श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 907, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/19-26 ] अबलार शरीरे, बिन्धि' कैल जरजरे, दुःख देय, ना लये जीवन ॥22॥ परमप्रेष्ठ-सखियोंके प्रति भी दोषारोपण :- अन्येर ये दुःख मने, अन्ये ताहा नाहि जाने, सत्य एइ शास्त्रेर विचार। अन्य जन काँहा लिखि, ना जानये प्राणसखी, याते कहे धैर्य धरिबार ॥23॥ आयुके अल्प होनेके कारण विलम्ब या प्रतीक्षासे हताशभाव :- 'कृष्ण-कृपा-पारावार, कभु करिबेन अङ्गीकार', सखि, तोर ए व्यर्थ वचन। जीवेर जीवन चञ्चल, येन पद्मपत्रेर जल, तत दिन जीवे कोन् जन ॥24॥ शत वत्सर पर्यन्त, जीवेर जीवन अन्त, एइ वाक्य कह ना विचारि'। नारीर यौवन-धन, यारे कृष्ण करे मन, से यौवन-दिन दुइ चारि ॥25॥ अग्नि और पतङ्गेके साथ कृष्ण और अपनी तुलना :- अग्नि यैछे निज-धाम, देखाइया अभिराम, पतङ्गीरे आकर्षिया मारे। कृष्ण ऐछे निज-गुण, देखाइया हरे मन, पाछे दुःख-समुद्रेते डारे ॥"26॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥19-26॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिका कह रही हैं,-"अहो! दुःखकी बात क्या कहूँ? कृष्णमिलनसे हमारा प्रेमाङ्कुर उत्पन्न हुआ; अब कृष्ण विच्छेदसे उस प्रेमाङ्कुरको आघात लगा और अब वह दुःखके प्रवाहमें बह रहा है। इस रोगके कृष्ण ही एकमात्र चिकित्सक हैं, किन्तु कृष्ण उस प्रेमाङ्कुरकी रक्षा करनेके लिये कोई यत्न नहीं कर रहे हैं। कृष्णके व्यवहारके बारेमें क्या कहूँ!-वे बाहरसे तो नागरराज (प्रेम व्यवहारमें चतुर) हैं, परन्तु भीतरमें शठता (धूर्तता)से परिपूर्ण हैं और परनारी-वधमें बहुत कुशल हैं। कृष्णके साथ प्रीति करनेसे ऐसा फल! हे सखी! इस विधिके विधानको न बूझकर मैंने सुखके लिये प्रीति की, किन्तु इस दुखियारीको उसका विपरीत होकर महादुःख मिला। अब तो स्थिति यह है कि प्राण अब जायेंगे या तब जायेंगे। हमारे कृष्ण तो ऐसे हैं, और 'प्रेम' नामक जो एक तत्त्व है, उसके विषयमें क्या कहूँ? प्रेम तो स्वभावसे कुटिल और अज्ञानी (अन्धा) है। उसने उचित या अनुचित स्थान न जानकर और उस मन्दबुद्धिने फल या कुफलका विचार न करके कृष्णरूप क्रूर शठकी गुण-रस्सीसे मेरे हाथ-गलेको बाँधकर रख दिया है, मैं उससे अपनेको छुड़ा नहीं पा रही हूँ! कृष्ण और प्रेम-इन दोनोंका यही कार्य है। इस प्रीतिकार्यमें 'मदन' नामक एक और तत्त्व है। उसके गुण ये हैं, - वह स्वयं तो देहरहित है, परन्तु दूसरोंको सतानेमें बहुत प्रवीण है। पाँच बाण सन्धान करके अबलाओंके शरीरको बींधकर जर्जरित कर देता है। यदि वह एक बारमें वध करके प्राण ले लेता, तो अच्छा होता, परन्तु वह ऐसा न करके केवल दुःख ही देता है। शास्त्रोंमें कहा है कि एक व्यक्तिका दुःख अन्य कोई नहीं जान सकता। इस सम्बन्धमें औरोंकी बात क्या कहूँ, मेरी ललितादि सभी प्राणसखियाँ भी मेरे दुःखको समझ नहीं पातीं और 'हे सखी, धैर्य रखो' ऐसा बार-बार कहती हैं। हे सखी! तुम यह कहती हो, - 'कृष्ण कृपाके समुद्र हैं, वे कभी-न-कभी तुम्हें अङ्गीकार करेंगे', -किन्तु तुम्हारे ये शब्द कभी सत्य नहीं होंगे; क्योंकि कमलके पत्तेपर जलकी बूँदके समान जीवका जीवन चञ्चल है। कृष्णकृपा जिस समय होगी, उस समय तक क्या मैं जीवित रहूँगी? मनुष्यकी आयु तो सौ वर्षसे अधिक नहीं है। और विचार करके देखो, कृष्ण-चित्तहारी रमणीका यौवनधन तो बहुत अल्प समयके लिये ही है। यदि तुम कहो, - कृष्ण तो गुणोंके सागर हैं, वे अवश्य ही कृपा करेंगे, इसलिये कहती हूँ कि अग्नि जिस प्रकार अपना प्रकाश दिखाकर । 55