भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 905

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दूसरा अध्याय 2/6-15 ]


अमृतप्रवाह भाष्य—'हाले'—हिलने लगे ॥ 6 ॥ गम्भीरा-भितरे रात्रे नाहि निद्रा-लव। भित्ते मुख-शिर घषे, क्षत हय सब ॥ 7 ॥ अनुवाद— वे 'गम्भीरा' में रहते थे और रातमें एक क्षणके लिये भी उन्हें नींद नहीं आती थी। विरहमें व्याकुल होकर वे अपना मुख और सिर दीवारोंसे घिसते थे, जिससे उनमें घाव हो जाते ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'गम्भीरा'—बरामदेके बाद जो घर होता है, उसके भीतर जो छोटासा कमरा होता है, उसे 'गम्भीरा' कहते हैं ॥ 7 ॥ तिन द्वारे कपाट, प्रभु यायेन बाहिरे। कभु सिंहद्वारे पड़े, कभु सिन्धुनीरे ॥ 8 ॥ अनुवाद— गम्भीराके तीनों द्वार बन्द कर देनेपर भी वे वहाँसे निकल जाते और कभी श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरके सिंहद्वारपर पड़े मिलते और कभी समुद्रके जलमें कूद पड़ते ॥ 8 ॥ महाप्रभुको चिन्मय व्रजलीलाका उद्दीपन :- चटक-पर्वत देखि' 'गोवर्धन'-भ्रमे। धाञा चले आर्त्तनाद करिया क्रन्दने ॥ 9 ॥ उपवनोद्यान देखि' वृन्दावन-ज्ञान। ताँहा याइ' नाचे, गाय, क्षणे मूर्च्छा या'न ॥ 10 ॥ अनुवाद— चटक पर्वतको देखकर उन्हें गोवर्धनका भ्रम हो जाता, वे रोते और आर्त्तनाद करते हुए उसकी ओर दौड़ पड़ते। पुरीमें उपवन-उद्यानोंको देखकर उन्हें वृन्दावनकी स्फूर्ति होती, वे वहाँ जाकर नाचते-गाते और कभी उन्मादमें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते ॥ 9-10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चटकपर्वत'—समुद्र तटपर जो बालूका पहाड़ होता है, उसे 'चटकपर्वत' कहते हैं। गुण्डिचा मन्दिर और समुद्रके बीच एक बड़ा चटकपर्वत है, अनेक बार उसे देखकर महाप्रभु 'गोवर्धन'के भ्रमसे वहाँ दौड़ते हुए जाते थे ॥ 9 ॥


अनुभाष्य—'भ्रमे'—भ्रमसे ॥ 9 ॥ श्रीकृष्ण विरहसे उत्पन्न अपूर्व महाभाव-विकार :- काँहा नाहि शुनि येइ भावेर विकार। सेइ भाव हय प्रभुर शरीरे प्रचार ॥ 11 ॥ हस्तपादेर सन्धि सब वितस्ति-प्रमाणे। सन्धि छाड़ि' भिन्न हुये, चर्म रहे स्थाने ॥ 12 ॥ हस्त, पाद, शिर, सब शरीर-भितरे। प्रविष्ट हय—कूर्मरूप देखिये प्रभुरे ॥ 13 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके शरीरमें जो भाव प्रकाशित होते थे, वे इस जगत्में कहीं सुने भी नहीं जाते, अर्थात् किसी अन्यके शरीरमें नहीं हो सकते। कभी उनके हाथ-पाँवकी अस्थियोंके जोड़ खुलकर वितस्ति (हथेली फैलाकर अंगूठेके कोनेसे छोटी अंगुलीके कोने तक) जितने लम्बे हो जाते, केवल त्वचाके कारण ही वे अस्थियाँ शरीरमें टिकी रहतीं। कभी महाप्रभुके हाथ-पाँव-सिर उनके शरीरके भीतर चले जाते और उनका शरीर कछुवे जैसा हो जाता ॥ 11-13 ॥ अनुभाष्य— 'प्रचार'—प्रकाशित। जोड़ोंमें जुड़ी हुई अस्थियाँ अलग होकर केवल त्वचाका ही अस्तित्व दिखायी देता। सन्धि-स्थल तब फैली हुई हथेली जितने लम्बे हो जाते ॥ 11-12 ॥ एइ मत अद्भुत-भाव शरीरे प्रकाश। मनेते शून्यता, वाक्ये हाहा-हुताश ॥ 14 ॥ अनुवाद— इस प्रकार महाप्रभुके शरीरमें अद्भुत सात्त्विक भावोंका प्रकाश होता। श्रीकृष्णविरहमें उनके मनमें शून्यता अर्थात् जगत् उन्हें शून्य प्रतीत होता और जो वचन वे बोलते उसमें निराशा ही होती ॥ 14 ॥ कृष्णविरहमें महाप्रभुका करुण विलाप :- “काँहा मोर प्राणनाथ मुरलीवदन। काँहा करौं, काँहा पाङ व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 15 ॥

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