भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 891

[ 1/203–208 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परमार्थसे (सत्यसे) परिपूर्ण है; वह यह है कि यदि आप हमारे प्रति दया नहीं करेंगे, तब हे नाथ! आप उपयुक्त दयाका पात्र और कहाँ पायेंगे? ॥ 203 ॥ अनुभाष्य— हे नाथ (प्रभो,) [तव] अग्रतः (पुरतः) मे (मम) एकं परमार्थं (वास्तवं) एव विज्ञापनं (निवेदनं) शृणु, - न [तत्] मृषा (मिथ्या); यदि मे (मम सम्बन्धे मयि) न दयिष्यसे (दयां करिष्यसि), तदा तव दयनीयः (दयार्हः) दुर्लभः। [सर्वार्धमत्वात् दयायोग्यपात्रत्वात् मम अपकृष्टत्वस्य आधिक्यम्]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य देखें ॥ 203 ॥ आपने अयोग्य देखि' मने पाङ क्षोभ। तथापि तोमार गुणे उपजय लोभ ॥ 204 ॥ वामन हञा चाँद धरिते इच्छा करे। तैछे मोर एइ वाञ्छा उठये अन्तरे ॥"205 ॥ अनुवाद—अपनेको आपकी कृपाके अति अयोग्य जानकर हमारे मनमें क्षोभ हो रहा है, परन्तु आपके दिव्य गुणोंको देखकर हमारे हृदयमें लोभ भी उत्पन्न हो रहा है। जैसे बौना व्यक्ति चाँदको पकड़नेकी असम्भव इच्छा करे, वैसे ही हमारे मनमें भी ऐसी महत् कामना जाग्रत हो रही है॥"204-205 ॥ श्रीमद्यमुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न-श्लोक (46) :— भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्तनिःशेषमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामि सनाथजीवितम् ॥ 206 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपकी निरन्तर सेवाके द्वारा अन्य मनोरथोंसे सर्वथा रहित होकर प्रशान्तभावसे मैं कब अपनेको आपके नित्यदास कहकर दास्यजीवनके सहित आनन्दसे प्रफुल्लित होऊँगा ? ॥ 206 ॥ अनुभाष्य— हे नाथ, (प्रभो,) प्रशान्तनिःशेष-मनोरथान्तरः (प्रशान्तं निश्चलं निःशेषं सम्पूर्णं मनोरथानां वासनानां अन्तरं यस्य सः) ऐकान्तिकनित्यकिङ्करः (दृढ़नित्यदासः सन्) सः अहं भवन्तं (मम सेव्यं त्वम्) एव निरन्तरः (सान्द्रः) अनुचरन् (परिचर्यां कुर्वन् घनमनुगच्छन्) कदा (कस्मिन्काले) जीवितं (प्राणान्) प्रहर्षयिष्यामि (सर्वतोभावेन सुखयिष्यामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206 ॥ श्रीरूपको लक्ष्य करके दोनोंके लिये महाप्रभुके कृपामय वचन :— शुनि' महाप्रभु कहे, — “शुन, दबिर खास। तुमि दुइ भाइ—मोर पुरातन दास ॥ 207 ॥ आजि हैते दुँहार नाम 'रूप' 'सनातन'। दैन्य छाड़, तोमार दैन्ये फाटे मोर मन ॥ 208 ॥ अनुवाद—उनकी प्रार्थना सुनकर महाप्रभु बोले,— “सुनो, दबिर खास, तुम दोनों भाई मेरे प्राचीन (नित्य) दास हो। आजसे तुम दोनोंके नाम रूप और सनातन होंगे। अपनी दीनताका त्याग करो, तुम्हारे दैन्य भावसे मेरा हृदय फटा जा रहा है॥ 207-208 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने प्रसादके रूपमें दबिरखासका नाम 'रूप' और साकर मल्लिकका नाम 'सनातन' रखा। गुरुके द्वारा वैध कनिष्ठ-अधिकारीका नामकरण एक संस्कार है। जो गुरुके द्वारा प्रदान किये नाम-प्रसादकी अवज्ञा करते हैं अर्थात् उसका अनादर करते या उसमें दोष देखते हैं, उनके द्वारा हरिभक्तिकी सम्भावना नहीं है; वे जड़ जगत्की प्रतिष्ठामें मत्त रहते हैं। “शङ्खचक्राद्यूर्ध्वपुण्ड्र तन्नामकरणञ्चैव वैष्णवत्वमिहोच्यते ॥” अर्थात् “शङ्ख, चक्र, पद्म, गदा आदि विष्णु चिह्न और उर्ध्वपुण्ड्र करना एवं गुरुके द्वारा उनका नामकरण—ये सभी कनिष्ठ वैष्णवोंके लक्षण हैं।” प्राकृत सहजियोंमें विष्णु-दास्यपरक नामकरण नहीं होनेसे उन्हें अब 'गौड़ीय वैष्णव' नहीं कहा जा सकता। अवैष्णव लोग वैष्णव-गुरुसे नाम नहीं प्राप्त करते। 38 ।