भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 899

[ 1/267-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्रह्माण्डवासी असंख्य जीवोंका महाप्रभुके दर्शनसे उद्धार :— ब्रह्माण्ड-भितरे हय चोद्दभुवन। चोद्दभुवने बैसे यत जीवगण॥ 267 ॥ मनुष्येर वेश धरि' यात्रिकेर छले। प्रभुर दर्शन करे आसि' नीलाचले ॥ 268 ॥ अनुवाद—इस ब्रह्माण्डमें चौदह लोक हैं और जितने भी प्राणी इन लोकोंमें वास करते हैं, वे सभी तीर्थयात्राके छलसे मनुष्य रूप धारण करके नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आते ॥ 267-268 ॥ श्रीवासादि भक्तोंके गौरकीर्त्तनमें महाप्रभुकी असहमति और रोषाभास एवं कृष्ण-कीर्त्तन करनेकी आज्ञा :— एकदिन श्रीवासादि यत भक्तगण। महाप्रभुर गुण गाञा करेन कीर्त्तन ॥ 269 ॥ शुनि' भक्तगणे कहे सक्रोध वचन। “कृष्ण-नाम-गुण छाड़ि, कि कर कीर्त्तन ॥ 270 ॥ औद्धत्य करिते हैल सबाकार मन। स्वतन्त्र हइया सबे नाशा'ले भुवन॥" 271 ॥ अनुवाद—एक दिन श्रीवासादि सभी भक्त महाप्रभुके गुणोंका कीर्त्तन कर रहे थे। अपनी प्रशंसा सुनकर महाप्रभु क्रोधित होकर सभीको डाँटते हुए बोले,— “कृष्णके नाम और गुणोंके कीर्त्तनको छोड़कर यह कैसा कीर्त्तन हो रहा है? तुम अपने मनके अनुसार स्वतन्त्रतापूर्वक आचरण करते हुए ऐसी धृष्टता कर रहे हो जिससे सारे संसारका नाश हो जायेगा ॥" 269-271 ॥ असंख्य जीवोंके कण्ठसे गौर-जयध्वनि और आर्त्ति ज्ञापन :— दशदिके कोटि कोटि लोक हेन काले। 'जय कृष्णचैतन्य' बलि' करे कोलाहले ॥ 272 ॥ “जय जय महाप्रभु—व्रजेन्द्रकुमार। जगत् तारिते प्रभु, तोमार अवतार ॥ 273 ॥ बहुदूर हैते आइनु हञा बड़ आर्त्त। दर्शन दिया प्रभु करह कृतार्थ ॥" 274 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार क्रोध प्रदर्शन करनेपर भी दसों दिशाओंसे लाखों-लाखों लोग तुमुलघोष करने लगे,—“श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो। महाप्रभुकी बारम्बार जय हो, जो स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं और जगत्का उद्धार करनेके लिये अवतरित हुए हैं। हे प्रभो! हम दुःखियारे लोग बहुत दूरसे आये हैं, अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ करो ॥" 272-274 ॥ महाप्रभुकी करुणा :— शुनिया लोकेर दैन्य द्रविला हृदय। बाहिरे आसि' दर्शन दिला दयामय ॥ 275 ॥ श्रीमहाप्रभुके कृपादेशको प्राप्तकर असंख्य लोगोंके कण्ठसे गौरहरिकी ध्वनि :— बाहु तुलि' बोले प्रभु—बल' 'हरि' 'हरि'। उठिल—श्रीहरिध्वनि चतुर्द्दिक भरि' ॥ 276 ॥ महाप्रभुकी स्तुति :— प्रभु देखि' प्रेमे लोक आनन्दित मन। प्रभुके ईश्वर बलि' करये स्तवन ॥ 277 ॥ अनुवाद—लोगोंकी दीन और दुःख भरी पुकार सुनकर महाप्रभुका हृदय पिघल गया। बाहर आकर परम कृपालु महाप्रभुने सभीको दर्शन दिया। महाप्रभुने दोनों भुजायें उठाकर सभीसे कहा,—“हरि बोल! हरि बोल!” सभी लोग अपनी भुजायें उठाकर 'हरि-हरि' बोलने लगे और उनकी ध्वनिसे चारों दिशायें गुञ्जायमान हो गयीं। महाप्रभुके दर्शन करके सभी लोग प्रेममें मग्न होकर आनन्दसे उनको भगवान् कहकर उनकी स्तव- स्तुति करने लगे ॥ 275-277 ॥ करोड़ों कण्ठोंसे महाप्रभुकी जयध्वनि सुनकर सुयोग समझकर श्रीवासके द्वारा महाप्रभुको उलाहना देना :— स्तव शुनि' प्रभुके कहेन श्रीनिवास। “घरे गुप्त हञा, केने बाहिरे प्रकाश ॥ 278 ॥ 46 ।