भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 897

[ 1/252-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला क्षेत्रवासी रामानन्द राय प्रभृति। प्रभुसङ्गे एइ सब नित्य कैल स्थिति ॥ 254 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित क्षेत्र संन्यास लेकर नीलाचलमें ही वास करने लगे। श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीदामोदर, श्रीशङ्कर, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीजगदानन्द, श्रीभवानन्द, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीपरमानन्दपुरी, और श्रीस्वरूप दामोदर तथा नीलाचलवासी श्रीराय रामानन्द आदिने महाप्रभुके साथ पुरीमें ही नित्यवास किया और पुरीसे बाहर कभी भी नहीं गये ॥ 252-254 ॥ प्रतिवर्ष गौड़ीय भक्तोंका महाप्रभुके साथ चातुर्मास्य-यापन :- अद्वैत, नित्यानन्द, मुकुन्द, श्रीवास। विद्यानिधि, वासुदेव, मुरारि,-यत दास ॥ 255 ॥ प्रतिवर्षे आइसे, सङ्गे रहे चारिमास। ताँ-सबा लञा प्रभुर विविध विलास ॥ 256 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द, श्रीवास पण्डित, श्रीविद्यानिधि, श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि गुप्त आदि महाप्रभुके परिकर प्रतिवर्ष पुरीमें आकर चार मास तक रहते और महाप्रभु उनके साथ अनेक प्रकारसे लीला विलासका आनन्द लेते ॥ 255-256 ॥ ठाकुर हरिदासका पुरीमें निर्वाण :- हरिदासरे सिद्धिप्राप्ति,-अद्भुत से सब। आपनि महाप्रभु याँर कैल महोत्सव ॥ 257 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरका देह निर्वाण पुरीमें हुआ। यह एक अद्भुत घटना थी, क्योंकि महाप्रभुने स्वयं उनका विरह महोत्सव मनाया था ॥ 257 ॥ अनुभाष्य—'ठाकुर हरिदास निर्वाण'—अन्त्यलीला ग्यारहवाँ अध्याय देखें ॥ 257 ॥ श्रीरूपका पुरीमें आगमन :- तबे रूप-गोसाञिर पुनरागमन। ताँहार हृदये कैल प्रभु शक्ति-सञ्चारण ॥ 258 ॥ अनुवाद—तब श्रीरूप गोस्वामी पुनः पुरी आये और महाप्रभुने उनके हृदयमें अपनी दिव्य शक्ति सञ्चारित की ॥ 258 ॥ अनुभाष्य—चिच्छक्ति अथवा अप्राकृत-बलसञ्चार; चिच्छक्तिसे रहित होनेपर या मायाशक्ति-सञ्चारसे भोगलालसाकी वृद्धि होती है। अन्त्यलीला प्रथम अध्याय देखें ॥ 258 ॥ छोटा हरिदासको दण्ड और दामोदर पण्डितका वाक्य दण्ड :- तबे छोट हरिदासे प्रभु कैल दण्ड। दामोदर-पण्डित कैल प्रभुके वाक्यदण्ड ॥ 259 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने छोटा हरिदासको दण्ड-स्वरूप उसका बहिष्कार कर दिया और दामोदर पण्डितने महाप्रभुको कुछ चेतावनीके वाक्य कहे ॥ 259 ॥ अनुभाष्य—'छोटा हरिदास'—अन्त्यलीला, दूसरा अध्याय देखें। दामोदरका 'वाक्यदण्ड'—अन्त्यलीला, तीसरा अध्याय देखें। महाप्रभुको अज्ञानी लोग न समझकर यदि उनपर कटाक्ष करेंगे, तो इस प्रकारका प्रदर्शन ही महाप्रभुके प्रति वाक्य-दण्ड है। दामोदर-पण्डितका महाप्रभुके लिये इस प्रकार वाक्यका प्रयोग भक्तोंके विचारानुसार दण्डात्मक वाक्यमात्र है। यह निग्रह-अनुग्रह-समर्थ व्यक्तियोंको दूसरोंके द्वारा सावधान किया जाना अनाधिकार-चर्चा मात्र है ॥ 259 ॥ श्रीसनातनका पुरीमें आगमन :- तबे सनातन-गोसाञिर पुनरागमन। ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे कैल परीक्षण ॥ 260 ॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामी पुनः पुरी आये और महाप्रभुने ज्येष्ठ मासमें उनकी परीक्षा ली ॥ 260 ॥ अनुभाष्य—'श्रीसनातन गोस्वामी'—अन्त्यलीला चौथा अध्याय देखें ॥ 260 ॥ 44 ।