श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 901, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/285-287 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—महाप्रभुने ब्रह्मानन्द भारतीसे मृगछाला पहननेका अभ्यास छुड़वाया। इस प्रकार उन्होंने छह वर्षोंतक दिव्य लीलाओंका आनन्द लिया॥ 285 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, दसवाँ अध्याय देखें॥ 285 ॥ अठारह वर्षोंमें अन्तिम बारह वर्षोंकी लीलाओंका आगे सूत्ररूपमें वर्णन :— एइ त' कहिल मध्यलीलार सूत्रगण। शेष द्वादश वत्सरेर शुन विवरण॥ 286 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (श्रीकृष्णदास कविराज) सूत्ररूपसे मध्यलीला कही। शेष बारह वर्षोंकी लीलाका विवरण अब सुनो॥ 286 ॥ अनुभाष्य—आदिलीलाके 17/312 संख्यामें वर्णित व्यासदेवके आचारका अनुगमन करते हुए लिखित प्रबन्धका अनुवाद, आदि, मध्य और अन्त्य—इन तीन लीलाओंके अन्तिम भागमें लिखा गया है। आदिलीलाको पाँच-आयुभेदसे केवल सूत्ररूपमें लिखकर कुछ लीलाओंका वर्णन करते हुए उल्लेख किया कि इनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तृतरूपसे वर्णन किया है। शेषलीला अर्थात् मध्य और अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें इस अध्यायमें लिखकर अन्तिम बारह वर्षोंकी लीलाओंका सूत्ररूपमें वर्णन दूसरे अध्यायमें किया है। इसके बाद क्रमशः मध्य और अन्त्यलीलाका विस्तृत विवरण दिया गया है। इस प्रकार रचनाका उद्देश्य (अन्त्यलीला 1/10) के अनुसार— “मध्यलीला-मध्ये अन्त्यलीला-सूत्रगण। पूर्वग्रन्थे संक्षेपेते करियाछि वर्णन॥ आमि जराग्रस्त, निकट जानिया मरण। अन्त्यलीलार कोन सूत्र करियाछि वर्णन॥” अर्थात् “मध्यलीलाके बीचमें मैंने अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें वर्णन किया है। मैं अति वृद्ध हो गया हूँ और रोगग्रस्त भी हूँ। मैं किसी समय भी देह त्याग सकता हूँ, इसलिये मैंने अन्त्यलीलाके कुछ भागका मध्यलीलामें वर्णन किया है॥” 286 ॥ प्रथम अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 287 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे मध्यलीला-सूत्रवर्णनं नाम प्रथम-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 287 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यखण्डमें मध्यलीला-सूत्रवर्णन नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त। 48 ।