श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 900, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/278-285 ] के शिखाल एइ लोके, कहे कोन् बात। इहा-सबारे मुख ढाका दिया राख' हात ॥ 279 ॥ सूर्य येन उदय करि' चाहे लुकाइते। बुझिते ना पारि तोमार ऐछन चरिते ॥" 280 ॥ अनुवाद-स्तव सुनकर श्रीनिवास ठाकुर महाप्रभुसे परिहाससे कहने लगे, - “आप घरके भीतर तो अपनी भगवत्ताको गोपन रखना चाहते हैं और बाहर आकर इसे सबके सामने प्रकाशित कर रहे हैं। इन्हें किसने यह शिक्षा दी है? वे लोग क्या कह रहे हैं? अब आप इन सबके मुख अपने हाथोंसे ढककर बन्द कर दीजिये। सूर्य जैसे उदित होकर स्वयंको छिपाना चाहे, वैसे ही आप अपनेको गोपन रखना चाहते हैं। मैं आपके ऐसे व्यवहारको नहीं समझ पा रहा हूँ।” 278-280 ॥ महाप्रभुकी लज्जा और श्रीवासको कृत्रिम शिकायत :- प्रभु कहेन, - “श्रीनिवास, छाड़ विड़म्बना। सबे मेलि' कर मोर कतेक लाञ्छना ॥” 281 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा-“प्रिय श्रीनिवास ! कृपा करके इस उपहासको बन्द करो। तुम सब मिलकर मुझे लज्जित कर रहे हो ॥” 281 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें दूसरी पंक्ति परिवर्तित होकर इस प्रकारसे देखी जाती है, - “सेइ सब कर याते आमार यातना” अर्थात् वे सब मुझे पीड़ा दे रहे हैं॥ 281 ॥ प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। महाप्रभुकी कृपा दृष्टि-वर्षणसे लोगोंका उद्धार :- एत बलि' लोके करि' शुभदृष्टिदान। अभ्यन्तरे गेला, लोकेर पूर्ण हैल काम ॥ 282 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने लोगोंपर अपनी कृपा दृष्टि डाली और वे अपने कक्षमें चले गये। उनकी कृपा दृष्टिमात्रसे सभीकी सब कामनायें पूर्ण हो गयीं ॥ 282 ॥ अनुभाष्य-अन्त्यलीला 9/7-12 संख्या देखें ॥ 267-282 ॥ पाणिहाटीमें श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीनित्यानन्द और उनके परिकरोंकी सेवा :- रघुनाथ-दास नित्यानन्द-पाशे गेला। चिड़ा-दधि-महोत्सव ताँहाइ करिला ॥ 283 ॥ तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्दकी कृपासे रघुनाथदास गोस्वामीका गृहत्याग तथा पुरीमें महाप्रभुके चरणोंमें आगमन और स्वरूप दामोदरके निकट आत्मसमर्पण :- ताँर आज्ञा लञा गेला प्रभुर चरणे। प्रभु ताँरे समर्पिला स्वरूपेर स्थाने ॥ 284 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथदास पाणिहाटीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनपर कृपा की और उनसे सभी वैष्णवोंके लिये दही-चिड़वा महोत्सव करानेकी आज्ञा दी। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथदास गृह त्यागकर महाप्रभुकी शरणमें गये और महाप्रभुने उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें सौंप दिया ॥ 283-284 ॥ अनुभाष्य-इस सन्दर्भमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामी अपने ग्रन्थ विलाप-कुसुमाञ्जलीमें लिखते हैं- “यो मां दुस्तरगेहनिर्जलमहाकूपादपारक्लमात् सद्यः सान्द्रदयाम्बुधिः प्रकृतितः स्वैरी-कृपारज्जुभिः। उद्धृत्यात्म-सरोजनिन्दितचरणप्रान्तं प्रपाद्य स्वयं श्रीदामोदरसाच्चकार तमहं चैतन्यचन्द्रं भजे ॥” अर्थात् “मैं उन महाप्रभुके चरणकमलोंका भजन करता हूँ, जिन्होंने अपनी कृपा-रज्जुके द्वारा मेरा गृहरूपी सूखे (अन्धे) कुएँसे उद्धार करके श्रीस्वरूप दामोदरकी शरण प्रदान करके मुझे दिव्यानन्दके समुद्रमें निमम्जित कर दिया है।” अन्त्यलीला, छठा अध्याय देखें ॥ 283-284 ॥ ब्रह्मानन्द भारतीका चर्मवस्त्र-त्याग :- ब्रह्मानन्द-भारतीर घुचाइल चर्म्माम्बर। एइ मत लीला कैल छव वत्सर ॥ 285 ॥ । 47