श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 892, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/208-216 ] इसलिये वे देहात्मबुद्धिके वशीभूत होकर हरिसे अपने सम्बन्धको न जाननेके कारण सामाजिक वर्णोचित नामादिके संरक्षणमें ही प्रमत्त रहते हैं ॥ 208 ॥ दैन्यपत्री लिखि' मोरे पाठाले बार बार। सेइ पत्रीद्वारा जानि तोमार व्यवहार ॥ 209 ॥ तोमार हृदय आमि जानि पत्र-द्वारे। तोमा शिखाइते श्लोक कहिलुँ बारे-बारे ॥ 210 ॥ अनुवाद—तुमने अनेक दैन्यपत्र लिखकर मुझे भेजे थे। उन्हें पढ़कर मैं तुम्हारे व्यवहारको अच्छी प्रकार जान गया था। तुम्हारे हृदयके भावोंको पत्रोंके द्वारा भली-भाँति जानकर मैंने तुम्हें शिक्षा देनेके लिये एक श्लोक (निम्नलिखित) को बार-बार लिखकर भेजा था ॥ 209-210 ॥ रागमार्गीय भक्तका लोक-व्यवहार :- महाप्रभुके द्वारा उक्त श्लोक- परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मसु। तमेवास्वादयत्यन्तर्नवसङ्गरसायनम् ॥ 211 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परपुरुषमें अनुरक्त रमणी (नारी) सभी गृहकर्मोंमें व्यग्रता दिखानेपर भी अन्तःकरणमें (अपने प्रेमीके साथ) नूतन सङ्गरसका आस्वादन करती है॥ 211 ॥ अनुभाष्य- परव्यसनिनी (निजपतिभिन्नापरपुरुषसङ्गामोदिनी) नारी (कुलरमणी) गृहकर्मसु व्यग्रा (पतिपुत्रसेवादिषु सेवैकपरताप्रदर्शनपरा) अपि अन्तः (हृदयाभ्यन्तरे) तं नवसङ्गरसायनं (नवनवकान्तसङ्गसुखरसस्थानम्) एव आस्वादयति। [यथा पत्यन्तर-भजनपरा नारी स्व-गृहधर्मपरा भूत्वा संसारे स्थित्वापि जारसङ्गसुखेन दिनानि यापयति, तथा वैधवर्णाश्रम-धर्मपालनेन मूढान् वञ्चयित्वा, चतुराणां वैष्णवानां हरिदास्यमेव भजन-चातुर्यम्]। श्लोक-भावानुवाद—जो कुलरमणी अपने पतिके बदले किसी दूसरे पुरुषसे प्रेम करती है, वह पति-पुत्रादिकी सेवामें अत्यन्त तत्परता दिखलाती है, परन्तु अपने हृदयमें वह अपने प्रेमीसे मिलनेके नव-नव रसोंका आस्वादन करती है। [जैसे पतिके स्थानपर अन्य पुरुषसे प्रेम करनेवाली नारी अपने गृहधर्म पालन करके संसारमें रहकर प्रेमीके सङ्गके सुखको हृदयमें आस्वादन करती हुई दिन यापन करती है, वैसे ही वैध-वर्णाश्रम- धर्मका पालन करके मूढ़ लोगोंकी वञ्चना करते हुए चतुर वैष्णवोंका हरिदास्यमें ही भजन-चातुर्य है।]॥ 211 ॥ रूप-सनातनको देखनेके लिये महाप्रभुका रामकेलिमें आगमन :- गौड़-निकट आसिते नाहि मोर प्रयोजन। तोमा-दुँहा देखिते मोर इँहा आगमन ॥ 212 ॥ एइ मोर मनेर कथा केह नाहि जाने। सबे बोले, केने आइला रामकेलि-ग्रामे ॥ 213 ॥ उत्कण्ठित दोनों भाइयोंको महाप्रभुका आश्वासन देना :- भाल हैल, दुइ भाइ आइला मोर स्थाने। घरे याह, भय किछु ना करिह मने ॥ 214 ॥ जन्मे जन्मे तुमि दुइ-किङ्कर आमार। अचिराते कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥" 215 ॥ अनुवाद-गौड़देशके निकट आनेका मेरा कोई प्रयोजन नहीं था, मैं तो केवल तुम दोनोंसे मिलनेके लिये यहाँ आया हूँ। मेरे मनकी यह बात कोई नहीं जानता है, इसलिये सब मुझसे रामकेलि ग्राममें आनेके कारणकी जिज्ञासा करते हैं। यह बहुत अच्छा हुआ कि तुम दोनों भाई मुझसे मिलने आये। अब तुम अपने घरको लौट जाओ और मनमें कोई भय मत करो। तुम मेरे जन्म-जन्मके सेवक हो, श्रीकृष्ण शीघ्र ही तुम्हारा उद्धार करेंगे॥" 212-215 ॥ दोनोंका महाप्रभुके श्रीचरणोंको शीशपर धारण करना :- एत बलि' दुँहार शिरे धरिल दुइ हाते। दुइ भाइ धरि' प्रभुर पद निल माथे ॥ 216 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने अपने दोनों हाथ । 39