श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 914, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/44-47 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एत कहिं शचीसुत, श्लोक पड़े अद्भुत, शुने दुँहे एक मन हञा। “आपन-हृदय-काज, कहिते वासिये लाज, तबु कहि लाजबीज खाञा ॥” 44 ॥ अनुवाद—यह कहकर शचीनन्दन गौरहरिने एक और अद्भुत श्लोक पढ़ा जिसे श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दने एकाग्रचित्तसे सुना। महाप्रभु कहने लगे,—“अपने हृदयकी गोपनीय बात कहनेमें लज्जा आती है, किन्तु उस लज्जाके बीजको खाकर अर्थात् औपचारिकता त्यागकर मैं कहता हूँ॥” 44 ॥ अनुभाष्य—'लाजबीज खाञा'—लज्जाके शीशको खाकर ॥ 44 ॥ श्रीमहाप्रभुके द्वारा उक्त श्लोक :- न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ क्रन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम्। वंशीविलास्यान्नलोकनं बिना बिभर्मि यत् प्राणपतङ्गकान् वृथा ॥ 45 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! कृष्णके लिये मेरे हृदयमें प्रेमकी लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। तब मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने परम-सौभाग्यका प्रकाश करनेके लिये ही करती हूँ। वंशीवदन कृष्णके दर्शनके बिना मैं जो प्राणपतङ्ग धारण करती हूँ, वह व्यर्थ ही है ॥ 45 ॥ अनुभाष्य— मे (मम) हरौ (भगवति कृष्णे) दरापि (ईषदपि) प्रेमगन्धः (प्रेमाभास) न अस्ति, [तथापि] सौभाग्यभरं (मम प्रेमास्ति इति सौभाग्यातिशयं) प्रकाशितुं क्रन्दामि (आनन्द-नीरं क्षिपामि)। वंशीविलास्यान्नलोकनं (मुरलीनिनाद-पर-कृष्णमुख-शोभानिरीक्षणं) बिना यत् प्राणपतङ्गकान् (यानि क्षुद्रपतङ्गतुल्यप्राणान्) बिभर्मि (धारयामि), [तानि] वृथा एव। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ श्लोकार्थ :- “दूरे शुद्धप्रेमबन्ध, कपट प्रेमेर गन्ध, सेइ मोर कृष्णे नाहि पाय। तबे ये करि क्रन्दन, स्वसौभाग्य प्रख्यापन, करि, इहा जानिह निश्चय ॥ 46 ॥ याते वंशीध्वनि-सुख, ना देखि से चाँदमुख, यद्यपि नाहिक 'आलम्बन'। निज-देहे करि प्रीति, केवल कामेर रीति, प्राण-कीटेर करिये धारण ॥ 47 ॥ अनुवाद—शुद्ध कृष्णप्रेमकी गन्ध तो मुझसे बहुत दूर है, मेरा प्रेमका प्रदर्शन तो कपटता मात्र है। मेरी कपटताके कारण मैं कृष्णको प्राप्त नहीं कर पाती। तब ऐसा तुम निश्चित जानना कि मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने सौभाग्यको प्रदर्शित करनेके लिये ही है। मैं वंशीवादन करते हुए कृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन नहीं कर रही हूँ और न ही उनकी वंशीध्वनि सुननेका आनन्द प्राप्त कर रही हूँ। यद्यपि उनसे मिलनकी कोई सम्भावना भी नहीं है, तो भी मैं अपनी देहसे प्रीति करते हुए उसका पालन कर रही हूँ अर्थात् केवल स्वसुखकी कामना करती हूँ। यह प्रेमकी नहीं, कामकी रीति है; व्यर्थ ही मैं कीटके समान प्राणको धारण कर रही हूँ ॥ 46-47 ॥ अनुभाष्य—सेव्य (श्रीकृष्ण)को ‘विषय’ और सेवक (भक्त)को ‘आश्रय’ कहते हैं, विषय और आश्रयके एक साथ मिलनको ‘आलम्बन’ कहते हैं। यहाँ आश्रयके श्रवण और विषयकी वंशीध्वनिका प्रसङ्ग है; परन्तु विषयके चन्द्रमुखके दर्शनमें आग्रहका अभाव आश्रयका आलम्बन रहित होनेका ज्ञापक है। स्वयंके देहसुखके लिये कामपूर्तिके कारण प्राण धारण करना वृथा ही है। भःरःसिः— “हन्त देहतकैकैः किममीभिः पालितैर्विफलपुण्यफलैर्नः।” अर्थात् “हाय! मेरी पुण्यरहित हत-देहका पालन करनेसे क्या होगा? ॥” 47 ॥ 62 ।