भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 906

[ 2/15-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काहारे कहिब, केबा जाने मोर दुःख। व्रजेन्द्रनन्दन बिना फाटे मोर बुक॥"16॥ एमत विलाप करे विह्वल अन्तर। रायेर नाटक-श्लोक पड़े निरन्तर॥17॥ अनुवाद-महाप्रभुका करुण विलाप, - "हाय! मुरली वादन करते हुए मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मेरे प्राणनाथ व्रजेन्द्रनन्दन मिलेंगे? किससे मनका दुःख कहूँ? कौन मेरे दुःखको समझ सकता है? व्रजेन्द्रनन्दनके बिना मेरा हृदय फटा जा रहा है।" इस प्रकार महाप्रभु श्रीकृष्णविरहमें विह्वल होकर विलाप करते और श्रीराय रामानन्दके 'जगन्नाथ-वल्लभ' नाटकके इस श्लोकका सदा उच्चारण करते॥15-17॥ जगन्नाथवल्लभ नाटक (3/9)- प्रेमच्छेद‌रुजोऽवगच्छति हरिनार्यं न च प्रेम वा स्थानास्थानमवैति नापि मदनो जानाति नो दुर्बलाः। अन्यो वेद न चान्यदुःखमखिलं नो जीवनं वाश्रवं द्वित्रीण्येव दिनानि यौवनमिदं हाहा विधेः का गतिः॥18॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हमारे कृष्ण प्रेमके द्वारा दिये गये आघातजनित रोगको अनुभव नहीं करते। प्रेमकी बात ही क्या कहूँ, वह तो स्थान-अस्थानको (कहाँ करना है और कहाँ नहीं करना है, इसको) न जानकर आघात करता है। मदनकी तो बात क्या है, क्योंकि वह यह भी नहीं समझता है कि हम अति दुर्बल हैं। हम किसे क्या कहें, कोई हमारे इन सब दुःखोंको नहीं समझ सकता। हमारा जीवन हमारे वशमें नहीं है; यौवन तो दो-तीन दिनके समान थोड़े समयका है। हाय! इस अवस्थामें हे विधाता! हमारी क्या गति होगी? पाठान्तरमें-'विधे'॥18॥ अनुभाष्य- अयं हरिः (कृष्णः) अस्मान् प्रेमच्छेद‌रुजः (प्रेमच्छेदेन तस्य प्रेमभङ्गेन याः रुजः ताः विच्छेदरोगार्त्ताः गोपी) न अवगच्छति (जानाति); प्रेम वा स्थानास्थानां (सदसत्-पात्रापात्रं) न अवैति (जानाति); मदनः अपि नः (अस्मान्) दुर्बलाः (परवश्याः अबलाः) न जानाति। अन्यः जनः अन्यदुःखं (अपरजनकलेशं) न वेद (जानाति)। नः (अस्माकं) जीवनम् आश्रवं (क्लेशमात्रं परवश्यं वा)। इदं यौवनं द्वित्रीण्येव दिनानि ! हा हा विधेः (विधातुः) का गतिः (कीदृशी गतिः, अस्माभिर्दुर्बोध्येति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-(राधाजी शोकमैं विह्वल होकर कहती हैं)-प्रेमके विच्छेदसे जो वेदना हमें हो रही है, उसे कृष्ण नहीं जानते। प्रेम पात्र या अपात्र नहीं देखता है। और न ही मदन (कामदेव) यह जानता है कि हम अति दुर्बल हैं [हम उसके वारको झेल नहीं पायेंगी, फिर भी वह हमपर निरन्तर वार कर रहा है]। कोई किसीके दुःखको नहीं समझ सकता। हमारा जीवन तो क्लेशमात्र और दूसरेके वशमें है। यह यौवन भी तो दो-तीन दिनकी भाँति अल्प समयका है। हा! हा! हे विधाता! ऐसेमें हमारी क्या गति होगी? (हमारे लिये यह जानना अति कठिन है-यह भाव है)॥18॥ अत्यन्त विरहके कारण श्रीकृष्णके प्रति दोषोद्गार :- “उपजिल प्रेमाङ्कुर, भाङ्ग्लि ये दुःख-पूर, कृष्ण ताहा नाहि करे पान। बाहिरे नागरराज, भितरे शठेर काज, परनारी वधे सावधान॥19॥ अपने भाग्यको धिक्कार :- सखि हे, ना बुझिये विधिर विधान। सुख लागि' कैलुँ प्रीति, हैल विपरीत गति, एबे याय, ना रहे पराण॥20॥ध्रु॥ प्रेमके प्रति दोषारोपण :- कुटिल प्रेमा अगेयान, नाहि जाने स्थानास्थान, भाल-मन्द नारे विचारिते। क्रूर शठेर गुणडोरे, हाते-गले बान्धि' मोरे, राखियाछे, नारिं उकाशिते ॥21॥ कृष्णकामनाके प्रति दोषोद्गार :- ये मदन तनुहीन, परद्रोहे परवीण, पाँच बाण सन्धे अनुक्षण। 54 ।