भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 894

पहला अध्याय 1/226-235 ]

अनुवाद-ऐसा कहकर दोनों भाई महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना करके अपने घरको लौट गये। तब महाप्रभुने रामकेलि ग्रामसे प्रस्थान करनेका निश्चय किया॥ 226 ॥

रामकेलिसे ‘कानाइ नाट्यशाला' :- प्राते चलि' आइला 'कानाइर नाटशाला'। देखिल सकल ताँहा कृष्णचरित्र-लीला ॥ 227 ॥

अनुवाद-प्रातः कालमें महाप्रभु ‘कानाइ-नाटशाला' में आये और उन्होंने वहाँ श्रीकृष्णकी अनेक लीलाओंका दर्शन किया॥ 227 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- ‘कृष्णचरित्र-लीला'-उस समयमें गौड़देशके अनेक स्थानोंपर ‘कानाइ-नाटशाला' नामक स्थानकी व्यवस्था थी। गौड़देशके निकट जो कनाइ- नाटशाला थी, वहाँ महाप्रभुने कृष्णलीलाके नाना प्रकारके चित्रवर्णन देखे॥ 227 ॥

सनातनके परामर्शके अनुसार महाप्रभुके द्वारा वृन्दावन जानेकी इच्छाका त्याग :- सेइ रात्रे ताँहा प्रभु चिन्ते मने मन। 'सङ्गे संघट्ट भाल নহে, बोले सनातन ॥ 228 ॥ मथुरा याइब आमि एत लोक सङ्गे। किछु सुख ना हइबे, हवे रसभङ्गे ॥ 229 ॥ एकाकी याइब, किम्वा सङ्गे एक जन। तबे से शोभय वृन्दावनेरे गमन ॥ '230 ॥

अनुवाद-उस रात्रिमें श्रीसनातनकी बातपर विचार करके महाप्रभुने निर्णय लिया, - 'इतने लोगोंको साथ लेकर वृन्दावन जाना उचित नहीं है। यदि मैं मथुरा इतने लोगोंके साथ जाऊँगा, तो कोई आनन्द नहीं आयेगा और रस भङ्ग हो जायेगा। यदि मैं अकेले अथवा केवल एक व्यक्तिको लेकर जाऊँगा, तो वृन्दावनकी यात्रा बड़ी सुखप्रद होगी ॥ '228-230 ॥

अनुभाष्य-मध्यलीला 16/265-276 संख्या देखें ॥ 229-230 ॥

नीलाचलकी ओर जाते हुए शान्तिपुरमें आगमन और वहाँ पाँच-सात दिन ठहरना :- एत चिन्ति' प्रातःकाले गङ्गास्नान करि'। 'नीलाचले याब' बलि' चलिला गौरहरि ॥ 231 ॥ एइमत चलि' चलि' आइला शान्तिपुरे। दिन पाँच-सात रहिला आचार्येर घरे ॥ 232 ॥

अनुवाद-इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन्होंने प्रातःकाल गङ्गामें स्नान किया और अपनी यात्रा आरम्भ करते हुए सबसे कहा, - 'मैं नीलाचल जाऊँगा।' चलते-चलते वे शान्तिपुर आये और वे श्रीअद्वैताचार्यके घरमें पाँच-सात दिन रहे ॥ 231-232 ॥

श्रीअद्वैताचार्यके घरमें शचीमाताके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- शचीदेवी आसि' ताँरे कैल नमस्कार। सातदिन ताँर ठाञि भिक्षा-व्यवहार ॥ 233 ॥

अनुवाद-महाप्रभुके शान्तिपुर आनेका समाचार सुनकर शचीमाता भी वहाँ आयीं और महाप्रभुने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने सात दिन वहाँ रहकर महाप्रभुके लिये भोजन बनाया ॥ 233 ॥

अनुभाष्य-मध्यलीला 16/212-216, 223, 234, 245-250 संख्या और चैः भाः अन्त्यखण्ड तीसरा अध्याय देखें ॥ 232-233 ॥

सब भक्तोंको विदायी देना और रथयात्राके समय पुरीमें मिलनेका आदेश :- ताँर आज्ञा लञा पुनः करिला गमने। विनय करिया विदाय दिल भक्तगणे ॥ 234 ॥ “जना दुइ सङ्गे आमि याब नीलाचले। आमारे मिलिबा आसि' रथयात्रा-काले ॥ "235 ॥

अनुवाद-शचीमातासे आज्ञा लेकर महाप्रभु नीलाचलकी ओर चले, तो भक्त लोग उनके पीछे-पीछे चलने लगे। महाप्रभुने उनसे अनुनय-विनय करके

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