भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 915, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 915

दूसरा अध्याय [2/48-52] [बायाँ स्तम्भ] कृष्णप्रेमका लक्षण :— कृष्णप्रेमा सुनिर्मल, येन शुद्धगङ्गाजल, सेइ प्रेमा—अमृतेर सिन्धु। निर्मल से—अनुरागे, ना लुकाय अन्य दागे, शुक्लवस्त्रे यैछे मसीबिन्दु ॥ 48 ॥ शुद्धप्रेम—सुखसिन्धु, पाइ तार एक बिन्दु, सेइ बिन्दु जगत् डुबाय। कहिबार योग्य नय, तथापि बाउले कय, कहिले वा केबा पातियाय ॥” 49 ॥ **अनुवाद—**कृष्णप्रेम शुद्धगङ्गाजलके समान निर्मल और प्रेमामृतका समुद्र है। यह निर्मल अनुराग किसी दागको नहीं छुपाता, जैसे श्वेत वस्त्रके ऊपर स्याहीका एक बिन्दु भी स्पष्ट दिखायी देता है। शुद्ध कृष्णप्रेम आनन्दका समुद्र है। यदि किसीको उस समुद्रका एक बिन्दु मिल जाता है, तो वह समस्त जगत्‌को उस बिन्दुमें डुबो सकता है। यद्यपि प्रेमको वाणीके द्वारा प्रकाश करना उचित नहीं है, तथापि एक पागल इसे कहेगा। क्योंकि उसके कहनेपर भी कोई उसका विश्वास नहीं करेगा ॥ 48-49 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'पातियाय'— विश्वास करे ॥ 49 ॥ **अनुभाष्य—**निर्मल कृष्णप्रेमका अनुराग श्वेत वस्त्रके समान कहा गया है और अनुरागका अभाव काले दागके समान है। जिस स्थानपर अनुरागका अभाव है, वह अनुराग नामक श्वेत-भूमिकाके ऊपर काले दागके जैसे स्पष्ट दिखायी देता है ॥ 48 ॥ कृष्ण प्रेमके परस्पर विरुद्ध लक्षण :— एइ मत दिने दिने, स्वरूप–रामानन्द–सने, निज–भाव करेन विदित। बाहिरे विषज्वाला हय, भितरे आनन्दमय, कृष्णप्रेमेर अद्भुत चरित ॥ 50 ॥ **अनुवाद—**इस प्रकार दिन-प्रतिदिन महाप्रभु श्रीस्वरूप

[दायाँ स्तम्भ] दामोदर और श्रीराय रामानन्दके आगे अपने दिव्य भावोंको प्रकट करते। बाहरसे ऐसा लगता कि महाप्रभु मानो विषकी ज्वालामें जल रहे हैं, परन्तु भीतरसे वे आनन्दका अनुभव करते। कृष्णप्रेमका ऐसा ही अद्भुत चरित (स्वभाव) है ॥ 50 ॥ एइ प्रेमा—आस्वादन, तप्त–इक्षु–चर्वण, मुख ज्वले, ना याय त्यजन। सेइ प्रेमा याँर मने, तार विक्रम सेइ जाने, विषामृते एकत्र मिलन ॥ 51 ॥ **अनुवाद—**कृष्णप्रेमका आस्वादन गर्म गन्नेके रसके समान है। जो गर्म गन्नेके रसका पान करता है, उसका मुख जलता है, परन्तु वह उसकी मिठासके कारण उसे छोड़ भी नहीं पाता। जिसके हृदयमें कृष्णप्रेम है, वही इसकी महिमाको समझ सकता है। यह तो विष और अमृतका मिश्रण है ॥ 51 ॥ विदग्धमाधव (2/18) :— पीडाभिर्नवकालकूट–कटुतागर्वस्य निर्वासनो निस्यन्देन मुदां सुधा–मधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः। प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो जागर्त्ति यस्यानन्तरे ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः॥ 52 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— हे सुन्दरि ! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण-सम्बन्धी प्रेम जिसके हृदयमें जाग्रत होता है, उस प्रेमके वक्र (कुटिल अर्थात् कटु) एवं मधुरभावकी समस्त महिमा उस हृदयमें स्पष्ट रूपसे प्रकाशित होती है। वह प्रेम दो रूपसे कार्य करता है,—(1) अपने द्वारा प्रदानकी गयी पीड़ाके द्वारा वह नव-सर्पविषकी कटुताके गर्वको दूर करता है अर्थात् जिससे अधिक कोई नहीं हो सकता, ऐसा दुःख उदय कराता है; और (2) आनन्दके द्वारा अमृतके माधुर्यका जो अहङ्कार है, । 63