भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 896

पहला अध्याय 1/241-253 ] अनुभाष्य—'श्रीरूप-मिलन और शिक्षा'-मध्यलीला उन्नीसवाँ अध्याय देखें ॥ 241-243 ॥ काशीमें श्रीसनातनके साथ मिलन और उनको शिक्षा प्रदान :- काशीते प्रभुके आसि' मिलिला सनातन। दुइ मास रहि' ताँरे कराइला शिक्षण ॥ 244 ॥ श्रीसनातनको मथुरामण्डलमें भेजना और प्रकाशानन्दका उद्धार :- मथुरा पाठाइला ताँरे दिया भक्तिबल। संन्यासीरे कृपा करि' गेला नीलाचल ॥ 245 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी काशीमें आकर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने दो महीने वहाँ रहकर उन्हें शिक्षा दी। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीमें भक्तिका बल सञ्चारित करके उन्हें मथुरा भेजा और काशीमें प्रकाशानन्दादि मायावादी संन्यासियोंपर कृपा करके उनका उद्धार किया और तब वे नीलाचल लौट आये ॥ 244-245 ॥ अनुभाष्य—'श्रीसनातन-मिलन और शिक्षा'-मध्यलीला बीसवाँ अध्याय देखें ॥ 244 ॥ छह वर्ष इधर-उधर गमनागमन रूप 'मध्यलीला' :- छय वत्सर प्रभु ऐछे करिला विलास। कभु इति-उति-गति, कभु क्षेत्रवास ॥ 246 ॥ पुरीमें भक्तोंके साथ नित्य कीर्तन और श्रीजगन्नाथ दर्शन :- आनन्दे भक्तसङ्गे सदा कीर्त्तन-विलास। जगन्नाथ-दरशन, प्रेमेर विलास ॥ 247 ॥ अनुवाद—कभी पुरीमें रहकर और कभी अन्य स्थानोंमें भ्रमण करके छह वर्ष महाप्रभुने ऐसी लीलाएँ कीं। पुरीमें महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ सदा आनन्दमें विभोर होकर सङ्कीर्तन करते और श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करके प्रेममें भावाविष्ट हो जाते ॥ 246-247 ॥ अन्त्यलीलाके सूत्रोंका आरम्भ :- मध्यलीलार कैलुँ एइ सूत्र-विवरण। अन्त्यलीलार सूत्र एबे शुन, भक्तगण ॥ 248 ॥ अनुवाद—मैंने (ग्रन्थकार कृष्णदास कविराज) अभी तक मध्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया। हे भक्तों! अब अन्त्यलीला सूत्ररूपमें सुनो ॥ 248 ॥ छह वर्षोंके बाद बाकी अठारह वर्षों तक केवल पुरीमें वास :- वृन्दावन हैते यदि नीलाचले आइला। आठार वर्ष ताँहा वास, काँहा नाहि गेला ॥ 249 ॥ चातुर्मास्यमें गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके साथ पुरीमें वास :- प्रतिवर्ष आइसेन ताँहा गौड़ेर भक्तगण। चारि मास रहे प्रभुर सङ्गे सम्मिलन ॥ 250 ॥ नित्यकाल कृष्ण कीर्तन और प्रेमभक्तिका दान :- निरन्तर नृत्य-गीत-कीर्त्तन-विलास। आ-चण्डाले प्रेमभक्ति करिला प्रकाश ॥ 251 ॥ अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावनसे लौटकर नीलाचल आये और बाकी अठारह वर्षों तक केवल वहीं वास किया और वहाँसे किसी और स्थानपर नहीं गये। गौड़देशसे भक्त प्रतिवर्ष नीलाचल आते और चार मास तक महाप्रभुके सङ्गमें रहते। पुरीमें महाप्रभु निरन्तर नृत्य-गीत और सङ्कीर्तन विलासमें डूबे रहते। उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपासे चाण्डाल जैसे नीच लोगोंको भी श्रीकृष्ण-प्रेमाभक्तिका दान किया ॥ 249-251 ॥ श्रीगदाधर पण्डितका क्षेत्र-संन्यास और पुरीप्रवासी भक्तगण :- पण्डित-गोसाञि कैल नीलाचले वास। वक्रेश्वर, दामोदर, शङ्कर, हरिदास ॥ 252 ॥ जगदानन्द, भवानन्द, गोविन्द, काशीश्वर। परमानन्दपुरी, आर स्वरूप-दामोदर ॥ 253 ॥ । 43