श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 2/35-39 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोगोंके सुख-दुःखसे क्या प्रयोजन?' महाप्रभुमें तदात्मभावका आवेश है अर्थात् राधाजीके भाव उनके हृदयमें है। उस समय राधाजीके भावोंके आवेशमें वे श्रीस्वरूप दामोदरको ललिताके रूपमें और श्रीरायरामानन्दको विशाखाके रूपमें देखते हैं। जो उस भावावेशमें तमाल वृक्षको कृष्ण देख सकते हैं, किसी पहाड़को गोवर्धन देख सकते हैं, नदीमात्र या समुद्रको यमुना देख सकते हैं, उनके लिये स्वरूप दामोदरको ललिताके रूपमें और श्रीराय रामानन्दको विशाखाके रूपमें देखना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दको वैसे ही अपने हृदयके भावोंको उघाड़कर कह रहे हैं।" - श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 35 ॥ श्रीजगन्नाथवल्लभ-नाटक (3/11) :- यदा यातो दैवान्मधुरिपुरसौ लोचनपथं तदास्माकं चेतो मदनहतकेनाह्तमभूत्। पुनर्यस्मिन्नेष क्षणमपि दृशोरेति पदवीं विधास्यामस्तस्मिन्नखिलघटिका रत्नखचिताः ॥ 36 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे भाग्यसे श्रीकृष्ण-रूपका मेरे नयनोंके द्वारा दर्शन होनेपर मेरा चित्त दर्शन-सौभाग्यके अभिमानके द्वारा घायल होनेपर 'आनन्द' नामक किसी तत्त्वके द्वारा अपहरण कर लिया गया, इसलिये मैं मन भरकर उस रूप-सौन्दर्यको नहीं देख पायी। और यदि जब पुनः वह कृष्णस्वरूप देख पाऊँगी, तब उस समयको (उस क्षणको, उस पलको) बहुत रत्नोंसे अलङ्कृत करूँगी ॥ 36 ॥ अनुभाष्य- यदा (यस्मिन् काले स्वप्ने वा) असौ मधुरिपुः (मधुसूदनः) दैवात् (मम भाग्येन) लोचनपथं (दृग्गोचरं) यातः (प्राप्तः) तदा मदनहतकेन (मदयति हर्षयति इति मदनः एवः हतकः शत्रुर्यस्य तेन वैरिणा मदनेन) अस्माकं चेतः (मनः) आहृतं (चोरितम्) अभूत्। पुनः यस्मिन् (क्षणे) एषः (कृष्णः) दृशोः (नेत्रयोः) पदवीं (मार्गं) एति (याति प्राप्नोतीत्यर्थः) [तस्मिन् काले] अखिलघटिकाः (मुहूर्त्तघटीपलविपलादिकाः) रत्नखचिताः विधास्यामः (माल्य-चन्दनमणिमुक्तादिना समलङ्कर्मः)। श्लोक-भावानुवाद-जिस समय या स्वप्नमें वे मधुसूदन मेरे भाग्यसे मेरे दृष्टिगोचर हुए, तभी आनन्द नामक शत्रु (मदन) ने मेरे चित्तको चुरा लिया। पुनः जिस क्षण श्रीकृष्ण मेरे नयनपथपर प्राप्त होंगे, उस कालको (उस मुहूर्त-घड़ी-पल-विपलको) माला-चन्दन- मणि-मुक्तादिसे अलङ्कृत करूँगी ॥ 36 ॥ श्लोकार्थ :- विरहके कारण श्रीकृष्णके दर्शन या मिलनके एक क्षणको भी बहुत आदर :- "ये काले वा स्वप्ने, देखिनु वंशीवदने, सेइकाले आइला दुइ वैरि। 'आनन्द' आर 'मदन', हरि' निल मोर मन, देखिते ना पाइलुँ नेत्र भरि' ॥ 37 ॥ पुनः यदि कोन क्षण, कराय कृष्ण दरशन, तबे सेइ घटी-क्षण-पल। दिया माल्यचन्दन, नाना रत्न-आभरण, अलङ्कृत करिमु सकल ॥" 38 ॥ अनुवाद-दैववशतः जिस समय मैंने साक्षात् अथवा स्वप्नमें वंशीवादन करते हुए श्रीकृष्णको देखा, उसी समय 'आनन्द' और 'मदन', ये दो वैरी आ गये और इन दोनोंने मेरा मन हर लिया, इसलिये मैं मन भरकर उनका दर्शन भी नहीं कर पायी। यदि सौभाग्यवश कोई 'क्षण' मुझे पुनः श्रीकृष्णके दर्शन कराये, तो उस घड़ी-क्षण-पलको मैं माला, चन्दन और नाना प्रकारके रत्नों एवं आभूषणोंसे अलङ्कृत करूँगी ॥ 37-38 ॥ महाप्रभुका 'चित्रजल्प' महाभाव; बाह्यदशामें महाप्रभुका स्वरूप-रामानन्दके निकट विलाप :- क्षणे बाह्य हैल मन, आगे देखे दुइ जन, ताँरे पुछे, - "आमि ना चैतन्य? स्वप्नप्राय कि देखिनु, किवा आमि प्रलापिनु, तोमरा किछु शूनियाछ दैन्य ? ॥ 39 ॥ 60 ।