यासीरे कृपा करि' गेला नीलाचल ॥ 245 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी काशीमें आकर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने दो महीने वहाँ रहकर उन्हें शिक्षा दी। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीमें भक्तिका बल सञ्चारित करके उन्हें मथुरा भेजा और काशीमें प्रकाशानन्दादि मायावादी संन्यासियोंपर कृपा करके उनका उद्धार किया और तब वे नीलाचल लौट आये ॥ 244-245 ॥ अनुभाष्य—'श्रीसनातन-मिलन और शिक्षा'-मध्यलीला बीसवाँ अध्याय देखें ॥ 244 ॥ छह वर्ष इधर-उधर गमनागमन रूप 'मध्यलीला' :- छय वत्सर प्रभु ऐछे करिला विलास। कभु इति-उति-गति, कभु क्षेत्रवास ॥ 246 ॥ पुरीमें भक्तोंके साथ नित्य कीर्तन और श्रीजगन्नाथ दर्शन :- आनन्दे भक्तसङ्गे सदा कीर्त्तन-विलास। जगन्नाथ-दरशन, प्रेमेर विलास ॥ 247 ॥ अनुवाद—कभी पुरीमें रहकर और कभी अन्य स्थानोंमें भ्रमण करके छह वर्ष महाप्रभुने ऐसी लीलाएँ कीं। पुरीमें महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ सदा आनन्दमें विभोर होकर सङ्कीर्तन करते और श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करके प्रेममें भावाविष्ट हो जाते ॥ 246-247 ॥ अन्त्यलीलाके सूत्रोंका आरम्भ :- मध्यलीलार कैलुँ एइ सूत्र-विवरण। अन्त्यलीलार सूत्र एबे शुन, भक्तगण ॥ 248 ॥ अनुवाद—मैंने (ग्रन्थकार कृष्णदास कविराज) अभी तक मध्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया। हे भक्तों! अब अन्त्यलीला सूत्ररूपमें सुनो ॥ 248 ॥ छह वर्षोंके बाद बाकी अठारह वर्षों तक केवल पुरीमें वास :- वृन्दावन हैते यदि नीलाचले आइला। आठार वर्ष ताँहा वास, काँहा नाहि गेला ॥ 249 ॥ चातुर्मास्यमें गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके साथ पुरीमें वास :- प्रतिवर्ष आइसेन ताँहा गौड़ेर भक्तगण। चारि मास रहे प्रभुर सङ्गे सम्मिलन ॥ 250 ॥ नित्यकाल कृष्ण कीर्तन और प्रेमभक्तिका दान :- निरन्तर नृत्य-गीत-कीर्त्तन-विलास। आ-चण्डाले प्रेमभक्ति करिला प्रकाश ॥ 251 ॥ अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावनसे लौटकर नीलाचल आये और बाकी अठारह वर्षों तक केवल वहीं वास किया और वहाँसे किसी और स्थानपर नहीं गये। गौड़देशसे भक्त प्रतिवर्ष नीलाचल आते और चार मास तक महाप्रभुके सङ्गमें रहते। पुरीमें महाप्रभु निरन्तर नृत्य-गीत और सङ्कीर्तन विलासमें डूबे रहते। उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपासे चाण्डाल जैसे नीच लोगोंको भी श्रीकृष्ण-प्रेमाभक्तिका दान किया ॥ 249-251 ॥ श्रीगदाधर पण्डितका क्षेत्र-संन्यास और पुरीप्रवासी भक्तगण :- पण्डित-गोसाञि कैल नीलाचले वास। वक्रेश्वर, दामोदर, शङ्कर, हरिदास ॥ 252 ॥ जगदानन्द, भवानन्द, गोविन्द, काशीश्वर। परमानन्दपुरी, आर स्वरूप-दामोदर ॥ 253 ॥ । 43

[ 1/252-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला क्षेत्रवासी रामानन्द राय प्रभृति। प्रभुसङ्गे एइ सब नित्य कैल स्थिति ॥ 254 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित क्षेत्र संन्यास लेकर नीलाचलमें ही वास करने लगे। श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीदामोदर, श्रीशङ्कर, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीजगदानन्द, श्रीभवानन्द, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीपरमानन्दपुरी, और श्रीस्वरूप दामोदर तथा नीलाचलवासी श्रीराय रामानन्द आदिने महाप्रभुके साथ पुरीमें ही नित्यवास किया और पुरीसे बाहर कभी भी नहीं गये ॥ 252-254 ॥ प्रतिवर्ष गौड़ीय भक्तोंका महाप्रभुके साथ चातुर्मास्य-यापन :- अद्वैत, नित्यानन्द, मुकुन्द, श्रीवास। विद्यानिधि, वासुदेव, मुरारि,-यत दास ॥ 255 ॥ प्रतिवर्षे आइसे, सङ्गे रहे चारिमास। ताँ-सबा लञा प्रभुर विविध विलास ॥ 256 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द, श्रीवास पण्डित, श्रीविद्यानिधि, श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि गुप्त आदि महाप्रभुके परिकर प्रतिवर्ष पुरीमें आकर चार मास तक रहते और महाप्रभु उनके साथ अनेक प्रकारसे लीला विलासका आनन्द लेते ॥ 255-256 ॥ ठाकुर हरिदासका पुरीमें निर्वाण :- हरिदासरे सिद्धिप्राप्ति,-अद्भुत से सब। आपनि महाप्रभु याँर कैल महोत्सव ॥ 257 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरका देह निर्वाण पुरीमें हुआ। यह एक अद्भुत घटना थी, क्योंकि महाप्रभुने स्वयं उनका विरह महोत्सव मनाया था ॥ 257 ॥ अनुभाष्य—'ठाकुर हरिदास निर्वाण'—अन्त्यलीला ग्यारहवाँ अध्याय देखें ॥ 257 ॥ श्रीरूपका पुरीमें आगमन :- तबे रूप-गोसाञिर पुनरागमन। ताँहार हृदये कैल प्रभु शक्ति-सञ्चारण ॥ 258 ॥ अनुवाद—तब श्रीरूप गोस्वामी पुनः पुरी आये और महाप्रभुने उनके हृदयमें अपनी दिव्य शक्ति सञ्चारित की ॥ 258 ॥ अनुभाष्य—चिच्छक्ति अथवा अप्राकृत-बलसञ्चार; चिच्छक्तिसे रहित होनेपर या मायाशक्ति-सञ्चारसे भोगलालसाकी वृद्धि होती है। अन्त्यलीला प्रथम अध्याय देखें ॥ 258 ॥ छोटा हरिदासको दण्ड और दामोदर पण्डितका वाक्य दण्ड :- तबे छोट हरिदासे प्रभु कैल दण्ड। दामोदर-पण्डित कैल प्रभुके वाक्यदण्ड ॥ 259 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने छोटा हरिदासको दण्ड-स्वरूप उसका बहिष्कार कर दिया और दामोदर पण्डितने महाप्रभुको कुछ चेतावनीके वाक्य कहे ॥ 259 ॥ अनुभाष्य—'छोटा हरिदास'—अन्त्यलीला, दूसरा अध्याय देखें। दामोदरका 'वाक्यदण्ड'—अन्त्यलीला, तीसरा अध्याय देखें। महाप्रभुको अज्ञानी लोग न समझकर यदि उनपर कटाक्ष करेंगे, तो इस प्रकारका प्रदर्शन ही महाप्रभुके प्रति वाक्य-दण्ड है। दामोदर-पण्डितका महाप्रभुके लिये इस प्रकार वाक्यका प्रयोग भक्तोंके विचारानुसार दण्डात्मक वाक्यमात्र है। यह निग्रह-अनुग्रह-समर्थ व्यक्तियोंको दूसरोंके द्वारा सावधान किया जाना अनाधिकार-चर्चा मात्र है ॥ 259 ॥ श्रीसनातनका पुरीमें आगमन :- तबे सनातन-गोसाञिर पुनरागमन। ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे कैल परीक्षण ॥ 260 ॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामी पुनः पुरी आये और महाप्रभुने ज्येष्ठ मासमें उनकी परीक्षा ली ॥ 260 ॥ अनुभाष्य—'श्रीसनातन गोस्वामी'—अन्त्यलीला चौथा अध्याय देखें ॥ 260 ॥ 44 ।

पहला अध्याय 1/261-266 ] श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन भेजना और श्रीअद्वैत-घरमें भिक्षा :- तुष्ट हञा प्रभु ताँरे पाठाइला वृन्दावन। अद्वैतेर हस्ते प्रभुर अद्भुत भोजन ॥ 261 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीसे सन्तुष्ट होकर महाप्रभुने उन्हें वृन्दावन वापिस भेज दिया। श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको अपने हाथोंसे भोजन करानेकी अद्भुत लीला की ॥ 261 ॥ अनुभाष्य— 'श्रीअद्वैतगृहेमें महाप्रभुका अकेले भोजन'—अन्त्यलीला आठवाँ अध्याय देखें ॥ 261 ॥ गौड़देशमें श्रीनित्यानन्दको नाम-प्रेम-प्रचारार्थ भेजना :- नित्यानन्द-सङ्गे युक्ति करिया निभृते। ताँरे पाठाइला गौड़े प्रेम प्रचारिते ॥ 262 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने एकान्तमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ विचार-विमर्श करके उनको कृष्णप्रेमको वितरित करनेके लिये गौड़देशमें भेज दिया ॥ 262 ॥ अनुभाष्य— 'श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देशमें नाम-प्रचारकी आज्ञा देना'—मध्यलीला, 15/42, 16/59-67 संख्या देखें ॥ 262 ॥ वल्लभभट्टका गर्व-नाश और कृष्णनाम-महिमा-श्रवण :- तबे त' वल्लभभट्ट प्रभुरे मिलिला। कृष्णनामेर अर्थ प्रभु ताँहारे कहिला ॥ 263 ॥ अनुवाद—तब वल्लभभट्ट पुरीमें आकर महाप्रभुसे मिले और महाप्रभुने (उनका गर्वनाश करके) उन्हें महिमा सहित कृष्णनामके अर्थकी व्याख्या की ॥ 263 ॥ अनुभाष्य— 'वल्लभभट्ट'—अन्त्यलीला, सातवाँ अध्याय और मध्यलीला, उन्नीसवाँ अध्याय देखें। श्रीगौरसुन्दरने अपने प्रियजन श्रीगदाधर पण्डितसे वल्लभभट्टको नाममन्त्र दिलवाया और स्वयं उसे अपने सम्प्रदायके अनुसार नामका अर्थ बतलाया। "विनीतानथ पुत्रादीन् संस्कृत्य प्रतिबोधयेत्" अर्थात् "विनीत शिष्योंको वैदिक दस संस्कारोंसे संस्कृतकर आचार्य अपने शिष्योंको ब्रह्मचारी बनाकर उनको मन्त्रके अर्थकी शिक्षा देवें।"—इस पञ्चरात्र वाक्यके अनुसार वल्लभभट्टने नामार्थ श्रवण करनेका अधिकार पाया था ॥ 263 ॥ ब्राह्मणकुल-उत्पन्न प्रद्युम्न मिश्रका ब्राह्मणकुलमें नहीं जन्मे वैष्णवाचार्य श्रीराय रामानन्दको गुरु रूपमें वरण :- प्रद्युम्न मिश्रेरे प्रभु रामानन्द-स्थाने। कृष्णकथा शुनाइल कहि' ताँर गुणे ॥ 264 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने (कायस्थकुलमें जन्में) श्रीराय रामानन्दके दिव्य गुणोंकी महिमा गान करके (ब्राह्मणकुलमें जन्में) प्रद्युम्न मिश्रको उनसे श्रीकृष्णकथा श्रवण करनेके लिये प्रेरित किया ॥ 264 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला, पाँचवाँ अध्याय देखें ॥ 264 ॥ राजाके क्रोधसे गोपीनाथका उद्धार :- गोपीनाथ पट्टनायक—रामानन्द-भ्राता। राजा मारितेछिल, प्रभु हैल त्राता ॥ 265 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दके भाई गोपीनाथ पट्टनायकके प्राणोंकी रक्षा की, जिसे राजाने मृत्यु दण्ड दिया था ॥ 265 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला, नौवाँ अध्याय देखें ॥ 265 ॥ विद्वेषी रामचन्द्र पुरीका महाप्रभुके प्रति शासन और भक्तोंका दुःख :- रामचन्द्रपुरी-भये भिक्षा घटाइल। वैष्णवेर दुःख देखि' अर्द्धेक राखिल ॥ 266 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके ऊपर रामचन्द्रपुरीके द्वारा अधिक प्रसाद ग्रहण करनेका दोषारोपण करनेपर उन्होंने बहुत अल्पमात्रामें प्रसाद पाना आरम्भ किया। इसे देखकर सभी वैष्णव लोग बहुत दुःखी हो गये, तब महाप्रभु दोषारोपणसे पूर्व जितना प्रसाद पाते थे, उसका आधा ग्रहण करने लगे ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला, आठवाँ अध्याय देखें ॥ 266 ॥ । 45

[ 1/267-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्रह्माण्डवासी असंख्य जीवोंका महाप्रभुके दर्शनसे उद्धार :— ब्रह्माण्ड-भितरे हय चोद्दभुवन। चोद्दभुवने बैसे यत जीवगण॥ 267 ॥ मनुष्येर वेश धरि' यात्रिकेर छले। प्रभुर दर्शन करे आसि' नीलाचले ॥ 268 ॥ अनुवाद—इस ब्रह्माण्डमें चौदह लोक हैं और जितने भी प्राणी इन लोकोंमें वास करते हैं, वे सभी तीर्थयात्राके छलसे मनुष्य रूप धारण करके नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आते ॥ 267-268 ॥ श्रीवासादि भक्तोंके गौरकीर्त्तनमें महाप्रभुकी असहमति और रोषाभास एवं कृष्ण-कीर्त्तन करनेकी आज्ञा :— एकदिन श्रीवासादि यत भक्तगण। महाप्रभुर गुण गाञा करेन कीर्त्तन ॥ 269 ॥ शुनि' भक्तगणे कहे सक्रोध वचन। “कृष्ण-नाम-गुण छाड़ि, कि कर कीर्त्तन ॥ 270 ॥ औद्धत्य करिते हैल सबाकार मन। स्वतन्त्र हइया सबे नाशा'ले भुवन॥" 271 ॥ अनुवाद—एक दिन श्रीवासादि सभी भक्त महाप्रभुके गुणोंका कीर्त्तन कर रहे थे। अपनी प्रशंसा सुनकर महाप्रभु क्रोधित होकर सभीको डाँटते हुए बोले,— “कृष्णके नाम और गुणोंके कीर्त्तनको छोड़कर यह कैसा कीर्त्तन हो रहा है? तुम अपने मनके अनुसार स्वतन्त्रतापूर्वक आचरण करते हुए ऐसी धृष्टता कर रहे हो जिससे सारे संसारका नाश हो जायेगा ॥" 269-271 ॥ असंख्य जीवोंके कण्ठसे गौर-जयध्वनि और आर्त्ति ज्ञापन :— दशदिके कोटि कोटि लोक हेन काले। 'जय कृष्णचैतन्य' बलि' करे कोलाहले ॥ 272 ॥ “जय जय महाप्रभु—व्रजेन्द्रकुमार। जगत् तारिते प्रभु, तोमार अवतार ॥ 273 ॥ बहुदूर हैते आइनु हञा बड़ आर्त्त। दर्शन दिया प्रभु करह कृतार्थ ॥" 274 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार क्रोध प्रदर्शन करनेपर भी दसों दिशाओंसे लाखों-लाखों लोग तुमुलघोष करने लगे,—“श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो। महाप्रभुकी बारम्बार जय हो, जो स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं और जगत्का उद्धार करनेके लिये अवतरित हुए हैं। हे प्रभो! हम दुःखियारे लोग बहुत दूरसे आये हैं, अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ करो ॥" 272-274 ॥ महाप्रभुकी करुणा :— शुनिया लोकेर दैन्य द्रविला हृदय। बाहिरे आसि' दर्शन दिला दयामय ॥ 275 ॥ श्रीमहाप्रभुके कृपादेशको प्राप्तकर असंख्य लोगोंके कण्ठसे गौरहरिकी ध्वनि :— बाहु तुलि' बोले प्रभु—बल' 'हरि' 'हरि'। उठिल—श्रीहरिध्वनि चतुर्द्दिक भरि' ॥ 276 ॥ महाप्रभुकी स्तुति :— प्रभु देखि' प्रेमे लोक आनन्दित मन। प्रभुके ईश्वर बलि' करये स्तवन ॥ 277 ॥ अनुवाद—लोगोंकी दीन और दुःख भरी पुकार सुनकर महाप्रभुका हृदय पिघल गया। बाहर आकर परम कृपालु महाप्रभुने सभीको दर्शन दिया। महाप्रभुने दोनों भुजायें उठाकर सभीसे कहा,—“हरि बोल! हरि बोल!” सभी लोग अपनी भुजायें उठाकर 'हरि-हरि' बोलने लगे और उनकी ध्वनिसे चारों दिशायें गुञ्जायमान हो गयीं। महाप्रभुके दर्शन करके सभी लोग प्रेममें मग्न होकर आनन्दसे उनको भगवान् कहकर उनकी स्तव- स्तुति करने लगे ॥ 275-277 ॥ करोड़ों कण्ठोंसे महाप्रभुकी जयध्वनि सुनकर सुयोग समझकर श्रीवासके द्वारा महाप्रभुको उलाहना देना :— स्तव शुनि' प्रभुके कहेन श्रीनिवास। “घरे गुप्त हञा, केने बाहिरे प्रकाश ॥ 278 ॥ 46 ।

पहला अध्याय 1/278-285 ] के शिखाल एइ लोके, कहे कोन् बात। इहा-सबारे मुख ढाका दिया राख' हात ॥ 279 ॥ सूर्य येन उदय करि' चाहे लुकाइते। बुझिते ना पारि तोमार ऐछन चरिते ॥" 280 ॥ अनुवाद-स्तव सुनकर श्रीनिवास ठाकुर महाप्रभुसे परिहाससे कहने लगे, - “आप घरके भीतर तो अपनी भगवत्ताको गोपन रखना चाहते हैं और बाहर आकर इसे सबके सामने प्रकाशित कर रहे हैं। इन्हें किसने यह शिक्षा दी है? वे लोग क्या कह रहे हैं? अब आप इन सबके मुख अपने हाथोंसे ढककर बन्द कर दीजिये। सूर्य जैसे उदित होकर स्वयंको छिपाना चाहे, वैसे ही आप अपनेको गोपन रखना चाहते हैं। मैं आपके ऐसे व्यवहारको नहीं समझ पा रहा हूँ।” 278-280 ॥ महाप्रभुकी लज्जा और श्रीवासको कृत्रिम शिकायत :- प्रभु कहेन, - “श्रीनिवास, छाड़ विड़म्बना। सबे मेलि' कर मोर कतेक लाञ्छना ॥” 281 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा-“प्रिय श्रीनिवास ! कृपा करके इस उपहासको बन्द करो। तुम सब मिलकर मुझे लज्जित कर रहे हो ॥” 281 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें दूसरी पंक्ति परिवर्तित होकर इस प्रकारसे देखी जाती है, - “सेइ सब कर याते आमार यातना” अर्थात् वे सब मुझे पीड़ा दे रहे हैं॥ 281 ॥ प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। महाप्रभुकी कृपा दृष्टि-वर्षणसे लोगोंका उद्धार :- एत बलि' लोके करि' शुभदृष्टिदान। अभ्यन्तरे गेला, लोकेर पूर्ण हैल काम ॥ 282 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने लोगोंपर अपनी कृपा दृष्टि डाली और वे अपने कक्षमें चले गये। उनकी कृपा दृष्टिमात्रसे सभीकी सब कामनायें पूर्ण हो गयीं ॥ 282 ॥ अनुभाष्य-अन्त्यलीला 9/7-12 संख्या देखें ॥ 267-282 ॥ पाणिहाटीमें श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीनित्यानन्द और उनके परिकरोंकी सेवा :- रघुनाथ-दास नित्यानन्द-पाशे गेला। चिड़ा-दधि-महोत्सव ताँहाइ करिला ॥ 283 ॥ तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्दकी कृपासे रघुनाथदास गोस्वामीका गृहत्याग तथा पुरीमें महाप्रभुके चरणोंमें आगमन और स्वरूप दामोदरके निकट आत्मसमर्पण :- ताँर आज्ञा लञा गेला प्रभुर चरणे। प्रभु ताँरे समर्पिला स्वरूपेर स्थाने ॥ 284 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथदास पाणिहाटीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनपर कृपा की और उनसे सभी वैष्णवोंके लिये दही-चिड़वा महोत्सव करानेकी आज्ञा दी। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथदास गृह त्यागकर महाप्रभुकी शरणमें गये और महाप्रभुने उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें सौंप दिया ॥ 283-284 ॥ अनुभाष्य-इस सन्दर्भमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामी अपने ग्रन्थ विलाप-कुसुमाञ्जलीमें लिखते हैं- “यो मां दुस्तरगेहनिर्जलमहाकूपादपारक्लमात् सद्यः सान्द्रदयाम्बुधिः प्रकृतितः स्वैरी-कृपारज्जुभिः। उद्धृत्यात्म-सरोजनिन्दितचरणप्रान्तं प्रपाद्य स्वयं श्रीदामोदरसाच्चकार तमहं चैतन्यचन्द्रं भजे ॥” अर्थात् “मैं उन महाप्रभुके चरणकमलोंका भजन करता हूँ, जिन्होंने अपनी कृपा-रज्जुके द्वारा मेरा गृहरूपी सूखे (अन्धे) कुएँसे उद्धार करके श्रीस्वरूप दामोदरकी शरण प्रदान करके मुझे दिव्यानन्दके समुद्रमें निमम्जित कर दिया है।” अन्त्यलीला, छठा अध्याय देखें ॥ 283-284 ॥ ब्रह्मानन्द भारतीका चर्मवस्त्र-त्याग :- ब्रह्मानन्द-भारतीर घुचाइल चर्म्माम्बर। एइ मत लीला कैल छव वत्सर ॥ 285 ॥ । 47

[ 1/285-287 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—महाप्रभुने ब्रह्मानन्द भारतीसे मृगछाला पहननेका अभ्यास छुड़वाया। इस प्रकार उन्होंने छह वर्षोंतक दिव्य लीलाओंका आनन्द लिया॥ 285 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, दसवाँ अध्याय देखें॥ 285 ॥ अठारह वर्षोंमें अन्तिम बारह वर्षोंकी लीलाओंका आगे सूत्ररूपमें वर्णन :— एइ त' कहिल मध्यलीलार सूत्रगण। शेष द्वादश वत्सरेर शुन विवरण॥ 286 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (श्रीकृष्णदास कविराज) सूत्ररूपसे मध्यलीला कही। शेष बारह वर्षोंकी लीलाका विवरण अब सुनो॥ 286 ॥ अनुभाष्य—आदिलीलाके 17/312 संख्यामें वर्णित व्यासदेवके आचारका अनुगमन करते हुए लिखित प्रबन्धका अनुवाद, आदि, मध्य और अन्त्य—इन तीन लीलाओंके अन्तिम भागमें लिखा गया है। आदिलीलाको पाँच-आयुभेदसे केवल सूत्ररूपमें लिखकर कुछ लीलाओंका वर्णन करते हुए उल्लेख किया कि इनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तृतरूपसे वर्णन किया है। शेषलीला अर्थात् मध्य और अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें इस अध्यायमें लिखकर अन्तिम बारह वर्षोंकी लीलाओंका सूत्ररूपमें वर्णन दूसरे अध्यायमें किया है। इसके बाद क्रमशः मध्य और अन्त्यलीलाका विस्तृत विवरण दिया गया है। इस प्रकार रचनाका उद्देश्य (अन्त्यलीला 1/10) के अनुसार— “मध्यलीला-मध्ये अन्त्यलीला-सूत्रगण। पूर्वग्रन्थे संक्षेपेते करियाछि वर्णन॥ आमि जराग्रस्त, निकट जानिया मरण। अन्त्यलीलार कोन सूत्र करियाछि वर्णन॥” अर्थात् “मध्यलीलाके बीचमें मैंने अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें वर्णन किया है। मैं अति वृद्ध हो गया हूँ और रोगग्रस्त भी हूँ। मैं किसी समय भी देह त्याग सकता हूँ, इसलिये मैंने अन्त्यलीलाके कुछ भागका मध्यलीलामें वर्णन किया है॥” 286 ॥ प्रथम अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 287 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे मध्यलीला-सूत्रवर्णनं नाम प्रथम-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 287 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यखण्डमें मध्यलीला-सूत्रवर्णन नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त। 48 ।

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दूसरा अध्याय कथासार-इस दूसरे अध्यायमें ग्रन्थकारने महाप्रभुके अन्तिम बारह वर्षोंकी भावास्वादन-लीलाओंका सूत्ररूपमें वर्णन किया है और बीचमें संस्कृत श्लोक उद्धृत करनेके कारण उनकी व्याख्या भी की है। इन गम्भीर भावोंके तत्त्वको लोग आसानीसे समझ नहीं सकते। इस ग्रन्थमें वर्णित श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंके वर्णनको सुनते-सुनते आसानीसे भावतत्त्व जीवोंके हृदयमें उदित होगा। कविराज गोस्वामीने बहुत वृद्धावस्थामें इस ग्रन्थको लिखा था। उन्हें भय था कि कहीं यह ग्रन्थ अधूरा न रह जाय, इसलिये भक्तोंके उपकारके लिये उन्होंने अन्त्यलीलाके सूत्रोंको इस अध्यायमें संग्रह किया है। कविराज गोस्वामीने कहा है,— श्रीस्वरूप-गोस्वामीका मत ही भजनके सम्बन्धमें प्रधान मत है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उनकी कृपासे उनके द्वारा रचित कड़चा कण्ठस्थ कर लिया था। श्रीस्वरूपके अन्तर्धान होनेके बाद श्रीरघुनाथदास गोस्वामी व्रजमें आये। कविराज-गोस्वामी व्रजमें आकर श्रीरूप और श्रीरघुनाथसे मिले और उनकी कृपासे उस कण्ठस्थ कड़चाके तात्पर्यको समझकर इस ग्रन्थकी रचना की। -(अमृतप्रवाह भाष्य) महाप्रभुके कृष्ण विरह-प्रलापादिका वर्णन :— विच्छेदेऽस्मिन् प्रभोरन्त्यलीला-सूत्रानुवर्णने। गौरस्य कृष्णविच्छेदप्रलापाद्यनुवर्ण्यते॥1॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुकी अन्त्यलीला सूत्ररूपमें वर्णन करते हुए इस अध्यायमें उनके श्रीकृष्ण-विरह-प्रलाप आदिका वर्णन किया है॥1॥ अनुभाष्य- अस्मिन् विच्छेदे (श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यलीलायां द्वितीयपरिच्छेदे) प्रभोः (श्रीचैतन्यदेवस्य) अन्त्यलीलासूत्रानुवर्णने (संन्यासचरित्रसूत्र-प्रतिसंक्रमणे विषये) गौरस्य (गोपीभावाश्रितस्य भगवतो महाप्रभोः) कृष्णविच्छेदप्रलापादिः (निजकान्त- विरहजन्योन्मत्तवाक्यादिः) अनुवर्ण्यते (मया लिख्यते)। श्लोक-भावानुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यलीलाके दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्यदेवके संन्यासचरित्रके विषयमें गोपीभावाश्रित महाप्रभुके निजकान्त विरहजनित उन्मत्त- वाक्यादिको मैं लिख रहा हूँ॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर भक्तोंकी जय हो॥2॥ अन्तके बारह वर्षोंमें महाप्रभुका कृष्णविरह :- शेष ये रहिल प्रभुर द्वादश वत्सर। कृष्णेर वियोग-स्फूर्त्ति हय निरन्तर॥3॥ अनुवाद-अन्तिम बारह वर्षोंमें महाप्रभु निरन्तर श्रीकृष्णका वियोग और वियोगमें उनकी स्फूर्ति अनुभव करते थे॥3॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'वियोग'-विच्छेद, विरह॥3॥ उद्धवके दर्शनसे श्रीराधिकाभावमय महाप्रभु :- श्रीराधिकार चेष्टा येन उद्धव-दर्शने। एइमत दशा प्रभुर हय रात्रि-दिने॥4॥ निरन्तर हय प्रभुर विरह-उन्माद। भ्रममय चेष्टा सदा, प्रलापमय वाद॥5॥ । 51

[ 2/4-6 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-उद्धवजीके दर्शनसे जैसी श्रीमती राधिकाकी चेष्टाएँ हुई थी, वैसी ही दशा महाप्रभुकी भी दिन-रात रहती थी। महाप्रभु सब समय श्रीकृष्ण-विरहमें उन्मादित रहते थे, इस कारण उनकी सभी क्रियाएँ भ्रमित व्यक्तिकी भाँति होती थीं और वे प्रलापमय (बाहरसे पागलोंके जैसे, परन्तु वास्तविकतामें नहीं) वाक्य बोलते थे॥ 4-5॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वाद'-वाक्य॥ 5॥ अनुभाष्य- 'भ्रममय चेष्टा'-उद्घूर्णा। 'प्रलापमय वाद'-चित्रजल्पादि दस प्रकारके प्रलापमय वाक्य॥ 5॥ अमृतानुकणिका-“महाप्रभु सब समय कृष्णके विरहमें उन्मादित रहते थे, उनकी भ्रममय चेष्टाएँ और वाक्य प्रलापमय होते थे। 'भ्रममय चेष्टा'-श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं, परन्तु श्रीमती राधिका सोच रही हैं कि वे अभी गोचारण करके आयेंगे। अब उनको यह भ्रम हो गया कि श्रीकृष्ण मथुरा नहीं गये हैं, अभी ब्रजमें ही हैं। अथवा श्रीकृष्णके मथुरा जानेपर भी वे उस बातको भूल गयीं और उनसे मिलनेके लिये कुञ्जमें जा रही हैं। वहाँपर श्रीकृष्णके लिये सज्जादि सजा रही हैं, थोड़ी देरके बादमें देखती हैं कि श्रीकृष्ण नहीं आये। वे मार्ग देखते-देखते रह गयीं और श्रीकृष्ण नहीं आये, तब वे रोने लगीं। थोड़ी देरमें उन्होंने आकाशकी ओर देखा और वहाँ नील मेघको देखकर उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई। तब उन्हें लगा कि श्रीकृष्ण आ गये हैं और देरीसे आनेपर क्षमा याचना कर रहे हैं। परन्तु राधाजी उस मेघको श्रीकृष्ण समझकर उसको गर्जन-तर्जन करने लगीं। थोड़ी देर बादमें जब देखा कि मेघ अन्तर्धान हो गया, तो अब उनका वह भाव दूर हो गया और अब कलहान्तरिताके रूपमें, कलह करनेके बादमें जब श्रीकृष्ण चले गये, तब उनके लिये रोने लगीं और हाय-हाय करने लगीं। 'कलहान्तरिता नायिका' (उःनीः 5/87)- “या सखीनां पुरः पादपतितं वल्लभं रुषा। निरस्य पश्चात्तपति कलहान्तरिता हि सा। अस्याः प्रलाप-संताप-ग्लानि-निःश्वसितादयः॥” “जो नायिका सखियोंके सामने अपने चरणोंमें झुके वल्लभको परित्यागकर पीछे अत्यन्त अनुताप अनुभव करती है, उसे कलहान्तरिता कहा जाता है। प्रलाप, सन्ताप, ग्लानि, दीर्घनिःश्वास-त्याग आदि कलहान्तरिता नायिकाओंकी चेष्टाएँ हैं।” ऐसी चेष्टाएँ ही 'भ्रममय-चेष्टा' कहलाती हैं और इन्हींमें प्रलापमय वाक्य बोले जाते हैं। जो व्यक्ति वहाँ नहीं है, उसको देखकर उससे बातचीत करना और जो बात नहीं है, वही कहना 'प्रलापमयवाद' है। (उःनीः अनुः प्रः 11/87-88)- 'प्रलाप:' - व्यर्थालापः प्रलापः स्यात्॥ 87॥ करोति नादं मुरली रली रली व्रजाङ्गनाहन्मथनं थनं थनम्। ततो विदूना भजते जते जते हरे भवन्तं ललिता लिता लिता॥ 88॥ अर्थात् 'प्रलाप'-व्यर्थ आलापको प्रलाप कहते हैं। मधुपानसे उन्मत्ता श्रीराधा श्रीकृष्णसे कह रही हैं,-“हे कृष्ण! मैं जानती हूँ कि तुम्हारी मुरली 'रली-रली' व्रजाङ्गनाओंके हृदयको मन्थन 'थन-थन' शब्द प्रकाश करती है और इसीलिए ललिता 'लिता-लिता' दुःखी होकर तुम्हारा भजन 'जन-जन' कर रही है।” यहाँ 'रली-रली, थन-थन, जते-जते, लिता-लिता, जन-जन' आदि शब्द निरर्थक हैं।”-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 5॥ महाप्रभुका विप्रलम्भ महाभाव :- लोमकूपे रक्तोद्गम, दन्त सब हाले। क्षणे अङ्ग क्षीण हय, क्षणे अङ्ग फूले॥ 6॥ अनुवाद-उनके लोमकूपोंसे रक्त बहता था, उनके दाँत सब ढीले होकर हिलते थे। एक क्षणमें उनका शरीर पतला हो जाता और दूसरे क्षणमें फूलकर मोटा हो जाता था॥ 6॥ 52 ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण है:

दूसरा अध्याय 2/6-15 ]


अमृतप्रवाह भाष्य—'हाले'—हिलने लगे ॥ 6 ॥ गम्भीरा-भितरे रात्रे नाहि निद्रा-लव। भित्ते मुख-शिर घषे, क्षत हय सब ॥ 7 ॥ अनुवाद— वे 'गम्भीरा' में रहते थे और रातमें एक क्षणके लिये भी उन्हें नींद नहीं आती थी। विरहमें व्याकुल होकर वे अपना मुख और सिर दीवारोंसे घिसते थे, जिससे उनमें घाव हो जाते ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'गम्भीरा'—बरामदेके बाद जो घर होता है, उसके भीतर जो छोटासा कमरा होता है, उसे 'गम्भीरा' कहते हैं ॥ 7 ॥ तिन द्वारे कपाट, प्रभु यायेन बाहिरे। कभु सिंहद्वारे पड़े, कभु सिन्धुनीरे ॥ 8 ॥ अनुवाद— गम्भीराके तीनों द्वार बन्द कर देनेपर भी वे वहाँसे निकल जाते और कभी श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरके सिंहद्वारपर पड़े मिलते और कभी समुद्रके जलमें कूद पड़ते ॥ 8 ॥ महाप्रभुको चिन्मय व्रजलीलाका उद्दीपन :- चटक-पर्वत देखि' 'गोवर्धन'-भ्रमे। धाञा चले आर्त्तनाद करिया क्रन्दने ॥ 9 ॥ उपवनोद्यान देखि' वृन्दावन-ज्ञान। ताँहा याइ' नाचे, गाय, क्षणे मूर्च्छा या'न ॥ 10 ॥ अनुवाद— चटक पर्वतको देखकर उन्हें गोवर्धनका भ्रम हो जाता, वे रोते और आर्त्तनाद करते हुए उसकी ओर दौड़ पड़ते। पुरीमें उपवन-उद्यानोंको देखकर उन्हें वृन्दावनकी स्फूर्ति होती, वे वहाँ जाकर नाचते-गाते और कभी उन्मादमें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते ॥ 9-10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चटकपर्वत'—समुद्र तटपर जो बालूका पहाड़ होता है, उसे 'चटकपर्वत' कहते हैं। गुण्डिचा मन्दिर और समुद्रके बीच एक बड़ा चटकपर्वत है, अनेक बार उसे देखकर महाप्रभु 'गोवर्धन'के भ्रमसे वहाँ दौड़ते हुए जाते थे ॥ 9 ॥


अनुभाष्य—'भ्रमे'—भ्रमसे ॥ 9 ॥ श्रीकृष्ण विरहसे उत्पन्न अपूर्व महाभाव-विकार :- काँहा नाहि शुनि येइ भावेर विकार। सेइ भाव हय प्रभुर शरीरे प्रचार ॥ 11 ॥ हस्तपादेर सन्धि सब वितस्ति-प्रमाणे। सन्धि छाड़ि' भिन्न हुये, चर्म रहे स्थाने ॥ 12 ॥ हस्त, पाद, शिर, सब शरीर-भितरे। प्रविष्ट हय—कूर्मरूप देखिये प्रभुरे ॥ 13 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके शरीरमें जो भाव प्रकाशित होते थे, वे इस जगत्में कहीं सुने भी नहीं जाते, अर्थात् किसी अन्यके शरीरमें नहीं हो सकते। कभी उनके हाथ-पाँवकी अस्थियोंके जोड़ खुलकर वितस्ति (हथेली फैलाकर अंगूठेके कोनेसे छोटी अंगुलीके कोने तक) जितने लम्बे हो जाते, केवल त्वचाके कारण ही वे अस्थियाँ शरीरमें टिकी रहतीं। कभी महाप्रभुके हाथ-पाँव-सिर उनके शरीरके भीतर चले जाते और उनका शरीर कछुवे जैसा हो जाता ॥ 11-13 ॥ अनुभाष्य— 'प्रचार'—प्रकाशित। जोड़ोंमें जुड़ी हुई अस्थियाँ अलग होकर केवल त्वचाका ही अस्तित्व दिखायी देता। सन्धि-स्थल तब फैली हुई हथेली जितने लम्बे हो जाते ॥ 11-12 ॥ एइ मत अद्भुत-भाव शरीरे प्रकाश। मनेते शून्यता, वाक्ये हाहा-हुताश ॥ 14 ॥ अनुवाद— इस प्रकार महाप्रभुके शरीरमें अद्भुत सात्त्विक भावोंका प्रकाश होता। श्रीकृष्णविरहमें उनके मनमें शून्यता अर्थात् जगत् उन्हें शून्य प्रतीत होता और जो वचन वे बोलते उसमें निराशा ही होती ॥ 14 ॥ कृष्णविरहमें महाप्रभुका करुण विलाप :- “काँहा मोर प्राणनाथ मुरलीवदन। काँहा करौं, काँहा पाङ व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 15 ॥

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[ 2/15-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काहारे कहिब, केबा जाने मोर दुःख। व्रजेन्द्रनन्दन बिना फाटे मोर बुक॥"16॥ एमत विलाप करे विह्वल अन्तर। रायेर नाटक-श्लोक पड़े निरन्तर॥17॥ अनुवाद-महाप्रभुका करुण विलाप, - "हाय! मुरली वादन करते हुए मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मेरे प्राणनाथ व्रजेन्द्रनन्दन मिलेंगे? किससे मनका दुःख कहूँ? कौन मेरे दुःखको समझ सकता है? व्रजेन्द्रनन्दनके बिना मेरा हृदय फटा जा रहा है।" इस प्रकार महाप्रभु श्रीकृष्णविरहमें विह्वल होकर विलाप करते और श्रीराय रामानन्दके 'जगन्नाथ-वल्लभ' नाटकके इस श्लोकका सदा उच्चारण करते॥15-17॥ जगन्नाथवल्लभ नाटक (3/9)- प्रेमच्छेद‌रुजोऽवगच्छति हरिनार्यं न च प्रेम वा स्थानास्थानमवैति नापि मदनो जानाति नो दुर्बलाः। अन्यो वेद न चान्यदुःखमखिलं नो जीवनं वाश्रवं द्वित्रीण्येव दिनानि यौवनमिदं हाहा विधेः का गतिः॥18॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हमारे कृष्ण प्रेमके द्वारा दिये गये आघातजनित रोगको अनुभव नहीं करते। प्रेमकी बात ही क्या कहूँ, वह तो स्थान-अस्थानको (कहाँ करना है और कहाँ नहीं करना है, इसको) न जानकर आघात करता है। मदनकी तो बात क्या है, क्योंकि वह यह भी नहीं समझता है कि हम अति दुर्बल हैं। हम किसे क्या कहें, कोई हमारे इन सब दुःखोंको नहीं समझ सकता। हमारा जीवन हमारे वशमें नहीं है; यौवन तो दो-तीन दिनके समान थोड़े समयका है। हाय! इस अवस्थामें हे विधाता! हमारी क्या गति होगी? पाठान्तरमें-'विधे'॥18॥ अनुभाष्य- अयं हरिः (कृष्णः) अस्मान् प्रेमच्छेद‌रुजः (प्रेमच्छेदेन तस्य प्रेमभङ्गेन याः रुजः ताः विच्छेदरोगार्त्ताः गोपी) न अवगच्छति (जानाति); प्रेम वा स्थानास्थानां (सदसत्-पात्रापात्रं) न अवैति (जानाति); मदनः अपि नः (अस्मान्) दुर्बलाः (परवश्याः अबलाः) न जानाति। अन्यः जनः अन्यदुःखं (अपरजनकलेशं) न वेद (जानाति)। नः (अस्माकं) जीवनम् आश्रवं (क्लेशमात्रं परवश्यं वा)। इदं यौवनं द्वित्रीण्येव दिनानि ! हा हा विधेः (विधातुः) का गतिः (कीदृशी गतिः, अस्माभिर्दुर्बोध्येति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-(राधाजी शोकमैं विह्वल होकर कहती हैं)-प्रेमके विच्छेदसे जो वेदना हमें हो रही है, उसे कृष्ण नहीं जानते। प्रेम पात्र या अपात्र नहीं देखता है। और न ही मदन (कामदेव) यह जानता है कि हम अति दुर्बल हैं [हम उसके वारको झेल नहीं पायेंगी, फिर भी वह हमपर निरन्तर वार कर रहा है]। कोई किसीके दुःखको नहीं समझ सकता। हमारा जीवन तो क्लेशमात्र और दूसरेके वशमें है। यह यौवन भी तो दो-तीन दिनकी भाँति अल्प समयका है। हा! हा! हे विधाता! ऐसेमें हमारी क्या गति होगी? (हमारे लिये यह जानना अति कठिन है-यह भाव है)॥18॥ अत्यन्त विरहके कारण श्रीकृष्णके प्रति दोषोद्गार :- “उपजिल प्रेमाङ्कुर, भाङ्ग्लि ये दुःख-पूर, कृष्ण ताहा नाहि करे पान। बाहिरे नागरराज, भितरे शठेर काज, परनारी वधे सावधान॥19॥ अपने भाग्यको धिक्कार :- सखि हे, ना बुझिये विधिर विधान। सुख लागि' कैलुँ प्रीति, हैल विपरीत गति, एबे याय, ना रहे पराण॥20॥ध्रु॥ प्रेमके प्रति दोषारोपण :- कुटिल प्रेमा अगेयान, नाहि जाने स्थानास्थान, भाल-मन्द नारे विचारिते। क्रूर शठेर गुणडोरे, हाते-गले बान्धि' मोरे, राखियाछे, नारिं उकाशिते ॥21॥ कृष्णकामनाके प्रति दोषोद्गार :- ये मदन तनुहीन, परद्रोहे परवीण, पाँच बाण सन्धे अनुक्षण। 54 ।

दूसरा अध्याय 2/19-26 ] अबलार शरीरे, बिन्धि' कैल जरजरे, दुःख देय, ना लये जीवन ॥22॥ परमप्रेष्ठ-सखियोंके प्रति भी दोषारोपण :- अन्येर ये दुःख मने, अन्ये ताहा नाहि जाने, सत्य एइ शास्त्रेर विचार। अन्य जन काँहा लिखि, ना जानये प्राणसखी, याते कहे धैर्य धरिबार ॥23॥ आयुके अल्प होनेके कारण विलम्ब या प्रतीक्षासे हताशभाव :- 'कृष्ण-कृपा-पारावार, कभु करिबेन अङ्गीकार', सखि, तोर ए व्यर्थ वचन। जीवेर जीवन चञ्चल, येन पद्मपत्रेर जल, तत दिन जीवे कोन् जन ॥24॥ शत वत्सर पर्यन्त, जीवेर जीवन अन्त, एइ वाक्य कह ना विचारि'। नारीर यौवन-धन, यारे कृष्ण करे मन, से यौवन-दिन दुइ चारि ॥25॥ अग्नि और पतङ्गेके साथ कृष्ण और अपनी तुलना :- अग्नि यैछे निज-धाम, देखाइया अभिराम, पतङ्गीरे आकर्षिया मारे। कृष्ण ऐछे निज-गुण, देखाइया हरे मन, पाछे दुःख-समुद्रेते डारे ॥"26॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥19-26॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिका कह रही हैं,-"अहो! दुःखकी बात क्या कहूँ? कृष्णमिलनसे हमारा प्रेमाङ्कुर उत्पन्न हुआ; अब कृष्ण विच्छेदसे उस प्रेमाङ्कुरको आघात लगा और अब वह दुःखके प्रवाहमें बह रहा है। इस रोगके कृष्ण ही एकमात्र चिकित्सक हैं, किन्तु कृष्ण उस प्रेमाङ्कुरकी रक्षा करनेके लिये कोई यत्न नहीं कर रहे हैं। कृष्णके व्यवहारके बारेमें क्या कहूँ!-वे बाहरसे तो नागरराज (प्रेम व्यवहारमें चतुर) हैं, परन्तु भीतरमें शठता (धूर्तता)से परिपूर्ण हैं और परनारी-वधमें बहुत कुशल हैं। कृष्णके साथ प्रीति करनेसे ऐसा फल! हे सखी! इस विधिके विधानको न बूझकर मैंने सुखके लिये प्रीति की, किन्तु इस दुखियारीको उसका विपरीत होकर महादुःख मिला। अब तो स्थिति यह है कि प्राण अब जायेंगे या तब जायेंगे। हमारे कृष्ण तो ऐसे हैं, और 'प्रेम' नामक जो एक तत्त्व है, उसके विषयमें क्या कहूँ? प्रेम तो स्वभावसे कुटिल और अज्ञानी (अन्धा) है। उसने उचित या अनुचित स्थान न जानकर और उस मन्दबुद्धिने फल या कुफलका विचार न करके कृष्णरूप क्रूर शठकी गुण-रस्सीसे मेरे हाथ-गलेको बाँधकर रख दिया है, मैं उससे अपनेको छुड़ा नहीं पा रही हूँ! कृष्ण और प्रेम-इन दोनोंका यही कार्य है। इस प्रीतिकार्यमें 'मदन' नामक एक और तत्त्व है। उसके गुण ये हैं, - वह स्वयं तो देहरहित है, परन्तु दूसरोंको सतानेमें बहुत प्रवीण है। पाँच बाण सन्धान करके अबलाओंके शरीरको बींधकर जर्जरित कर देता है। यदि वह एक बारमें वध करके प्राण ले लेता, तो अच्छा होता, परन्तु वह ऐसा न करके केवल दुःख ही देता है। शास्त्रोंमें कहा है कि एक व्यक्तिका दुःख अन्य कोई नहीं जान सकता। इस सम्बन्धमें औरोंकी बात क्या कहूँ, मेरी ललितादि सभी प्राणसखियाँ भी मेरे दुःखको समझ नहीं पातीं और 'हे सखी, धैर्य रखो' ऐसा बार-बार कहती हैं। हे सखी! तुम यह कहती हो, - 'कृष्ण कृपाके समुद्र हैं, वे कभी-न-कभी तुम्हें अङ्गीकार करेंगे', -किन्तु तुम्हारे ये शब्द कभी सत्य नहीं होंगे; क्योंकि कमलके पत्तेपर जलकी बूँदके समान जीवका जीवन चञ्चल है। कृष्णकृपा जिस समय होगी, उस समय तक क्या मैं जीवित रहूँगी? मनुष्यकी आयु तो सौ वर्षसे अधिक नहीं है। और विचार करके देखो, कृष्ण-चित्तहारी रमणीका यौवनधन तो बहुत अल्प समयके लिये ही है। यदि तुम कहो, - कृष्ण तो गुणोंके सागर हैं, वे अवश्य ही कृपा करेंगे, इसलिये कहती हूँ कि अग्नि जिस प्रकार अपना प्रकाश दिखाकर । 55

[ 2/19-29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पतङ्गेको आकर्षित करके उसे मार देती है, कृष्णके गुण भी उसी प्रकार हैं। वे पहले गुणोंकी चकाचौंधसे नारियोंके मनको आकर्षण करके फिर उन्हें विरहरूप दुःख-समुद्रमें डुबो देते हैं॥”19-26॥ अनुभाष्य—'अगेयान्'—अज्ञान, अज्ञेय। 'उकाशिते'—मुक्त करना। 'तनुहीन'—अनङ्ग (देहरहित)॥ 21-22॥ एतेक विलाप करि', विषादे श्रीगौरहरि, उघाड़िया दुःखेर कपाट। भावेर तरङ्ग-बले, नानारूप मन चले, आर एक श्लोक कैल पाठ॥ 27॥ अनुवाद—इस प्रकार विषादमें विलाप करते हुए महाप्रभुने अपने हृदयके कपाट खोलकर अपने भावोंको प्रकाशित किया। भावोंकी तरङ्गोंमें बहते हुए उनका मन इधर-उधर चलने लगा और उन्होंने एक और श्लोकका पाठ किया॥ 27॥ अनुभाष्य—'उघाड़िया'—उद्घाटन किया (दिखलाया)॥ 27॥ गूढ़ कृष्णप्रीति-सूचक निर्वेदमय गान :- गोस्वामि-पादोक्त-श्लोक— श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं बिना व्यर्थानि मेऽहान्यखिलेन्द्रियाण्यलम्। पाषाणशुष्केन्धनभारकाण्यहो बिभर्मि वा तानि कथं हतत्रपः॥ 28॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! श्रीकृष्णके रूप-गुण-लीला सेवन न करके मेरी समस्त इन्द्रियाँ (और सभी दिन) व्यर्थ हो रहे हैं, अब मैं उन सब पाषाण (पत्थर) और सूखी-लकड़ीके समान इन्द्रियोंको निर्लज्ज होकर धारण करनेमें कैसे सक्षम होऊँगी?॥ 28॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं (श्रीकृष्णरूपगुणलीलानां निषेवणं शुश्रूषादिकं) बिना मे (मम) अहानि (दिनानि जीवितकालानि) अखिलेन्द्रियाणि (सर्वहर्षीकाणि भोग्याङ्गविग्रहाणि च) अलं व्यर्थानि (विफलप्रदानि भवन्ति)। अहो, पाषाणशुष्केन्धनभारकाणि (पाषाण-शुष्ककाष्ठतुल्यो भारो येषां तानि इन्द्रियाणि) कथं वा बिभर्मि (धारयामि)? अहं हतत्रपः (निर्लज्जः), [अतः कृष्णभोगरहिते जीवितविग्रहे मम स्पृहा वर्त्तते]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके रूप-गुण-लीलाकी सेवाके बिना मेरा जीवनकाल और समस्त इन्द्रियाँ विफल हो रही हैं। अहो! पाषाण-शुष्ककाठके तुल्य भारके समान इन्द्रियोंको मैं कैसे धारण करूँगी? मैं निर्लज्ज हूँ [इसलिये श्रीकृष्णसेवाके बिना जीवित रहनेकी स्पृहा (कामना) मुझमें है]॥ 28॥ (1) भोगरत चक्षुकी व्यर्थता :- “वंशीगानामृत-धाम, लावण्यामृत-जन्मस्थान, ये ना देखे से चाँदवदन। से नयने किवा काज, पडुक् तार मुण्डे बाज, से नयन रहे कि कारण॥ 29॥ अनुवाद—"वे आँखें किस कामकी यदि उनसे श्रीकृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन न किया जाय जो समस्त लावण्यामृतका जन्मस्थान और वंशीके गानामृतका आधार है? उसके सिरपर तो वज्रपात होना चाहिये, उसने ऐसी आँखोंको क्यों धारण किया है?॥ 29॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णका मुखचन्द्र वंशीगानका अमृतधामस्वरूप और लावण्यरूप अमृतका जन्मस्थान- स्वरूप है॥ 29॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका मुखचन्द्र वंशीगानरूप अमृतका आश्रय और लावण्यामृतका मूल है। जिस गोपीके नेत्र इस प्रकार परमरमणीय श्रीकृष्णरूपके दर्शनसे वञ्चित हैं, उन नेत्रोंके आश्रय उस गोपीके मस्तकपर वज्रपात होना ही श्रेयस्कर है। वास्तवमें गोपियाँ श्रीकृष्णसे अतिरिक्त कोई भी वस्तु देखकर उसके प्रति वैराग्य दिखलाती हैं अथवा उदासीन रहती हैं, उसमें उनकी कोई रुचि नहीं होती। उनके नयनाभिराम (नयनोंको 56 ।

दूसरा अध्याय 2/29-34 ] आनन्द देनेवाले) सेव्य श्रीकृष्णका मुखचन्द्र ही उनकी नेत्र इन्द्रियोंकी आराध्य वस्तु है। जिसके नेत्रोंका आराध्य श्रीकृष्णका मुखचन्द्र नहीं है, वह नेत्र-धारक या नेत्रोंका आधारस्वरूप सिर वज्रपात होने योग्य ही है। गोपियाँ यह नहीं समझ सकतीं कि श्रीकृष्णके दर्शनके अतिरिक्त नेत्रोंको धारण करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ 29॥ सखि हे, शुन, मोर हत विधिबल। मोर वपु-चित्त-मन, सकल इन्द्रियगण, कृष्ण बिना सकल विफल॥30॥ध्रु॥ अनुवाद—हे सखि, सुनो! मैंने अपना सौभाग्य गँवा दिया है, अब श्रीकृष्णसेवाके बिना मेरा तन-चित्त-मन और सभी इन्द्रियाँ निष्फल ही हैं॥30॥ (2) भोगरत कानोंकी व्यर्थता :— कृष्णेर मधुर वाणी, अमृतेर तरङ्गिणी, तार प्रवेश नाहि ये श्रवणे। काणाकड़ि-छिद्र सम, जानिह से श्रवण, तार जन्म हैल अकारणे॥31॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी मधुर वाणी (अथवा श्रीकृष्ण-सम्बन्धी शब्द) अमृतकी तरङ्गोंके समान है। यदि किसीके कानोंमें यह अमृत नहीं जाता, तो वे कान फूटे हुए शङ्खके समान हैं। ऐसे कानोंका होना व्यर्थ ही है॥31॥ (3) भोगरत जिह्वाकी व्यर्थता :— कृष्णेर अधरामृत, कृष्ण-गुण-चरित, सुधासार-स्वादु-विनिन्दन। तार स्वाद ये ना जाने, जन्मिया ना मैल केने, से रसना भेक-जिह्वा सम॥32॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका अधरामृत और उनके दिव्य गुण-चरितादिका गानरूप अमृत अन्य सभी प्रकारके अमृतके स्वादको विनिन्दित करते हैं। जिसने इसका आस्वादन नहीं किया है, वह जन्म लेते ही मर क्यों नहीं गया? (अर्थात् उसके जीनेका क्या प्रयोजन है?) उसकी जिह्वा तो मेंढककी जिह्वाके समान है (जो टर्र-टर्र करके मृत्युरूप साँपको अपनी ओर बुलाती है)॥32॥ (4) भोगरत नासिकाकी व्यर्थता :— मृगमद-नीलोत्पल, मिलने ये परिमल, येइ हरे तार गर्व-मान। हेन कृष्ण-अङ्ग-गन्ध, यार नाहि से सम्बन्ध, सेइ नासा भस्त्रार समान॥33॥ अनुवाद—कस्तूरी और नीलकमलकी मिलित सुगन्धको भी पराभूत करनेवाली सुगन्ध श्रीकृष्णके समस्त अङ्गोंमें है—जिसकी नासिकाने ऐसी सुगन्धका आस्वादन नहीं किया, वह नासिका तो लोहारकी धौंकनीके समान है॥33॥ (5) भोगरत त्वचाकी व्यर्थता :— कृष्ण-कर-पदतल, कोटिचन्द्र-सुशीतल, तार स्पर्श येन स्पर्शमणि। तार स्पर्श नाहि यार, से याउक छारखार, सेइ वपु लोहा-सम जानि॥” 34॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी हथेली और श्रीचरणोंके तलवे करोड़ों-करोड़ों चन्द्रमाओंसे अधिक शीतलता प्रदान करनेवाले हैं। उनका स्पर्श तो स्पर्शमणिके समान है। जिसने उनका स्पर्श नहीं किया है, उसका जीवन व्यर्थ है और उसका शरीर लोहेके समान है, अर्थात् मायाके त्रिताप भोगनेके योग्य है॥”34॥ अनुभाष्य—(श्रीमद्भागवत 2/3/17-24)— “आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तञ्च यन्नसौ। तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमःश्लोकवार्त्तया॥17॥ तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्वसन्त्युत। न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामे पशवोऽपरे॥18॥ । 57