भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय 2/29-35 ] करनेपर भी जिनका हृदय नहीं पिघलता, आँखें आँसुओंसे भर नहीं जातीं, रोम-रोम आनन्दसे पुलकित नहीं हो जाते, हाय ! उनका हृदय लोहेके समान अति कठोर है। (ये श्रीनामके प्रति अपराधके भी लक्षण हैं)॥"29-34॥ करि' एत विलापन, प्रभु श्रीशचीनन्दन, उघाड़िया हृदयेर शोक। दैन्य-निर्वेद-विषादे, हृदयेर अवसादे, पुनरपि पड़े एक श्लोक॥ 35॥ अनुवाद—इस प्रकार विलाप करते हुए महाप्रभुने अपने हृदयके शोकको उजागर कर दिया। हृदयमें उदासीके कारण दैन्य, निर्वेद और विषादग्रस्त होकर उन्होंने एक श्लोक और पढ़ा॥ 35॥ अनुभाष्य—'दैन्य'—(भःरःसिः दःविः 4र्थ लः)— “दुःखत्रासापराधाद्यैरनोजिंत्यन्तु 'दीनता'। चाटुकन्मान्द्यमालिन्यचिन्ताङ्गजड़िमादिकृत्॥” अर्थात् “दुःख, त्रास और अपराधादिके द्वारा अपनेको अति निकृष्ट माननेको 'दीनता' कहते हैं। दैन्य होनेपर दैन्यमयी याचना, हृदयकी अपटुता (मन्दता), अस्वच्छन्दता (मालिन्य), नाना प्रकारकी भावनायें (चिन्तायें) और अङ्गोंमें जड़ता (निष्क्रियता) होती है। 'निर्वेद'—(भःरःसिः दःविः 4र्थ लः)— “महात्तिविप्रयोगादिद्वेकादिकल्पितम्। स्वावामाननमवेवात्र 'निर्वेद' इति कथ्यते। अत्र चिन्ताश्रुवैवर्ण्य-दैन्यनिश्वसितादयः॥” अर्थात् “अत्यन्त दुःख, विरह, ईर्ष्या, अकर्त्तव्य करनेके लिये अथवा कर्त्तव्यका पालन न करनेके लिये शोकयुक्त अपने अपमानको 'निर्वेद' कहते हैं। इस निर्वेदमें चिन्ता, अश्रु, वैवर्ण्य, दैन्य और निःश्वासादि अनुभाव प्रकाशित होते हैं। 'विषाद'—(भःरःसिः दःविः 4र्थ लः)— “इष्टानवाप्तिप्रारब्धकार्यासिद्धिर्विपत्तितः। अपराधादितोऽपि स्यादनुतापो विषण्णता॥ अत्रोपायसहायानुसन्धिश्चिन्ता च रोदनम्। विलापश्वासवैवर्ण्यमुखशोषादयोऽपि च॥” अर्थात् “इष्ट-वस्तुके प्राप्त न होनेसे, सङ्कल्पित प्रारब्ध कार्यमें असिद्धि, विपत्ति एवं अपराधादि होनेसे जो अनुताप होता है, उसे 'विषाद' कहते हैं। इस विषादमें उपाय एवं सहायकको ढूँढ़ना, चिन्ता, रोदन, विलाप, श्वास, वैवर्ण्य और मुखका सूखना आदि लक्षण होते हैं। दैन्य, निर्वेद एवं विषादादि तैंतीस व्यभिचारी भाव स्थायीभावके ऊपर विशेष प्रधानता लाभ करके विचरण करते हैं। वाक्य, क्रन्दनादि अङ्ग और सत्त्वसे उत्पन्न अनुभावोंके द्वारा सूचित होनेपर इन्हें व्यभिचारी भाव कहा जाता है। ये भावोंकी गतिको सञ्चार करते हैं, इसलिये व्यभिचारी-भावको 'सञ्चारी-भाव' भी कहते हैं॥ 35॥ अमृताणुकणिका— “'उघाड़िया हृदयेर शोक'—जिन भावोंको अपनी माँको नहीं कहा जा सकता, पिताको नहीं कहा जा सकता, अन्य किसीको नहीं कहा जा सकता, किन्तु उन्हें अपने अन्तरङ्ग सखा या सखीको कहा जा सकता है। राधाजी अपने भावोंको निःसङ्कोच बिना छिपाये ही ललिता-विशाखाको बताती हैं, क्योंकि ललिता-विशाखा उनकी अपनी अन्तरङ्ग सखियाँ हैं। राधाजी ललिता, विशाखाको अपने भावोंको उघाड़कर कह रही हैं,—'कृष्ण हमें छोड़कर मथुरा चले गये हैं। उन्होंने कहा था कि मैं अति शीघ्र लौट आऊँगा, परन्तु वे अभी तक नहीं आये। यदि वे प्रेम करना छोड़ देते हैं, तो हम क्यों नहीं उनसे प्रेम करना छोड़ देती?' श्रीकृष्ण विरहमें राधाजीके जो भाव हृदयमें उठ रहे हैं, वही कह रही हैं,—'ऐसा धूर्त हमने जगत्में नहीं देखा, यदि ऐसा जानती, तो उनसे प्रेम नहीं करती। ऐसा सखा भी हमने नहीं देखा, ये (कृष्ण) तो भ्रमरके समान हैं, जैसे भ्रमर फूलोंका रस लेकर वहाँसे चल देते हैं, वैसे ही ये भी हैं। हमें त्यागकर अब ये मथुराकी रमणियोंके साथ विहार कर रहे हैं। इन्हें हम । 59