भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 893

[ 1/216-226 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उन दोनोंके सिरपर रख दिये और उन दोनों भाइयोंने महाप्रभुके चरणोंको अपने सिरपर धारण किया॥ 216॥ कृपासे द्रवित महाप्रभुका दोनोंपर भक्तोंसे कृपा करनेका आवेदन :- दौँ हा आलिङ्गिया प्रभु बलिल भक्तगणे। “सबे कृपा करि' उद्धार' एइ दुइ जने॥” 217॥ अनुवाद—महाप्रभुने दोनोंको उठाकर उनका आलिङ्गन किया और सभी भक्तोंको उन दोनोंपर कृपा करके उनका उद्धार करनेको कहा॥ 217॥ भक्तोंका विस्मय और आनन्द :- दुइजने प्रभुर कृपा देखि' भक्तगणे। 'हरि' 'हरि' बोले सबे आनन्दित-मने॥ 218॥ अनुवाद—उन दोनोंपर महाप्रभुकी कृपा देखकर सभी भक्त आनन्दित होकर 'हरि' 'हरि' बोलने लगे॥ 218॥ सभी भक्तोंके चरणोंमें कृपाकी याचना और सबके द्वारा धन्यवादकी प्राप्ति :- नित्यानन्द, हरिदास, श्रीवास, गदाधर। मुकुन्द, जगदानन्द, मुरारि, वक्रेश्वर॥ 219॥ सबार चरणे धरि' पड़े दुइ भाइ। सबे बोले, -धन्य तुमि, पाइले गोसाञि॥ 220॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीमुकुन्द दत्त, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीवक्रेश्वर पण्डित आदि महाप्रभुके जितने भक्त वहाँ उपस्थित थे, श्रीरूप और सनातन, दोनों भाइयोंने गिरकर सबके चरणकमलोंको पकड़ा और सभी भक्त उन्हें आशीर्वाद देते कहने लगे कि तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने महाप्रभुकी कृपा प्राप्त की है॥ 219-220॥ विदायीके समय श्रीसनातनका महाप्रभुको सत्परामर्श :- सबा-पाश आज्ञा मागि' चलन-समय। प्रभु-पदे कहे किछु करिया विनय॥ 221॥ “इहाँ हैते चल, प्रभु, इँहा नाहि काज। यद्यपि तोमारे भक्ति करे गौड़राज॥ 222॥ तथापि यवन जाति, ना करिह प्रतीति। तीर्थयात्राय एत संघट्ट, भाल नहे रीति॥ 223॥ अपने भजन-क्षेत्रमें बहुत बहिरङ्ग लोगोंका होना अप्रयोजनीय :- याहाँ सङ्गे चले एइ लोक लक्षकोटि। वृन्दावन याइबार ए नहे परिपाटी॥” 224॥ अनुवाद—चलते समय दोनोंने सभीसे जानेकी आज्ञा माँगी और महाप्रभुके चरणकमलोंमें एक निवेदन किया। (श्रीसनातन गोस्वामी) ने कहा, - “हे प्रभो! यद्यपि बङ्गालका राजा आपका बहुत सम्मान करता है, तथापि आपका अब यहाँ और कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिये आप यहाँसे प्रस्थान करें। राजा यवन जातिका है, इसलिये उसका अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता है। तीर्थयात्रापर इतनी भीड़के साथ जानेकी रीति अच्छी नहीं है। आपके साथ हजारों-लाखों लोग जा रहे हैं, वृन्दावन जानेकी यह परिपाटी नहीं है॥” 221-224॥ स्वयं परमेश्वर होते हुए भी आचार्यरूपसे कनिष्ठाधिकारीको शिक्षाका सुयोग प्रदान :- यद्यपि वस्तुतः प्रभुर किछु नाहि भय। तथापि लौकिकलीला, लोक-चेष्टामय॥ 225॥ अनुवाद—यद्यपि वास्तवमें महाप्रभुको किसीसे कोई भय नहीं है, तो भी उन्होंने लौकिक लीलाके अनुरूप जगत्में शिक्षा देनेके लिये साधारण मनुष्यके जैसा आचरण किया॥ 225॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 16/265-276 संख्या देखें॥ 221-225॥ दोनों भाइयोंका विदायी ग्रहण करना :- एत बलि' चरण वन्दि' गेला दुइजने। प्रभुर सेइ ग्राम हैते चलिते हैल मन॥ 226॥ 40 ।