श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 909, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/29-34 ] आनन्द देनेवाले) सेव्य श्रीकृष्णका मुखचन्द्र ही उनकी नेत्र इन्द्रियोंकी आराध्य वस्तु है। जिसके नेत्रोंका आराध्य श्रीकृष्णका मुखचन्द्र नहीं है, वह नेत्र-धारक या नेत्रोंका आधारस्वरूप सिर वज्रपात होने योग्य ही है। गोपियाँ यह नहीं समझ सकतीं कि श्रीकृष्णके दर्शनके अतिरिक्त नेत्रोंको धारण करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ 29॥ सखि हे, शुन, मोर हत विधिबल। मोर वपु-चित्त-मन, सकल इन्द्रियगण, कृष्ण बिना सकल विफल॥30॥ध्रु॥ अनुवाद—हे सखि, सुनो! मैंने अपना सौभाग्य गँवा दिया है, अब श्रीकृष्णसेवाके बिना मेरा तन-चित्त-मन और सभी इन्द्रियाँ निष्फल ही हैं॥30॥ (2) भोगरत कानोंकी व्यर्थता :— कृष्णेर मधुर वाणी, अमृतेर तरङ्गिणी, तार प्रवेश नाहि ये श्रवणे। काणाकड़ि-छिद्र सम, जानिह से श्रवण, तार जन्म हैल अकारणे॥31॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी मधुर वाणी (अथवा श्रीकृष्ण-सम्बन्धी शब्द) अमृतकी तरङ्गोंके समान है। यदि किसीके कानोंमें यह अमृत नहीं जाता, तो वे कान फूटे हुए शङ्खके समान हैं। ऐसे कानोंका होना व्यर्थ ही है॥31॥ (3) भोगरत जिह्वाकी व्यर्थता :— कृष्णेर अधरामृत, कृष्ण-गुण-चरित, सुधासार-स्वादु-विनिन्दन। तार स्वाद ये ना जाने, जन्मिया ना मैल केने, से रसना भेक-जिह्वा सम॥32॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका अधरामृत और उनके दिव्य गुण-चरितादिका गानरूप अमृत अन्य सभी प्रकारके अमृतके स्वादको विनिन्दित करते हैं। जिसने इसका आस्वादन नहीं किया है, वह जन्म लेते ही मर क्यों नहीं गया? (अर्थात् उसके जीनेका क्या प्रयोजन है?) उसकी जिह्वा तो मेंढककी जिह्वाके समान है (जो टर्र-टर्र करके मृत्युरूप साँपको अपनी ओर बुलाती है)॥32॥ (4) भोगरत नासिकाकी व्यर्थता :— मृगमद-नीलोत्पल, मिलने ये परिमल, येइ हरे तार गर्व-मान। हेन कृष्ण-अङ्ग-गन्ध, यार नाहि से सम्बन्ध, सेइ नासा भस्त्रार समान॥33॥ अनुवाद—कस्तूरी और नीलकमलकी मिलित सुगन्धको भी पराभूत करनेवाली सुगन्ध श्रीकृष्णके समस्त अङ्गोंमें है—जिसकी नासिकाने ऐसी सुगन्धका आस्वादन नहीं किया, वह नासिका तो लोहारकी धौंकनीके समान है॥33॥ (5) भोगरत त्वचाकी व्यर्थता :— कृष्ण-कर-पदतल, कोटिचन्द्र-सुशीतल, तार स्पर्श येन स्पर्शमणि। तार स्पर्श नाहि यार, से याउक छारखार, सेइ वपु लोहा-सम जानि॥” 34॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी हथेली और श्रीचरणोंके तलवे करोड़ों-करोड़ों चन्द्रमाओंसे अधिक शीतलता प्रदान करनेवाले हैं। उनका स्पर्श तो स्पर्शमणिके समान है। जिसने उनका स्पर्श नहीं किया है, उसका जीवन व्यर्थ है और उसका शरीर लोहेके समान है, अर्थात् मायाके त्रिताप भोगनेके योग्य है॥”34॥ अनुभाष्य—(श्रीमद्भागवत 2/3/17-24)— “आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तञ्च यन्नसौ। तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमःश्लोकवार्त्तया॥17॥ तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्वसन्त्युत। न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामे पशवोऽपरे॥18॥ । 57