श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 908, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/19-29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पतङ्गेको आकर्षित करके उसे मार देती है, कृष्णके गुण भी उसी प्रकार हैं। वे पहले गुणोंकी चकाचौंधसे नारियोंके मनको आकर्षण करके फिर उन्हें विरहरूप दुःख-समुद्रमें डुबो देते हैं॥”19-26॥ अनुभाष्य—'अगेयान्'—अज्ञान, अज्ञेय। 'उकाशिते'—मुक्त करना। 'तनुहीन'—अनङ्ग (देहरहित)॥ 21-22॥ एतेक विलाप करि', विषादे श्रीगौरहरि, उघाड़िया दुःखेर कपाट। भावेर तरङ्ग-बले, नानारूप मन चले, आर एक श्लोक कैल पाठ॥ 27॥ अनुवाद—इस प्रकार विषादमें विलाप करते हुए महाप्रभुने अपने हृदयके कपाट खोलकर अपने भावोंको प्रकाशित किया। भावोंकी तरङ्गोंमें बहते हुए उनका मन इधर-उधर चलने लगा और उन्होंने एक और श्लोकका पाठ किया॥ 27॥ अनुभाष्य—'उघाड़िया'—उद्घाटन किया (दिखलाया)॥ 27॥ गूढ़ कृष्णप्रीति-सूचक निर्वेदमय गान :- गोस्वामि-पादोक्त-श्लोक— श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं बिना व्यर्थानि मेऽहान्यखिलेन्द्रियाण्यलम्। पाषाणशुष्केन्धनभारकाण्यहो बिभर्मि वा तानि कथं हतत्रपः॥ 28॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! श्रीकृष्णके रूप-गुण-लीला सेवन न करके मेरी समस्त इन्द्रियाँ (और सभी दिन) व्यर्थ हो रहे हैं, अब मैं उन सब पाषाण (पत्थर) और सूखी-लकड़ीके समान इन्द्रियोंको निर्लज्ज होकर धारण करनेमें कैसे सक्षम होऊँगी?॥ 28॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं (श्रीकृष्णरूपगुणलीलानां निषेवणं शुश्रूषादिकं) बिना मे (मम) अहानि (दिनानि जीवितकालानि) अखिलेन्द्रियाणि (सर्वहर्षीकाणि भोग्याङ्गविग्रहाणि च) अलं व्यर्थानि (विफलप्रदानि भवन्ति)। अहो, पाषाणशुष्केन्धनभारकाणि (पाषाण-शुष्ककाष्ठतुल्यो भारो येषां तानि इन्द्रियाणि) कथं वा बिभर्मि (धारयामि)? अहं हतत्रपः (निर्लज्जः), [अतः कृष्णभोगरहिते जीवितविग्रहे मम स्पृहा वर्त्तते]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके रूप-गुण-लीलाकी सेवाके बिना मेरा जीवनकाल और समस्त इन्द्रियाँ विफल हो रही हैं। अहो! पाषाण-शुष्ककाठके तुल्य भारके समान इन्द्रियोंको मैं कैसे धारण करूँगी? मैं निर्लज्ज हूँ [इसलिये श्रीकृष्णसेवाके बिना जीवित रहनेकी स्पृहा (कामना) मुझमें है]॥ 28॥ (1) भोगरत चक्षुकी व्यर्थता :- “वंशीगानामृत-धाम, लावण्यामृत-जन्मस्थान, ये ना देखे से चाँदवदन। से नयने किवा काज, पडुक् तार मुण्डे बाज, से नयन रहे कि कारण॥ 29॥ अनुवाद—"वे आँखें किस कामकी यदि उनसे श्रीकृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन न किया जाय जो समस्त लावण्यामृतका जन्मस्थान और वंशीके गानामृतका आधार है? उसके सिरपर तो वज्रपात होना चाहिये, उसने ऐसी आँखोंको क्यों धारण किया है?॥ 29॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णका मुखचन्द्र वंशीगानका अमृतधामस्वरूप और लावण्यरूप अमृतका जन्मस्थान- स्वरूप है॥ 29॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका मुखचन्द्र वंशीगानरूप अमृतका आश्रय और लावण्यामृतका मूल है। जिस गोपीके नेत्र इस प्रकार परमरमणीय श्रीकृष्णरूपके दर्शनसे वञ्चित हैं, उन नेत्रोंके आश्रय उस गोपीके मस्तकपर वज्रपात होना ही श्रेयस्कर है। वास्तवमें गोपियाँ श्रीकृष्णसे अतिरिक्त कोई भी वस्तु देखकर उसके प्रति वैराग्य दिखलाती हैं अथवा उदासीन रहती हैं, उसमें उनकी कोई रुचि नहीं होती। उनके नयनाभिराम (नयनोंको 56 ।