श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 913, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/39-43 ] कृष्णविरहमें अपने आपको दीन मानना :— शुन, मोर प्राणेर बान्धव। नाहि कृष्ण-प्रेमधन, दरिद्र मोर जीवन, देहेन्द्रिय वृथा मोर सब॥" 40 ॥ ध्रु॥ अनुवाद—तभी महाप्रभुको कुछ कालके लिये बाह्य ज्ञान हुआ, तो उन्होंने सामने दो लोगोंको देखा। तब उनसे पूछने लगे,—“क्या मैं (कृष्ण) चैतन्य नहीं हूँ? मैं क्या स्वप्न देख रहा था? मैंने क्या प्रलाप किया? तुमने क्या मेरा कुछ दैन्य-प्रलाप सुना? हे मेरे बन्धुओं! तुम मुझे प्राणोंसे भी प्रिय हो, इसलिये मेरी बात सुनो। मेरे पास कृष्णप्रेमरूपी धन नहीं है, अतः मैं अति दरिद्र हूँ, मेरा देह और इन्द्रियोंको धारण करना व्यर्थ है॥” 39-40॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे देखे दुइ जन'—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दको देखा। उन्हें देखकर थोड़ी देरके लिये महाप्रभुको बाह्य ज्ञान हुआ और वे राधाभिमान छोड़कर पूछने लगे कि क्या मैं वही चैतन्य नहीं हूँ?॥ 39॥ पुनः कहे,—“हाय हाय, शुन, स्वरूप-रामराय, एइ मोर हृदय-निश्चय। शुनि' करह विचार, हय, नय—कह सार”, एत बलि' श्लोक उच्चारय ॥ 41 ॥ अनुवाद—महाप्रभु पुनः कहने लगे,—“हाय! हाय! सुनो स्वरूप और रामराय, मेरे हृदयकी अन्तरङ्ग बात सुनो और उसपर विचार करके अपना निर्णय दो कि ऐसा है अथवा नहीं।” यह कहकर उन्होंने एक श्लोकका उच्चारण किया॥ 41 ॥ श्रीमद्भागवत (10/31/1) टीकामें तोषणी-उद्धृत श्लोक :— कइअवरहिअं पेम्मं ण हि होइ मानुसे लोए। जइ होइ कस्स विरहो विरहे होन्ताम्मि को जीअइ ॥ 42 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 42 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्लोक सामान्य लोक प्रचलित संस्कृत भाषा 'प्राकृत' में है। संस्कृतमें यह श्लोक इस प्रकार है— “कैतव-रहितं प्रेम न हि भवति मानुषे लोके। यदि भवति कस्य विरहो विरहे सत्यपि को जीवति॥” अर्थात् “प्रेम कैतवरहित (छलरहित) है और यह मनुष्यलोकमें कभी भी उदित नहीं होता। यदि उदित हो, तब विरह नहीं होता। यदि विरह हो, तब जीवन नहीं रहता॥” 42 ॥ अनुभाष्य— कइअवरहिअं (कैतवरहितं धर्मार्थकाममोक्षादि-छलधर्मशून्यं) पेम्मं (प्रेम) मानुसे लोत्र (मानुषे लोके) ण हि होइ (भवति)। जइ (यदि) कस्स (कस्य) विरहः (प्रेम्णः विच्छेदः भवति), (तदा) विरहे (विच्छेदे) होन्तरिम्म (भवत्यपि) को जीअई (जीवति?—न कोऽपीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि छल-धर्मसे शून्य (श्रीकृष्ण) प्रेम इस मनुष्यलोकमें नहीं होता। यदि ऐसा प्रेम कहीं है, तो वहाँ विरह नहीं हो सकता। यदि ऐसे प्रेममें विरह है, तो फिर कौन जीवित रह सकता है? अर्थात् कोई जीवित नहीं रह सकता—यह अर्थ है॥ 42 ॥ श्लोकका अर्थ :— “अकैतव कृष्णप्रेम, येन जाम्बुनद-हेम, सेइ प्रेमा नृलोके ना हय। यदि हय तार योग, ना हय तबै वियोग, विरह हैले केह ना जीयय॥” 43 ॥ अनुवाद—“जाम्बु-नदीके शुद्ध सोनेके जैसा शुद्ध छलरहित श्रीकृष्णप्रेम इस मनुष्य लोकमें नहीं होता है। यदि वह प्रेम कहीं होता है, तो वहाँ वियोग नहीं हो सकता। यदि वियोग हो, तो कोई जीवित नहीं रह सकता॥” 43 ॥ । 61