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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

दूसरा अध्याय [2/48-52] [बायाँ स्तम्भ] कृष्णप्रेमका लक्षण :— कृष्णप्रेमा सुनिर्मल, येन शुद्धगङ्गाजल, सेइ प्रेमा—अमृतेर सिन्धु। निर्मल से—अनुरागे, ना लुकाय अन्य दागे, शुक्लवस्त्रे यैछे मसीबिन्दु ॥ 48 ॥ शुद्धप्रेम—सुखसिन्धु, पाइ तार एक बिन्दु, सेइ बिन्दु जगत् डुबाय। कहिबार योग्य नय, तथापि बाउले कय, कहिले वा केबा पातियाय ॥” 49 ॥ **अनुवाद—**कृष्णप्रेम शुद्धगङ्गाजलके समान निर्मल और प्रेमामृतका समुद्र है। यह निर्मल अनुराग किसी दागको नहीं छुपाता, जैसे श्वेत वस्त्रके ऊपर स्याहीका एक बिन्दु भी स्पष्ट दिखायी देता है। शुद्ध कृष्णप्रेम आनन्दका समुद्र है। यदि किसीको उस समुद्रका एक बिन्दु मिल जाता है, तो वह समस्त जगत्‌को उस बिन्दुमें डुबो सकता है। यद्यपि प्रेमको वाणीके द्वारा प्रकाश करना उचित नहीं है, तथापि एक पागल इसे कहेगा। क्योंकि उसके कहनेपर भी कोई उसका विश्वास नहीं करेगा ॥ 48-49 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'पातियाय'— विश्वास करे ॥ 49 ॥ **अनुभाष्य—**निर्मल कृष्णप्रेमका अनुराग श्वेत वस्त्रके समान कहा गया है और अनुरागका अभाव काले दागके समान है। जिस स्थानपर अनुरागका अभाव है, वह अनुराग नामक श्वेत-भूमिकाके ऊपर काले दागके जैसे स्पष्ट दिखायी देता है ॥ 48 ॥ कृष्ण प्रेमके परस्पर विरुद्ध लक्षण :— एइ मत दिने दिने, स्वरूप–रामानन्द–सने, निज–भाव करेन विदित। बाहिरे विषज्वाला हय, भितरे आनन्दमय, कृष्णप्रेमेर अद्भुत चरित ॥ 50 ॥ **अनुवाद—**इस प्रकार दिन-प्रतिदिन महाप्रभु श्रीस्वरूप

[दायाँ स्तम्भ] दामोदर और श्रीराय रामानन्दके आगे अपने दिव्य भावोंको प्रकट करते। बाहरसे ऐसा लगता कि महाप्रभु मानो विषकी ज्वालामें जल रहे हैं, परन्तु भीतरसे वे आनन्दका अनुभव करते। कृष्णप्रेमका ऐसा ही अद्भुत चरित (स्वभाव) है ॥ 50 ॥ एइ प्रेमा—आस्वादन, तप्त–इक्षु–चर्वण, मुख ज्वले, ना याय त्यजन। सेइ प्रेमा याँर मने, तार विक्रम सेइ जाने, विषामृते एकत्र मिलन ॥ 51 ॥ **अनुवाद—**कृष्णप्रेमका आस्वादन गर्म गन्नेके रसके समान है। जो गर्म गन्नेके रसका पान करता है, उसका मुख जलता है, परन्तु वह उसकी मिठासके कारण उसे छोड़ भी नहीं पाता। जिसके हृदयमें कृष्णप्रेम है, वही इसकी महिमाको समझ सकता है। यह तो विष और अमृतका मिश्रण है ॥ 51 ॥ विदग्धमाधव (2/18) :— पीडाभिर्नवकालकूट–कटुतागर्वस्य निर्वासनो निस्यन्देन मुदां सुधा–मधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः। प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो जागर्त्ति यस्यानन्तरे ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः॥ 52 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— हे सुन्दरि ! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण-सम्बन्धी प्रेम जिसके हृदयमें जाग्रत होता है, उस प्रेमके वक्र (कुटिल अर्थात् कटु) एवं मधुरभावकी समस्त महिमा उस हृदयमें स्पष्ट रूपसे प्रकाशित होती है। वह प्रेम दो रूपसे कार्य करता है,—(1) अपने द्वारा प्रदानकी गयी पीड़ाके द्वारा वह नव-सर्पविषकी कटुताके गर्वको दूर करता है अर्थात् जिससे अधिक कोई नहीं हो सकता, ऐसा दुःख उदय कराता है; और (2) आनन्दके द्वारा अमृतके माधुर्यका जो अहङ्कार है, । 63

[ 2/52-57 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उसको भी सङ्कुचित करके परम सुख प्रदान करता है ॥ 52 ॥ अनुभाष्य-पौर्णमासी नान्दीमुखीसे कह रही हैं- हे सुन्दरि, पीडाभिः (यातनाभिः) नवकालकूट-कटुतागर्वस्य (नवकालकूटस्य सुतीव्रविषस्य यः कटुतागर्वः अन्यावज्ञा- रूपोग्रतामयभावः तस्य) निर्वासनः (दूरीकरणशीलः), मुदां निस्यन्देन (क्षरणेन) सुधामधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः (सुधायाः अमृतस्य यः मधुरिमा माधुर्यं तेन यः अहङ्कारः गर्वः तं सङ्कोचयति खर्वीकरोति यः) नन्दनन्दनपरः (कृष्णोद्देशकः) प्रेमा यस्य अन्तरे (हृदये) जागर्त्ति, अस्य (प्रेम्णः) वक्रमधुराः (कुटिलमाधुर्यसमन्विताः) विक्रान्तयः (प्रभावाः) तेन (जनेन) एव स्फुटं (स्पष्टं) ज्ञायन्ते (अनुभूयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ कृष्णदर्शनसे महाप्रभुकी महाभाव-चेष्टा :- ये काले देखि जगन्नाथ, श्रीराम-सुभद्रा-साथ, तबे जानि-आइलाम कुरुक्षेत्र। सफल हैल जीवन, देखिलुँ पद्मलोचन, जुड़ाइल तनु-मन-नेत्र ॥ 53 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब श्रीजगन्नाथका बलराम और सुभद्राके साथ दर्शन करते, तो उन्हें ऐसा लगता कि वे कुरुक्षेत्रमें आकर श्रीकृष्णका दर्शन कर रहे हैं। वे सोचते कि उनका जीवन सफल हो गया है, क्योंकि कमलनयन श्रीकृष्णके दर्शन करके उनके तन-मन और नेत्र शीतल हो जाते हैं ॥ 53 ॥ गरुड़ेर सन्निधाने, रहिं करे दरशने, से आनन्देर कि कहिब ब'ले। गरुड़-स्तम्भेरे तले, आछे एक निम्न खाले, से खाल भरिल अश्रुजले ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभु गरुड़-स्तम्भके निकट खड़े होकर श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते थे और उनको जो आनन्द होता था, उसका वर्णन कैसे करें? गरुड़-स्तम्भके नीचे एक खड्डा था और वह महाप्रभुके आनन्दाश्रुओंसे भर जाता था ॥ 54 ॥ अनुभाष्य-श्रीजगन्नाथ-मन्दिरके सम्मुख जगमोहनके अन्तमें एक स्तम्भ है [इसपर गरुड़जी विराजमान हैं, इसलिये] इसे गरुड़-स्तम्भ कहते हैं। इस स्तम्भके पीछे भागकी भूमिमें एक खड्डा था, वह भगवान् महाप्रभुके प्रेमाश्रुजलसे भर जाता था ॥ 54 ॥ पुनः कृष्णविरहका उद्दीपन :- ताँहा हैते घरे आसिं, माटीर उपरे बसि' नखे करे पृथिवी लिखन। “हा-हा काँहा वृन्दावन, काँहा गोपेन्द्रनन्दन, काँहा सेइ वंशीवदन ॥ 55 ॥ काँहा से त्रिभङ्गठाम, काँहा सेइ वेणुगान, काँहा सेइ यमुना-पुलिन। काँहा से रासविलास, काँहा नृत्यगीत-हास, काँहा प्रभु मदनमोहन ॥” 56 ॥ उठिल नाना भावोद्वेग, मने हैल उद्वेग, क्षणमात्र नारे गोड़ाइते। प्रबल विरहानले, धैर्य हैल टलमले, नाना श्लोक लागिला पड़िते ॥ 57 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे महाप्रभु घर लौटकर आते और भूमिपर बैठकर अपने नाखूनोंसे पृथ्वीपर कुछ लिखते। उस समय विषादकी दशामें क्रन्दन करते और कहते,―“हा! हा! कहाँ है वृन्दावन? नन्दनन्दन कृष्ण कहाँ हैं? कहाँ हैं वे वंशीवदन? कहाँ हैं वे त्रिभङ्ग-ललित कृष्ण? कहाँ है उनका मधुर वंशीगान? कहाँ है वह यमुनाका तट? कहाँ है वह रास-विलास? कहाँ है वह नृत्य-गान और हास-परिहास? कहाँ हैं मेरे प्रभु मदनमोहन?” इस प्रकार महाप्रभुके मनमें अनेक भावोंका वेग आता और उनका मन उद्विग्न हो जाता। इनसे वे एक क्षण भी नहीं निकल पाते। प्रबल विरहाग्निमें उनका धैर्य डगमगाने लगा और वे नाना श्लोक पढ़ने लगे ॥ 55-57 ॥ 64 ।

दूसरा अध्याय 2/58-60 ] श्रीकृष्णकर्णामृत (41) :- अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि हरेस्त्वदालोकनमन्तरेण। अनाथबन्धो करुणैकसिन्धो हा हन्त हा हन्त कथं नयामि ॥ 58 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 58 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे हरि ! हे अनाथबन्धु ! हे करुणाके एकमात्र सिन्धु ! आपके दर्शनके बिना हाय-हाय मैं ये अशुभ दिन-रात कैसे काटूँगा ? ॥ 58 ॥ अनुभाष्य- हे अनाथबन्धो (अनाथानां विरहविधुराणां गोपीनां बन्धुर्यः एवम्बिध) करुणैकसिन्धो (दयैकसमुद्र) [कृष्णादृते माधुर्यप्रेम सम्पत्त्यभावात् कोऽप्यन्यः गोपीः अनुकम्पयितुं न समर्थ इति भावः] हे हरे (गोपीजनकायमनोवाक्यहारिन्), त्वदालोकनं (भवद्दर्शनम्) अन्तरेण (बिना) हा हन्त ! हा हन्त! अधन्यानि (अशुभानि) अमूनि दिनानि * कथं (केन प्रकारेण) [तव सेवां बिना] नयामि (अतिवाहयामि)।

  • दिनान्तराणि- “दिनस्य अहोरात्रस्य अन्तराणि मध्यगतानि क्षणवृन्द्वानि इति" (सारङ्ग-रङ्गदा)। [अर्थात् दिन और रातमें जो सब क्षण हैं, वे, अथवा करोड़ों कल्पोंके समान जिनका अतिक्रमण करना असम्भव है।] श्लोक-भावानुवाद-हे अनाथबन्धु (विरह-विधुर गोपियोंके बन्धु)! हे करुणैकसिन्धु (अर्थात् कृष्ण द्वारा आदृत माधुर्यप्रेम सम्पत्तिकी स्वामिनी गोपीपर अन्य कोई अनुकम्पा करनेमें समर्थ नहीं है)! हे हरे (गोपियोंके काय-मन-वाक्यको हरण करनेवाले)! तुम्हारे दर्शनके बिना हाय-हाय ये अशुभ दिन किस प्रकार तुम्हारी सेवाके बिना कटेंगे? ॥ 58 ॥ अमृतानुकणिका-श्रीराधाके भावोंमें विभावित महाप्रभुके हृदयमें विरहज्वाला और भी प्रज्ज्वलित हो उठी और एक क्षणकाल भी अनेक दिनोंके समान प्रतीत होने लगा, तब अतिशय खेद और विषादके साथ प्रलाप करने लगे, -'हाय हाय! तुम्हारे दर्शनके बिना ये कोटि कल्पोंके समान क्षण कैसे कटेंगे? यह तुम ही बताओ। तुम्हारे अदर्शनके कारण ये दिन सभी विफल हैं।' इसलिये आगे कहने लगे, -'हे अनाथबन्धो !' अपने पति-पुत्रादिको दुःखप्रद जानकर उन्हें त्याग करनेवाली हम अनाथा गोपियोंके तुम ही एकमात्र बन्धु हो।' यदि श्रीकृष्ण कहें कि तुम अपने पति आदिकी सेवा करते हुए अपने नारी धर्मका पालन करते हुए सुखपूर्वक गृहमें अवस्थानको त्यागकर मुझसे मिलनकी प्रार्थना क्यों कर रही हो? तो इसके उत्तरमें राधाजी कह रही हैं,-'हरे!' हे चित्त-इन्द्रियोंको हरण करनेवाले। तुमने हमारे चित्त और इन्द्रियोंका हरण किया है, इसमें तुम्हारा ही दोष है।' यदि श्रीकृष्ण कहें कि कामिनियोंमें तुम ही चपला नारी हो, तो मैं कैसे अपने धर्मका त्याग करूँ (मैं तो ब्रह्मचारी हूँ)? इसलिये दैन्यसहित राधाजी कह रही हैं, -'हे करुणासिन्धो !' तुम तो करुणाके सिन्धु हो, इसलिये धर्मका भी उल्लङ्घनकर मुझ दीनके प्रति अनुग्रह करो अर्थात् कृपाकर दर्शन दो ॥ '58 ॥ कृष्णविरहमें महाप्रभुका विलाप :- “तोमार दर्शन-बिने, अधन्य ए रात्रि-दिने, एइ काल ना याय काटन। तुमि अनाथेर बन्धु, अपार करुणासिन्धु, कृपा करि' देह दरशन ॥" 59 ॥ अनुवाद - "तुम्हारे दर्शन बिना ये अशुभ दिन-रात काटे नहीं कटते। हे कृष्ण! तुम अनाथोंके बन्धु और करुणाके अपार सिन्धु हो। अपने दर्शन देकर इस दीनपर कृपा करो॥"59॥ कृष्णदर्शनके लिये पागल :- उठिल भाव-चापल, मन हइल चञ्चल, भावेर गति बुझन ना याय। अदर्शने पोड़े मन, केमने पाव दरशन, कृष्ण-ठाञि पुछेन उपाय ॥ 60 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें भावोंकी लहरियाँ आने । 65

[ 2/60-61 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ] लगी और उनका मन चञ्चल हो गया। उनके भाव उनको कहाँ ले जायेंगे, यह कोई नहीं समझ सकता। श्रीकृष्णके दर्शन नहीं होनेसे उनका मन जलने लगा। वे श्रीकृष्णसे ही पूछने लगे कि किस उपायसे आपके दर्शन मिलेंगे? ॥ 60 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'चापल'- चापल्य, चपलता ॥ 60 ॥

श्रीकृष्णकर्णामृत (32) बिल्वमङ्गलवाक्य :- त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम् ॥ 61 ॥

अनुवाद- अनुभाष्य देखें ॥ 61 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- हे वंशीविलासी कृष्ण! तुम्हारा शैशव (कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे मुखकमलके दर्शनके लिये अब मैं क्या करूँ? ॥ 61 ॥

अनुभाष्य- हे मुरलीविलासि (गोपीचित्तहारिवंशीवादक,) त्वत् (तव) शैशवं मत् (मम) चापलं च त्रिभुवनाद्भुतं (त्रिलोकमध्ये विचित्रं) - तव वा मम वा (आवयोरव इत्यर्थः) अधिगम्यं (अन्यः कोऽपि न जानाति) विरलं (दुर्लभदर्शनं निर्जने वा) मुग्धं (गोपीमनोहरं) मुखाम्बुजं (वदनकमलं) ईक्षणाभ्यां (नेत्राभ्यां) यथेष्टम् उदीक्षितुम् (अवलोकयितुं) किं करोमि, [तदुपायं कथय]।

श्लोक-भावानुवाद- हे अपनी मधुर वंशीवादनसे गोपियोंके चित्तको हरण करनेवाले! तुम्हारा कैशोर और मेरा चापल्य त्रिभुवनमें अद्भुत हैं। इन्हें मैं और तुम ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं। इसलिये अब वह उपाय बताओ जिससे निर्जनमें तुम्हारे गोपीमनोहर मुखकमलका अपने नेत्रोंसे यथेष्ट रूपसे दर्शन कर सकूँ? ॥ 61 ॥


[दायाँ स्तम्भ] अमृतानुकणिका- श्रीमती राधिका कह रही हैं कि मेरा चापल्य भी तुम्हारे द्वारा उत्पादित होता है, इसलिये तुम इसे जानते हो। और (यह चापल्य) मेरा होनेके कारण मैं भी इसे जानती हूँ। जैसे कोई दूसरेके दुःखको सम्पूर्ण रूपसे नहीं जान सकता, इसी प्रकार मेरे चापल्यको पूर्णरूपसे मेरी सखियाँ भी नहीं जानती हैं। पुनः उद्वेगकी वृद्धि होनेसे राधाजी कहने लगीं कि तुम्हारे मुखकमलको अपने दोनों नेत्रोंके द्वारा मन भरके देखनेके लिये क्या उपाय करूँ? जिससे उसका दर्शन हो, वह उपाय तुम बतलाओ। यदि श्रीकृष्ण कहें कि दर्शन न करनेसे तुम्हारा क्या आता-जाता है? तब उसके उत्तरमें कह रही हैं कि तुम्हारे 'मनोहर' मुखकमलको देखे बिना ये नेत्र धारण करना विफल है। जैसे दानकेलिकौमुदी (श्लोक 55) में- "भवतु माधवजल्पमशृण्वतोः श्रवणयोरलमश्रवणिर्मम। तमवलोकयतोर्विलोकनिः सखि विलोचनयोश्च किलानयोः ॥" अर्थात् श्रीराधारानी वृन्दासे कह रही हैं, - "हे सखि ! मेरे कानोंने माधवका गुणानुवाद नहीं सुना है, इसलिये इनका बहरा हो जाना ही अच्छा है। मेरे दोनों नेत्रोंने उनका अवलोकन नहीं किया है, इसलिये इनका अन्धा हो जाना ही अच्छा है।" यदि श्रीकृष्ण कहें कि अभी नहीं देखनेसे क्या होगा? प्रतीक्षा करो, बादमें मेरे दर्शन होंगे। इसके उत्तरमें राधाजी कहती हैं 'विरलं' अर्थात् मैं कुलवधू हूँ, मेरे लिये यह बहुत दुर्लभ है। उसपर भी तुम गोचारणादिके लिये सारा दिन वनमें चले जाते हो, इसलिये तुम्हारे दर्शन अतीव दुर्लभ हैं। अतएव इस समय निर्जन स्थानमें अवसर पाकर भी दर्शनदान नहीं करते हो, तो यह तुम्हारी निष्ठुरता है। अथवा कोई कहे कि उनके समान किसी औरको देखो, तो कह रही हैं 'विरलं' अर्थात् श्रीकृष्ण अतुलनीय हैं। उसका कारण है-'मुरलीविलासि', अर्थात् ऐसा मुरलीवादन करता मुखकमल किसी औरका नहीं है ॥ 61 ॥

66 ।

दूसरा अध्याय 2/62-64 ] श्लोकका अर्थ :- "तोमार माधुरी-बल, ताते मोर चापल, एइ दुइ, तुमि आमि जानि। काँहा करूँ काँहा याङ, काँहा गेले तोमा पाङ, ताहा मोरे कह त' आपनि॥" 62 ॥ अनुवाद-हे कृष्ण ! तुम्हारी माधुरीका बल और कैसे वह मेरे चित्तको चपल बना देती है, इन दोनोंको तुम भी जानते हो और मैं भी जानती हूँ। तुम बताओ कि मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? कहाँ जानेसे तुम मिलोगे ? ॥ 62 ॥ महाभावमें महाप्रभुका दिव्योन्माद :- नाना-भावेर प्राबल्य, हैल सन्धि-शाबल्य, भावे-भावे हैल महारण। औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोषामर्ष आदि सैन्य, प्रेमोन्माद-सबार कारण॥ 63 ॥ मत्तगज भावगण, प्रभुर देह-इक्षुवन, गज-युद्धे वनेर दलन। प्रभुर हैल दिव्योन्माद, तनुमनेर अवसाद, भावावेशे करे सम्बोधन ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें नाना भाव प्रबल वेगसे आ रहे हैं; दो भावोंका एक साथ समावेश होनेसे भाव-सन्धि और एक भावको दबाकर दूसरे भावका उदय होनेसे भाव-शाबल्य; इस प्रकार भावोंमें परस्पर महायुद्ध हो रहा है। औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोष, अमर्ष आदि भाव इस युद्धमें सैनिक हैं और कृष्णप्रेमका उन्माद ही इन सबका कारण है। महाप्रभुका शरीर गन्नेके खेतके समान था जिसमें मतवाले हाथियोंके समान भाव प्रवेश कर गये। उन हाथियोंमें युद्ध हो गया और उसके कारण वह गन्नेका खेत नष्ट हो गया। महाप्रभुके शरीरमें दिव्योन्माद जाग्रत हो गया और उनके तन-मनमें निराशा छा गयी। भावावेशमें वे कहने लगे॥ 63-64 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दिव्योन्माद'- मोहनभावमें भ्रमके जैसी किसी प्रेमवैचित्य-दशाका नाम 'दिव्योन्माद' है ॥ 64 ॥ अनुभाष्य- 'सन्धि'- (भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “सरूपयोर्भिन्नयोर्वा सन्धिः स्याद्भावयोर्युतिः।” 'सरूपसन्धि'- "सन्धिः सरूपयोस्तत्र भिन्नहेतुत्थयोर्मतः।” 'भिन्नरूप सन्धि'- "भिन्नयोर्हेतुनैकेन भिन्नेनाप्युपजातयोः।” अर्थात् “समानरूप अथवा भिन्नरूप दो भावोंके मिलनको 'सन्धि' कहते हैं। भिन्न-भिन्न कारणोंसे समानरूप दो भावोंके मिलनको 'सरूपसन्धि' और एक कारण या भिन्न कारणसे दो भिन्न भावोंके मिलनको 'भिन्नरूप सन्धि' कहते हैं।" एक कारण या भिन्न कारण-जनित दो भावोंकी सन्धि; हर्ष और शङ्का-दोनोंकी सन्धि, हर्ष और विषादकी सन्धि। 'शाबल्य'- (भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “शबलत्वं तु भावानां संमर्द्दः स्यात् परस्परम्।” अर्थात् “समस्त सञ्चारी भावोंके परस्पर युद्धका नाम 'शाबल्य' है। गर्व, विषाद, दैन्य, मति, स्मृति, शङ्का, अमर्ष, त्रास, निर्वेद, धैर्य और औत्सुक्य आदि भावोंके युद्ध होनेपर 'शाबल्य' होता है।" 'औत्सुक्य'-(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “कालाक्षमत्वमौत्सुक्यमिष्टेष्ठाप्ति-स्पृहादिभिः । मुखशोष-त्वरा-चिन्ता-निश्वास-स्थिरतादिकृत् ॥” अर्थात् “अभीष्टवस्तुके दर्शनकी इच्छा या अभीष्टप्राप्ति-वासनाके लिये काल विलम्ब सहन न कर सकनेको 'औत्सुक्य' कहते हैं। इसमें मुखका सूखना, व्यस्तता, चिन्ता, दीर्घःश्वास और स्थैर्य आदि लक्षित होते हैं।” 'चापल'-(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “रागद्वेषादिभिborderश्चित्तलाघवं चापलं भवेत्। तत्राविचारपारुष्यस्वच्छन्दाचरणादयः ॥” अर्थात् “आसक्ति और विरक्तिके द्वारा चित्तकी लघुताको 'चापल' कहते हैं। इसमें अविचार, स्वच्छन्द आचरण और कर्कशवाक्यादि लक्षित होते हैं।” । 67

[ 2/63-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'रोष'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “अपराधदुरुक्त्यादिजातं चण्डत्वमुग्रता। वधबन्धशिरःकम्पभर्त्सनाताड़नादिकृत्॥” अर्थात् “अपराध और बुरे-वचनजनित क्रोधको 'उग्रता' या 'रोष' कहते हैं। इसमें वध, बन्धन, सिरका काँपना, भर्त्सना और ताड़नादि लक्षण होते हैं।” 'अमर्ष'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “अधिक्षेपापमानादेः स्यादमर्षोऽसहिष्णुता॥ तत्र स्वेदः शिरःकम्पो विवर्णत्वं विचिन्तनम्। उपायान्वेषणाक्रोशवैमुख्योत्थाड़नादयः॥” अर्थात् “व्यङ्ग या तिरस्कार और अपमानादिके लिये असहिष्णुताको 'अमर्ष' कहते हैं। इसमें पसीना आना, सिरका काँपना, विवर्णता (रङ्गहीन या कान्तिहीन होना), चिन्ता, उपायको ढूँढना, आक्रोश, विमुखता और ताड़नादि लक्षण होते हैं॥” 63 ॥ प्रियतम श्रीकृष्णके दर्शनकी आकाङ्क्षा :— श्रीकृष्णकर्णामृत (40) बिल्वमङ्गल-श्लोक— हे देव, हे दयित, हे भुवनैकबन्धो, हे कृष्ण, हे चपल, हे करुणैकसिन्धो। हे नाथ, हे रमण, हे नयनाभिराम, हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे॥ 65 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव! हे दयित! हे भुवनके एकमात्र बन्धु! हे कृष्ण! हे चपल! हे करुणासिन्धु! हे नाथ! हे रमण! हे नयनोंको आनन्द देनेवाले! आहा! तुम कब मुझे दर्शन दोगे? ॥ 65 ॥ अनुभाष्य— हे देव, हे दयित (प्रिय), हे भुवनैकबन्धो (व्रजभूम्येकपालक), हे चपल (स्वेच्छाराम), हे करुणैकसिन्धो, हे रमण (गोपीजनरमण), हे नयनाभिराम (नयनानन्द), हे कृष्ण (गोपवध्वाकर्षक), हा हा मे (मम) दृशोः (नयनयोः) पदं (गोचरं) कदा (कस्मिन्काले) नु (किं) भवितासि? श्लोक-भावानुवाद—हे देव! हे प्रियतम! हे व्रजके पालनहारे! हे चपल (स्वेच्छासे रमण करनेवाले)! हे करुणाके सिन्धु! हे गोपीजन-रमण! हे नयनानन्द! हे गोपवधु-आकर्षक! हा हा कब मेरे नयनोंके गोचर होओगे? ॥ 65 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादका वर्णन :— उन्मादेर लक्षण, कराय कृष्ण-स्फुरण, भावावेशे उठे प्रणय-मान। सोल्लुण्ठ-वचन-रीति, मद, गर्व, व्याज-स्तुति, कभु निन्दा, कभु वा सम्मान॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुमें उन्मादके लक्षण उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति कराते। भावके आवेशमें प्रणय, मान, व्यङ्गात्मक वाक्य, मद, गर्व और परोक्ष-स्तुति आदि प्रेमके विकार और सञ्चारी भाव जाग्रत हो गये। वे कभी कृष्णकी निन्दा करते और कभी सम्मान करते॥ 66 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सोल्लुण्ठ'—स्तुतिवाक्यके द्वारा निन्दा॥ 66 ॥ अनुभाष्य— उन्माद'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “उन्मादो हृद्भ्रमः प्रौढ़ानन्दापद्विरहादिजः। अत्राट्टहासो नटनं सङ्गीतं व्यर्थचेष्टितम्। प्रलाप-धावनक्रोश-विपरीत-क्रियादयः॥” अर्थात् “अत्यन्त आनन्द, विपत्ति एवं विरहादिसे उत्पन्न हृदयके भ्रमको 'उन्माद' कहते हैं। उन्मादमें अट्टहास, नृत्य, सङ्गीत, व्यर्थ-चेष्टा, प्रलाप, भागना, चीत्कार और विपरीत क्रियादि अनुभाव होते हैं।” 'प्रणय'—(भःरःसिः पःविः तृतीय लः)— “प्राप्तायां सम्भ्रमादीनां योग्यतायामपि स्फुटम्। तद्गन्धेनाप्यसंस्पृष्टा रतिः प्रणय उच्यते॥” अर्थात् “जिस रतिमें स्पष्टरूपसे सम्भ्रमादिकी प्राप्तिकी योग्यता रहते हुए भी यदि उसे सम्भ्रम लेशमात्र भी स्पर्श नहीं करता, तो उसे 'प्रणय' कहते हैं।” 68 ।

दूसरा अध्याय 2/66-68 ] 'मान'-(उज्ज्वलनीलमणि 14/96)- “स्नेहस्तूत्कृष्टता-व्याप्त्या माधुर्यं मानयन्नवम्। यो धारयत्यदाक्षिण्यं स मान इति कीर्त्यते॥” अर्थात् “जो स्नेह उत्कर्ष प्राप्तिके द्वारा श्रीराधाकृष्णयुगलको नव-नव माधुर्य अनुभव कराता है और अपने भावको गोपन रखनेके लिये बाहरसे कौटिल्यको धारण करता है, उसे 'मान' कहते हैं॥66॥ पूर्वोक्त 'हे देव' श्लोककी व्याख्या :- “तुमि देव-क्रीड़ारत, भुवनेर नारी यत, ताहे कर अभीष्ट क्रीड़न। तुमि मोर दयित, ताते वैस मोर चित, मोर भाग्ये कैले आगमन॥67॥ अनुवाद-[श्लोकके 'हे देव'का भाव]-'तुम देव हो अर्थात् तुम सदा अपनी क्रीड़ामें रत रहते हो। इसलिये जगत्की अन्य समस्त नारियोंके साथ तुम अपनी अभीष्ट क्रीड़ा करो। ['हे दयित'का भाव]-तुम मेरे प्रियतम हो, मेरे हृदयमें विश्राम करो। आज मेरा भाग्य उदित हुआ है, जो तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है॥67॥ अमृतानुकणिका-दिव्योन्माद दशामें महाप्रभु श्रीराधिकाके भावोंमें विभावित होकर 'हे देव...' यह श्लोक पढ़ने लगे। राधाजीकी कृष्णविरहजनित मूर्च्छा दूर हुई और वे चारों ओर देखकर कहने लगीं,–'अहो सखी! मैं नूपुरकी ध्वनि सुन रही हूँ, परन्तु वे तो कहीं दिखायी नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कि इसी कुञ्जमें किसी और रमणीके विलास करते हुए वे शठ यहीं अवस्थान कर रहे हैं।' ऐसा कहकर पुनः उन्मादवश हेतु किसी अन्य रमणीके साथ सङ्गमसे चिह्नाङ्कित श्रीकृष्णको सामने देखकर उनके प्रति राधाजीमें अमर्ष उदित हो गया। और फिर वे चले गये, ऐसा मनमें चिन्तन करनेके बाद तापसे औत्सुक्य उदित हुआ (यहाँ अमर्ष और औत्सुक्य, दोनों भावोंकी सन्धि हुई)। पहले अन्य रमणीके साथ सम्भुक्त श्रीकृष्णका मनमें ही दर्शनकर स्वाभाविक अपना धीराधीर-मध्यत्व (नायिकाके गुण) का आश्रयकर नेत्रोंमें जल भरे हुए राधाजीने वक्रोक्तिसे सम्बोधन किया,–'हे देव!' अन्य रमणियोंके साथ क्रीड़ारत हो, इसलिये तुम देव (क्रीड़ाशील) हो। अतः तुम उन्हींके पास जाओ-यही अर्थ है।' (उःनीः 5/39)- “धीराधीरा तु वक्रोक्त्या सवाष्पं वदति प्रियम्॥” अर्थात् “जो नायिका अपराधी वल्लभके आनेपर अपने नेत्रोंसे आँसुओंको बहाती हुई वक्रोक्ति प्रयोग करती है, उसे धीराधीरमध्यया नायिका कहते हैं।” 'किसी अन्य रमणीके पास जाओ'–राधाजीके यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण जैसे चले गये हैं, ऐसा मनमें सोचकर बादमें हृदयमें तापके उदय होनेसे उनके दर्शनकी उत्सुकतावश कहने लगीं,-' 'हे दयित!', तुम तो मेरे प्राणकोटि प्रियतम हो, मैं कैसे तुम्हारा त्याग कर सकती हूँ? इसलिये दर्शन दो-यह अर्थ है॥'67॥ भुवनेर नारीगण, सबा' कर आकर्षण, ताँहा कर सब समाधान। तुमि कृष्ण-चित्तहर, ऐछे कोन् पामर, तोमारे वा केबा करे मान॥68॥ अनुवाद-[हे भुवनैकबन्धौ!] जगत्में सभी रमणियोंके चित्तको तुम वंशीध्वनिके द्वारा आकर्षित करते हो और उन सबके मनकी सन्तुष्टिका विधान करते हो। [हे कृष्ण!] निज रूप-गुण-माधुर्यके द्वारा तुम सभीके चित्तको हरण करनेवाले हो। ऐसा कौन अधम है जो तुमसे मान करेगा? अर्थात् कोई भी नहीं कर सकता॥68॥ अमृतानुकणिका-पुनः श्रीकृष्ण आकर अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर राधाजीमें अमर्षके अनुगत असूयाका उदय हुआ। असूयाके उदय होनेसे धीराधीर-मध्य भावका आश्रयकर वक्रोक्तिसे सोलुण्ठ । 69

[ 2/68–70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वचन (परिहासयुक्त वचन, स्तुतिपूर्वक निन्दा) बोलने लगीं,–'हे भुवनैकबन्धो!' इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम तो केवल मेरे ही बन्धु नहीं हो, सभी गोपियोंके भी केवल नहीं, वेणुनादसे समस्त भुवनोंके, अर्थात् समस्त भुवनोंमें रहनेवाली स्त्रियोंके तुम बन्धु हो, इसलिये उनके सब कार्योंके समाधान हेतु जाओ—यह अर्थ है। उसका लक्षण (उःनीः 5/35)— “धीरा तु वक्ति वक्रोक्त्या सोत्रासं सागसं प्रियम्॥” अर्थात् “जो नायिका अपने अपराधी प्रियतमके प्रति उपहासपूर्वक वक्रोक्तिका प्रयोग करती है, उसको 'धीरमध्या' कहा जाता है॥” पुनः श्रीकृष्ण जैसे चले गये, ऐसा मनमें जानकर औत्सुक्यके अनुगत मति–नामक भावके उदयसे कहने लगीं,–'हे कृष्ण!'–हे श्यामसुन्दर, तुम सबके चित्ताकर्षक हो। मेरा चित्त तो तुमने पहले ही हरण कर लिया था, अब मेरे मान करनेका क्या प्रयोजन है? इसलिये एकबार तो दर्शन दो—यह अर्थ है॥'68॥

तोमार चपल मति, एकत्र ना हय स्थिति, ता'ते तोमार नाहि किछु दोष। तुमि त' करुणासिन्धु, आमार पराण–बन्धु, तोमाय नाहि मोर कभु रोष॥69॥

अनुवाद–[हे चपल!] तुम्हारी मति अति चञ्चल है, तुम्हारे मनकी कहीं स्थिरता नहीं है। तुम्हारा मन किसी एक रमणीमें स्थिर नहीं रहता। [करुणैकसिन्धो!] तुम तो करुणाके सिन्धु हो। तुम तो मेरे प्राणोंसे प्रिय बन्धु हो, इसलिये मैं तुमसे कभी भी रुष्ट नहीं हो सकती॥69॥

अमृतानुकणिका—पुनः श्रीकृष्ण जैसे आकर विनय कर रहे हैं,–'प्रिये! मैं बाहर ही था, कहीं और गया नहीं था, अतः तुम प्रसन्न होओ।' इस प्रकार श्रीकृष्ण अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर राधाजीमें औग्रद्य या उग्रता नामक भाव उदय हो गया। उग्रता नामक भाव उदय होनेसे अधीरामध्या नायिकाके गुणोंका आश्रय करके रोषसहित राधाजी बोलीं,–'हे चपल!' हे चपलराज परस्त्री–चोर! जाओ जाओ, यहाँसे चले जाओ—यह अर्थ है।' अधीराके लक्षण (उःनीः 5/37)— “अधीरा परुषैर्वाक्यै र्निरस्येद्वल्लभं रुषा॥” अर्थात् “जो नायिका अपने रोषको प्रकाशकर अपने वल्लभको निष्ठुर वाक्योंसे फटकार लगाती है, उसको अधीरामध्या कहा जाता है।” राधाजीको लगा कि मेरे रोषपूर्ण वाक्य सुनकर श्रीकृष्ण चले गये हैं, तो अपने मनमें ग्लानिसे सोचने लगीं,–'हाय! मैंने उनका अनादर कर दिया, इस कारण वे चले गये हैं और अब वे नहीं आयेंगे'—इस प्रकार दैन्य उदय होनेसे सकाकु (मिनतीपूर्वक) बोलीं,–'हे करुणैकसिन्धो!' तुम तो करुणाके एकमात्र सिन्धु हो, यद्यपि मैं अपराधिनी हूँ, तथापि तुम करुणासे आर्द्र होकर दर्शन दो॥'69॥

श्रीकृष्णके प्रति क्षमा या प्रसन्न भाव :– तुमि नाथ—व्रजप्राण, व्रजेर कर परित्राण, बहु कार्ये नाहि अवकाश। तुमि आमार रमण, सुख दिते आगमन, ए तोमार वैदग्ध्य–विलास॥70॥

अनुवाद–[हे नाथ!] हे कृष्ण! तुम व्रजके नाथ, व्रजवासियोंके प्राण हो। व्रजवासियोंकी रक्षाके लिये तुम अनेक कार्योंमें व्यस्त रहते हो, इसलिये मेरे पास आनेका तुम्हें अवकाश नहीं है। [हे रमण!] तुम तो सदा ही मेरे हृदयमें रमण करते रहते हो और मुझे सुख प्रदान करनेके लिये मेरे पास आये हो, यह तुम्हारे विलासका वैदग्ध्य है॥70॥ अनुभाष्य–'वैदग्ध्य'–पटुता, पाण्डित्य, रसिकता, चतुरता, शोभा और भङ्गी॥70॥

70 ।

दूसरा अध्याय 2/70-72 ] अमृताणुकणिका—पुनः जैसे श्रीकृष्ण आकर बोले, — 'प्रिये ! किसलिये मान करके मुझे कटु वचन कह रही हो? मेरे प्रति प्रसन्न होओ।' इस प्रकार अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर अमर्षके अनुगत अवहित्था भाव राधाजीमें उदय हुआ। अवहित्था भाव उदय होनेपर राधाजी धीरप्रगल्भ भावके गुणका आश्रयकर उदासीनतासे कहने लगीं, — ' 'हे नाथ !' तुम तो हम ब्रजवासियोंके रक्षक हो, ऐसी कौनसी निर्बुद्धि (मूर्ख) रमणी है, जो तुम्हें सन्तुष्ट नहीं करेगी? किन्तु ब्राह्मणियोंके कहनेपर मैंने मौनव्रत धारण किया था, इस कारण मैं अब तक तुमसे बातचीत नहीं कर पायी, इसलिये मेरा यह अपराध क्षमा करो—यह भाव है।' धीरप्रगल्भाके लक्षण (उःनीः 5/53)— "उदास्ते सुरते धीरा सावहित्था च सादरा॥” अर्थात् “मानिनी अवस्थाको प्राप्त होकर सम्भोगके विषयमें उदासीना और अवहित्थाके द्वारा अपने मानके भावको गुप्त रखकर ऊपरसे कान्तके प्रति आदर दिखलानेवालीको 'धीरप्रगल्भा' कहते हैं।" पुनः श्रीकृष्ण जैसे चले गये हैं, ऐसा मन-ही-मनमें कहने लगीं, — 'बार-बार मेरे व्यवहारसे दुःखी होकर चले गये हैं, अब वे लौटकर नहीं आयेंगे।' ऐसा मनमें भाव आनेसे चापल नामक भावके उदय होनेसे मनमें चिन्तन करने लगीं, — 'यदि कृपापूर्वक पुनः वे दर्शन प्रदान करेंगे, तब मैं स्वयं ही उनके कण्ठको धारण करूँगी (गले लग जाऊँगी)।' इस प्रकार दैन्यसहित बोलने लगीं, — ' 'हे रमण !' तुम सदा ही मुझे आनन्द प्रदान करते हो, इसलिये पहलेके समान अब भी आकर मेरे साथ विहार करो—यह अर्थ है ॥'70॥

मोर वाक्य निन्दा मानि', कृष्ण छाड़ि' गेला जानि, शुन, मोर ए स्तुति-वचन। नयनेर अभिराम, तुमि मोर धन-प्राण, हाहा पुनः देह दरशन ॥" 71 ॥

अनुवाद—[हे नयनाभिराम!] मेरे वचनोंको निन्दा मानकर कृष्ण मुझे छोड़कर चले गये हैं, ऐसा मानकर श्रीराधिका कहने लगीं— हे कृष्ण! मेरे मधुर वचन सुनो। तुम मेरे नयनोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हो, तुम ही मेरे प्राण-धन हो। हा-हा! मुझे पुनः दर्शन दो॥"71॥ अमृताणुकणिका—अब सामने श्रीकृष्ण आये हैं, यह जानकर सहज उत्सुकताके द्वारा मन आक्रान्त होनेपर राधाजीने आलिङ्गनके लिये दोनों भुजायें फैला दीं। किन्तु श्रीकृष्णको न पानेपर बाह्य स्फूर्ति होनेपर अत्यन्त विकलताके साथ कहने लगीं, — 'हे नयनाभिराम !' हे नयनोंके आनन्ददायक ! कब तुम मेरे नयनपथके पथिक होओगे ?' अर्थात् राधाजी अति खेदसे कह रही हैं, हाय हाय, कब तुम मेरे दृष्टिगोचर होओगे ? ॥ 71 ॥ महाप्रभुके महाभावके लक्षण :- स्तम्भ, कम्प, प्रस्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद, देह हैल पुलके व्यापित। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, उठि' इति-उति धाय, क्षणे भूमे पड़िया मूर्च्छित ॥ 72 ॥ अनुवाद—राधाभावाविष्ट महाप्रभुके शरीरमें श्रीकृष्ण विरहके कारण स्तम्भ, कम्प, स्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद, पुलकादि सात्त्विकभाव उदित हो गये। वे कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते, कभी गाते, कभी इधर-उधर दौड़ते और कभी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ते ॥ 72 ॥ अनुभाष्य—'स्तम्भ'—अष्ट-सात्त्विक विकारोंमें एक। (भ.र.सि. दःविः तृतीय लः)— “चित्तं सत्त्वीभवत् प्राणे न्यस्यत्यात्मानमुद्धतम्। प्राणस्तु विक्रियां गच्छन् देहं विक्षोभयत्यलम्। तदा स्तम्भादयो भावा भक्तदेहे भवन्त्यमी ॥ स्तम्भं भूमिस्थितः प्राणस्तनोति। स्तम्भो हर्षभयाश्चर्यविषादामर्षसम्भवः । तत्र वागादि-राहित्यं नैश्चल्यं शून्यतादयः ॥” । 71

[ 2/72-73 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्थात् “चित्त सात्त्विक भाव प्राप्त करनेपर चञ्चल मनको प्राणमें समर्पण कर देता है, उससे प्राण भी विकार प्राप्त होनेपर देहको क्षुब्ध करते हैं। तब भजनशीलकी देहपर स्तम्भादि सात्त्विक भावोंका उदय होता है। प्राण पञ्चभूतोंमेंसे भूमिपर स्थित होनेसे ‘स्तम्भ’ विकार होता है। हर्ष, भय, विस्मय, विषाद और क्रोधसे स्तम्भ उत्पन्न होता है। स्तम्भमें वाणी-हस्त-पादादिका चेष्टारहित होना, निश्चलता एवं शून्यताके कारण अन्य इन्द्रियोंकी क्रियाओंका स्थगित होना लक्षण प्रकाशित होते हैं। स्तम्भ मनकी एक विशेष अवस्थाका नाम है। वाक्यादि रहित देहमें उत्पन्न विकार बाहरमें और अन्तरमें व्याप्त होकर अवस्थान करते हैं। ये विकार पहले सूक्ष्म देहमें अवस्थित होते हैं और बादमें स्थूल देहमें अवस्थित होते हैं। वाक्यादि-हीनता कर्मेन्द्रियोंकी और शून्यता ज्ञानेन्द्रियोंकी क्रियारहित होनेके ज्ञापक हैं।” ‘कम्प’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “वित्रासामर्षहर्षाद्यैर्वेपथुर्गात्रलौल्यकृत्॥” अर्थात् “विशेष भय, क्रोध और हर्षादिके द्वारा शरीरमें जो चञ्चलता उत्पन्न होती है, उसे ‘वेपथु’ या ‘कम्प’ कहते हैं।” ‘वैवर्ण्य’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “विषादरोषभीत्यादेर्वैवर्ण्यं वर्णविक्रिया। भावज्ञैरत्र मालिन्यकार्श्याद्याः परिकीर्त्तिताः॥” अर्थात् “विषाद, क्रोध और भयादिसे शरीरमें वर्ण-विकारको ‘वैवर्ण्य’ कहते हैं। वैवर्ण्यसे देहमें मलिनता और कृशतादि होती है।” ‘अश्रु’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “हर्षरोषविषादाद्यैरश्रु नेत्रे जलोद्गमः। हर्षजेऽश्रुणि शीतत्वमौष्ण्यं रोषादि सम्भवे। सर्वत्र नयनक्षोभ-रागसंमार्जनादयः॥” अर्थात् “हर्ष, क्रोध और विषादादिके द्वारा बिना प्रयत्नके नेत्रोंमें जो जल-भर आता है, उसे ‘अश्रु’ कहते हैं। हर्षजनित अश्रुओमें शीतलता और क्रोधादिजनित अश्रुओंमें उष्णता लक्षित होनेपर भी सभी अश्रुओंमें नेत्रोंकी चञ्चलता, लालिमा और उनका पोंछनाादि देखा जाता है।” ‘स्वेद’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “स्वेदो हर्षभयक्रोधादिजः क्लेदकरस्तनोः॥” अर्थात् “हर्ष, भय और क्रोधादिसे उत्पन्न जो शरीरमें क्लेद (पसीना) आता है उसको ‘स्वेद’ कहते हैं।” ‘गद्गद’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “विषादविस्मयामर्षहर्षभीत्यादिसम्भवम्। वैस्वर्यं स्वरभेदः स्याद्देश गद्गदिकादिकृत्।” अर्थात् “विषाद, आश्चर्य, क्रोध, आनन्द और भयादिसे ‘स्वरभेद’ या ‘वैस्वर्य’ होता है। इस स्वरभेदमें वाणी गद्गद हो जाती है।” ‘पुलक’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “रोमाञ्चोऽयं किलाश्चर्यहर्षोत्साहभयादिजः। रोम्णामभ्युद्गमस्तत्र गात्रसंस्पर्शनादयः॥” अर्थात् “विस्मय, हर्ष, उत्साह और भयादिसे रोम खड़े होनेसे ‘पुलक’ या ‘रोमाञ्च’ होता है और शरीरमें किसी वस्तुके स्पर्श जैसा अनुभव होने लगता है॥”72॥ महाप्रभुको कृष्णदर्शनका भ्रम :— मूर्च्छाय हैल साक्षात्कार, उठि’ करे हुहुङ्कार, कहे—एइ आइला महाशय। कृष्णेर माधुरी-गुणे, नाना भ्रम हय मने, श्लोक पड़ि’ करये निश्चय॥ 73 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको मूर्च्छित अवस्थामें श्रीकृष्णका साक्षात्कार हुआ। वे आनन्दमें भरकर सहसा उठे और जोरसे हुङ्कार करके कहने लगे,—‘ये महाशय (श्रीकृष्ण) आये हैं।’ श्रीकृष्णकी माधुरी और गुणोंके प्रभावसे उनका मन अनेक प्रकारसे भ्रमित होने लगा और वे एक श्लोक पढ़कर श्रीकृष्णकी उपस्थितिको निश्चित करने लगे॥ 73 ॥ 72 ।

दूसरा अध्याय 2/74-76 ] श्रीकृष्णकर्णामृतमें (68) बिल्वमङ्गल-वाक्य :- मारः स्वयं नु मधुरद्युतिमण्डलं नु माधुर्यमेव नु मनो नयनामृतं नु। वेणीमृजो नु मम जीवितवल्लभो नु कृष्णोऽयमभ्युदयते मम लोचनाय॥ 74 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! साक्षात् कन्दर्पस्वरूप, द्युतिसमूहके माधुर्यस्वरूप, मूर्त्तिमान् माधुर्यस्वरूप, मन-नयनके अमृतस्वरूप, गोपियोंके (वेणी-मोचनकारी) आनन्दस्वरूप, मेरे प्राणवल्लभस्वरूप, साक्षात् नन्दनन्दन ही हैं, जो मेरे दर्शनपथपर प्रकट हुए हैं॥ 74 ॥ अनुभाष्य— मारः (कन्दर्पः) नु (किं) स्वयं नु (वितर्के) मधुरद्युतिमण्डलं (हृत्स्पर्शि सुन्दरस्निग्धज्योतिर्बिम्बं) नु (किं न) तत् माधुर्यम् एव नु (किं), मनोनयानामृतं (हृदयनेत्रसुधास्वरूपः) नु (किं), वेणीमृजः (वेण्युन्मोचनकारी) नुः (किं) अयं जीवितवल्लभः (कृष्णः) मम लोचनाय (लोचनसुखदातुं) अभ्युदयते (मत्सन्निधौ प्रकटयति)। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि! क्या साक्षात् कामदेव यहाँ आये हैं? नहीं, क्या ये पुरुष हृदयस्पर्शि सुन्दर-स्निग्ध ज्योतिर्बिम्ब हैं? अथवा क्या मूर्त्तिमान माधुर्य हैं? अथवा क्या मेरे मन-नयनोंके अमृतस्वरूप हैं? क्या ये गोपियोंके वेणी-मोचनकारी कान्त हैं? अथवा क्या ये मेरे जीवन-वल्लभ कृष्ण हैं, जो मेरे नयनोंको आनन्द प्रदान करनेके लिये मेरे दृष्टिपथपर प्रकट हुए हैं?॥ 74 ॥ अमृतानुकणिका—'श्रीकृष्णका दर्शन मेरे भाग्यमें नहीं हैं'—इस प्रकार सखियोंके साथ बात करते-करते अकस्मात् श्रीकृष्णको दूरसे देखकर विरहमें व्याकुल राधाजी कहने लगीं,—'मारः स्वयं नु', हे सखियों! जो अदृश्य रहकर भी जगत्को मारते हैं, वे 'मार' अर्थात् कन्दर्प क्या स्वयं आये हैं?' 'नु'—शब्दका अर्थ वितर्क से है। पुनः माधुर्य अनुभव करके आश्चर्यसहित बोलीं, —'कन्दर्प इस प्रकार मधुर नहीं हो सकता, तो क्या ये मधुर ज्योतिसमूहके मण्डल हैं?' पुनः अत्यन्त आश्चर्य अनुभव करके कहने लगीं,—'माधुर्य ही क्या साक्षात् मूर्त्तिमान् होकर प्रकट हुआ है?' पुनः मन और नयनोंकी अतिशय तृप्तिसे परम सन्तोषसे कहने लगीं,—'ये क्या मन और नयनोंको तृप्त करनेवाले अमृतस्वरूप हैं?' पुनः अपनी देहको अनुभव करके सम्भ्रमसे कहने लगीं,—'मेरी वेणी खोलनेवाले विदेशसे आये मेरे कान्त हैं क्या?' पुनः सम्पूर्णरूपसे अवलोकन करके आनन्दके साथ बोलीं,—'हे सखियों! ये मेरे प्राणवल्लभ नवकिशोर कृष्ण हैं, जो मेरे नयनोंके आनन्दको वर्धित करनेके लिये आये हैं, तुम सब उनके दर्शन करो।' 'मारः स्वयं नु' आदिसे लेकर 'वेणीमृजः' तक सन्देह ही है। 'मम जीवितवल्लभः कृष्णः अभ्युदयते'—यह निश्चित है। इसलिये यह सन्देहान्त निश्चय अलङ्कार है॥ 74 ॥ श्लोकका अर्थ :- "किवा एइ साक्षात् काम, द्युतिबिम्ब मूर्त्तिमान्, कि माधुर्य स्वयं मूर्त्तिमन्त। किवा मनो-नेत्रोत्सव, किवा प्राणवल्लभ, सत्य कृष्ण आइला नेत्रानन्द॥" 75 ॥ अनुवाद—"क्या ये साक्षात् कामदेव हैं अथवा ज्योतिपुञ्ज मूर्त्तिमान होकर प्रकट हुए हैं? क्या समस्त माधुर्य ही मूर्त्तिमान होकर प्रकट हुआ है? या ये मेरे मन-नेत्रोंके उत्सवस्वरूप हैं? क्या ये मेरे प्राणवल्लभ हैं? ये सचमुच कृष्ण ही हैं जो मेरे नेत्रोंको आनन्द देनेके लिये आये हैं॥" 75 ॥ भावके वशीभूत महाप्रभु :- गुरु—नाना भावगण, शिष्य—प्रभुर तनु-मन, नाना रीते सतत नाचाय। निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, मन्यु, एइ नृत्ये प्रभुर काल याय॥ 76 ॥ । 73

[ 2/76–79 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद— निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, क्रोधादि भाव गुरुके समान महाप्रभुके शरीर और मनरूपी शिष्यको अनेक प्रकारसे सदा नचाते। इसी प्रकार उनका सारा समय व्यतीत होता॥ ७६॥ अनुभाष्य— गुरु जिस प्रकार शासन करके शिष्योंको कलाकी शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके हृदयके भाव गुरु बनकर महाप्रभुके श्रीअङ्ग और मनरूपी दो शिष्योंको नाना प्रकारसे नृत्य कराते॥ ७६॥ स्वरूप-रामानन्दके साथ महाप्रभुकी प्रतिदिनकी कार्यावली :— चण्डीदास, विद्यापति, रायेर नाटक–गीति, कर्णामृत, श्रीगीतगोविन्द। स्वरूप–रामानन्द–सने, महाप्रभु रात्रि–दिने, गाय, शुने—परम आनन्द॥ ७७॥ अनुवाद— श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दके साथ महाप्रभु (अपने भावोंके अनुरूप) रात-दिन श्रीचण्डीदास और श्रीविद्यापतिके पद, श्रीराय रामानन्दके जगन्नाथवल्लभ-नाटक, श्रीबिल्वमङ्गलके श्रीकृष्णकर्णामृत और श्रीजयदेव गोस्वामीके श्रीगीतगोविन्दके श्लोक गाते और सुनते परम आनन्दसे समय बिताते॥ ७७॥ अनुभाष्य— 'रायेरे नाटक'—'जगन्नाथवल्लभ' नाटक; 'गीति'— श्रीचण्डीदास, श्रीविद्यापति, श्रीराय रामानन्द, श्री बिल्वमङ्गल और श्रीजयदेव—इनके द्वारा रचित ग्रन्थोंकी पदावलीका गान॥ ७७॥ महाप्रभुके विभिन्न रसाश्रित भक्तगण :— पुरीर वात्सल्य मुख्य, रामानन्देर शुद्धसख्य, गोविन्दाद्येर शुद्धदास्यरस। गदाधर, जगदानन्द, स्वरूपेरे मुख्य रसानन्द, एइ चारि भावे प्रभु वश॥ ७८॥ अनुवाद— श्रीपरमानन्द पुरीका महाप्रभुके प्रति वात्सल्यभाव था। श्रीराय रामानन्दका उनमें शुद्धसख्य-भाव, श्रीगोविन्दादिका उनमें दास्यभाव था। श्रीगदाधर पण्डित, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीस्वरूप दामोदरका महाप्रभुमें मुख्य (मधुर) रसमें प्रेम था। महाप्रभु इन चार भावोंके वशीभूत रहते थे॥ ७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'पुरीर'— श्रीपरमानन्द पुरीका। 'मुख्यरस'— मधुर रस॥ ७८॥ अनुभाष्य— श्रीपरमानन्द पुरीका (व्रजके उद्धवका) वात्सल्य-रसप्रधान भाव, श्रीरामानन्दका (अर्जुन या विशाखाका) शुद्ध सख्यभाव, श्रीगोविन्दादि सेवकोंका शुद्ध दास्यभाव, और अन्तरङ्ग-भक्त श्रीगदाधर, श्रीजगदानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरका मुख्य मधुररस,—इन चार भावोंमें महाप्रभु उनकी भजन-सङ्गसुख-सेवा ग्रहण करके उनके वशीभूत थे॥ ७८॥ महाप्रभुके पक्षमें मधुररसमें महाभाव आश्चर्यजनक नहीं :— लीलाशुक–मर्त्यजन, ताँर हय भावोद्गम, ईश्वरे से–कि इहा विस्मय। ताहे मुख्य–रसाश्रय, हइयाछे महाशय, ताते हय सर्वभावोदय॥ ७९॥ अनुवाद— लीलाशुक (श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुर) यद्यपि मनुष्य थे, तो भी उनके शरीरमें अनेक भावोंके विकार प्रकट होते थे। तो फिर इसमें क्या आश्चर्यकी बात है कि ये भाव स्वयं भगवान् महाप्रभुके शरीरमें उदित हुए। मधुररसके भावोंमें डूबे हुए महाप्रभुकी तो सर्वोच्च स्थिति है, इसलिये सभी प्रकारके भाव उनके शरीरमें दिखायी देते थे॥ ७९॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'लीलाशुक'— श्रीबिल्वमङ्गल गोस्वामी। इनके पूर्व आश्रमका नाम शिहलण मिश्र था और ये दक्षिण भारतके ब्राह्मण थे। गृहस्थ-धर्मका शास्त्रोचित रूपसे पालन करते-करते चिन्तामणि नामक वेश्यासे उपदेश सुनकर इन्हें वैराग्य हो गया और 'शान्तिशतक' नामक ग्रन्थकी रचना की। बादमें श्रीकृष्ण-वैष्णव कृपासे भक्तिलाभ करके इनका नाम 74 ।

दूसरा अध्याय 2/79-83 ]


'बिल्वमङ्गल गोस्वामी' हुआ और इन्होंने 'श्रीकृष्णकर्णामृत' ग्रन्थकी रचना की। उनके प्रेमसे उन्मत्त भावोंको देखकर लोग उन्हें 'लीलाशुक' कहते थे॥ 79 ॥ अनुभाष्य- 'लीलाशुक'—इनके अन्य नाम 'लीलासुख', 'चित्सुखाचार्य' और 'बिल्वमङ्गल' थे। ये विष्णुस्वामी सम्प्रदायके त्रिदण्डिस्वामी थे। आदिलीला 1/57 का अनुभाष्य देखें॥ 79 ॥

आश्रयके प्रणयभावमय विषयविग्रह श्रीगौरसुन्दर :— पूर्व व्रजविलासे, येइ तिन अभिलाषे, सेइ यत्ने आस्वादन नहिल। श्रीराधार भावसार, आपने करि' अङ्गीकार, सेइ तिनवस्तु आस्वादिल॥ 80 ॥

अनुवाद— श्रीकृष्णकी पहले व्रजलीलामें जिन तीन भावोंको आस्वादन करनेकी अभिलाषा थी, परन्तु सब प्रकारसे यत्न करनेपर भी वे उन्हें पूरा नहीं कर पाये, क्योंकि ये भाव श्रीमती राधिकाकी सम्पत्ति हैं। इसलिये श्रीकृष्णने राधाजीके इन भावोंको अङ्गीकार करके महाप्रभुके रूपमें अवतरित होकर उन तीन भावोंका आस्वादन किया॥ 80 ॥ अनुभाष्य— आदिलीला 4/230 संख्या देखें॥ 80 ॥

महावदान्य महाप्रभुके द्वारा उसी आश्रयका सेवा-भाव-वितरण :— आपने करि' आस्वादने, शिखाइल भक्तगणे, प्रेमचिन्तामणिर् प्रभु धनी। नाहि जाने स्थानास्थान, यारे तारे कैल दान, महाप्रभु—दाता-शिरोमणि॥ 81 ॥

अनुवाद— श्रीकृष्णप्रेमके भावोंका महाप्रभुने स्वयं तो आस्वादन किया ही और अपने भक्तोंको भी इसकी शिक्षा दी। वे कृष्णप्रेमरूपी चिन्तामणिके धनसे धनी हैं। उन्होंने इस धनका पात्र-अपात्रका विचार न करके सर्वत्र ही इसका दान किया, इसलिये वे दान करनेवालोंमें शिरोमणि हैं॥ 81 ॥


अमृतप्रवाह भाष्य— प्रभु श्रीचैतन्यदेवका प्रेम-चिन्तामणि ही धन है ओर वे उस धनसे धनी हैं। प्राकृत-चिन्तामणिके कार्यके समान प्रेम-चिन्तामणि भी अनेक-अनेक प्रेम-चिन्ताणियोंका उत्पादन करनेपर भी महाप्रभुके भण्डारमें वह पूर्णरूपसे विराजमान है। और भक्त महाप्रभुके द्वारा दी गयी प्रेम-चिन्तामणिसे अनन्त-कोटि चिन्तामणियाँ समस्त जगत्में विस्तार करते हैं॥ 81 ॥

परम दयाल अवतार :— एइ गुप्त भाव-सिन्धु, ब्रह्मा ना पाय एक बिन्दु, हेन धन बिलाइल संसारे। ऐछे दयालु अवतार, ऐछे दाता नाहि आर, गुण केह नारे वर्णिवारे॥ 82 ॥

अनुवाद— महाप्रभुके हृदयमें जिन गुप्त भावोंका सिन्धु है, उसकी एक बूँद भी ब्रह्माजी जैसे ऐश्वर्य-भावके भक्त नहीं पा सकते। परन्तु महाप्रभु ऐसे दयालु अवतार हैं, जिन्होंने अहैतुककृपावश इस धनका संसार भरमें दान किया है। उन जैसा महान् दाता जगत्में और कोई नहीं है, इसलिये उनके दिव्य-गुणोंका कौन वर्णन कर सकता है ? ॥ 82 ॥

श्रीचैतन्य-आनुगत्यके बिना कृष्णसेवा-प्राप्ति असम्भव :— कहिबार कथा नय, कहिले केह ना बुझय, ऐछे चित्र चैतन्येर रङ्ग। सेइ से बुझिते पारे, चैतन्येर कृपा याँरे, हय ताँर दासानुदास-सङ्ग॥ 83 ॥

अनुवाद— कृष्णप्रेमके जो भाव महाप्रभु दिखला रहे हैं, उनकी चर्चा साधारण लोगोंमें नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वे उन्हें समझ नहीं सकते। महाप्रभुकी ऐसी अद्भुत लीलाएँ हैं। यदि कोई इसे समझ सकता है, तो यह निश्चय जानना चाहिये कि वह महाप्रभुका कृपापात्र है जिसे उन्होंने अपने दासके दासका सङ्ग दिया है॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— इस राधानुगत भावतत्त्वमें


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[ 2/83-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधारण लोगोंका अधिकार नहीं है। अयोग्यपात्रसे ये भाव कहनेसे वे 'सहजिया', 'बाउल' आदि लोगोंके विकृत भावोंकी भाँति इनका रूपान्तर ग्रहण करेंगे। पाण्डित्यका अभिमान रखनेवाले व्यक्ति भी इस रसत्तत्त्वमें प्रवेश करने योग्य नहीं हैं॥83॥ श्रीदामोदर स्वरूप और श्रीरघुनाथसे भक्तोंके द्वारा महाप्रभुके भावोंका श्रवण :- चैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तेंहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताँहा किछु ये शुनिलुँ, ताँहा इँहा विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे ॥ 84 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी लीलाएँ समस्त रत्नोंकी शिरोमणि हैं जो श्रीस्वरूप दामोदरके भण्डारमें रखी हैं। श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको इन लीलाओंकी व्याख्या की थी। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके द्वारा कण्ठस्थ उन लीलाओंमें जो कुछ मैंने (ग्रन्थकार) सुनी हैं, उन्हींका यहाँ विस्तारसे वर्णन किया है और यह भक्तोंके निमित्त भेंट है॥84॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुकी शेषलीलाको सूत्ररूपमें अपने कड़चामें लिखा था और उसे श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके कण्ठमें रखा था, अर्थात् उन्हें कण्ठस्थ करावकर श्रीकृष्णदास कविराजके द्वारा जगत्में इनका प्रचार करवाया। इसलिये श्रीस्वरूप दामोदरका कड़चा पृथक् पुस्तकके रूपमें नहीं लिखा गया है। यह श्रीचैतन्यचरितामृत ही श्रीस्वरूप दामोदरके कड़चाका निष्कर्ष है॥84॥ अनुभाष्य- 'भेटे'- उपहार ॥84॥ ग्रन्थकार की निरपेक्षता :- यदि केह हेन कय, ग्रन्थ कैल श्लोकमय, इतर-जने नारिबे बुझिते। प्रभुर येइ आचरण, सेइ करि वर्णन, सर्व-चित्त नारि आराधिते ॥ 85 ॥ अनुवाद-यदि कोई कहे कि इस ग्रन्थमें अनेक संस्कृतके श्लोक हैं जिन्हें साधारण लोग नहीं समझ सकते, तो मेरा यह कहना है कि महाप्रभुकी लीलाएँ जैसी हैं [और उन्होंने जिन श्लोकोंका पाठ किया है], मैंने उनका वैसा ही वर्णन किया है। मैं सभीके मनको प्रसन्न करनेके लिये महाप्रभुकी लीलाओंको तोड़-मरोड़कर नहीं लिख सकता॥85॥ अनुभाष्य-(श्रीकृष्णदास कविराजके भाव) श्रीगौरसुन्दरके चरित्रका यथायथ (अर्थात् जैसा है, वैसा) वर्णन करते हुए मैंने सभी मतवादियोंकी प्रशंसाका पात्र बननेकी इच्छा नहीं की है। वे लोग मेरी निन्दा करेंगे, यह विचार करके यहाँ महाप्रभुके चरित्रकी वास्तविक कथा न लिखकर कुछ अंशोंका वर्जन (त्याग) या वर्द्धन या आवरण (ढकना) या शोधन नहीं किया। इस ग्रन्थमें संस्कृत श्लोकोंको सम्मिलित करनेसे अनेक लोग तर्क कर सकते हैं कि संस्कृत न जाननेवाले लोग श्लोकोंके वास्तविक भावार्थको नहीं समझ सकेंगे ॥85॥ नाहि काँहा सविरोध, नाहि काँहा अनुरोध, सहज वस्तु करि विवरण। यदि हय राग Florist, ताँहा हये आवेश, सहज वस्तु ना याय लिखन ॥ 86 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहीं भी किसी वस्तु अथवा व्यक्ति विशेषके विचारोंके न तो विरोध अथवा अनुरोधके प्रभावमें कुछ लिखा है। केवलमात्र महाप्रभुकी लीला और सिद्धान्तको सहज रूपसे जैसा मैंने श्रेष्ठ वैष्णवोंके मुखसे सुना है, वैसा ही लिखा है। यदि किसीसे मेरा रागका उद्देश्य होगा, तो मेरा उसमें आवेश होगा और मैं उन्नत भक्तोंके मुखसे श्रवण की गयी वाणीको यथायथ (जैसी है, वैसी) नहीं लिख पाऊँगा ॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे इस ग्रन्थमें कहीं भी किसीके भी सिद्धान्तका विरोध नहीं है, अथवा अन्य 76 ।

दूसरा अध्याय 2/86-89 ] किसी व्यक्तिके मतके प्रति अनुरोध भी नहीं है। मैंने सहजतत्त्व विचार करके लिखा है। जीवके लिये रागतत्त्व ही सहज है, परन्तु विचारतत्त्व सहज नहीं है। रागतत्त्वसे जो उदित होता है, वही श्रीमहाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित भजनतत्त्व है। यदि किसी अन्यके मतसे या अन्य प्रकार तर्कसिद्धान्तसे रागका उद्देश्य हो, तो उसमें आविष्ट होकर निरपेक्षता दूर हो जाती है; इसलिये जीवका स्वतःसिद्ध सहजत्व लिखा नहीं जाता है॥86॥ मध्यलीला दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-इस ग्रन्थमें किसी वस्तुकी अपेक्षा करके मैंने किसीके साथ विरोध या किसीके साथ अनुरोधके वशीभूत होकर कुछ नहीं लिखा है; मैंने केवलमात्र सहज-वस्तुका विवरण लिखा है। जिसमें महाप्रभुके प्रति राग हो जाय और उसमें आविष्ट हो जाय, तो वह सभी लिखित वर्णनके अर्थोंको सहज ही समझ लेगा। सहज वस्तु रागानुगजनोंके द्वारा ही अनुभव करनेकी वस्तु है। इस प्रकार लिखी लेखनी रागमें आविष्ट व्यक्तिके हृदयमें स्फुरित होगी; रागहीन व्यक्ति उस लेखनीमें उस प्रकार प्रवेश नहीं कर पायेंगे। सहज वस्तु अनुभव करनेकी वस्तु है। पाठान्तरमें—'यदि हय राग-द्वेष', उसका अर्थ इस प्रकार है—'यदि कृष्णसेवाका परित्याग करके कृष्णसे इतर वस्तुमें अनुराग अर्थात् अभिनिवेश एवं द्वेष या विराग आकर किसीको आविष्ट करेगा, तो उसके द्वारा शुद्धात्माके सहज अप्राकृत कृष्णप्रेमके विषयमें कुछ भी वर्णन करना सम्भव नहीं होगा॥86॥ अनुवाद-महाप्रभुके चरितको यदि कोई प्रारम्भिक अवस्थामें नहीं समझ पाये, तो भी इसे बार-बार श्रवण करनेसे धीरे-धीरे समझमें आने लगेगा। महाप्रभुका अद्भुत चरित श्रवण करनेसे श्रोताके हृदयमें कृष्णप्रेम उदित होगा। तब वह श्रीराधा-कृष्णकी लीलाके मधुररसकी रीतिको समझ सकेगा। इसलिये इसको बार-बार श्रवण करो, इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा॥87॥ संस्कृत भाषामें लिखित भागवतके साथ उपमा :- भागवत-श्लोकमय, टीका तार संस्कृत हय, तबु कैछे बुझे त्रिभुवन। इँहा श्लोक दुइ चारि, तार व्याख्या-भाषा करि, केने ना बुझिबे सर्वजन ॥ 88 ॥ अनुवाद-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतम् संस्कृतके श्लोकोंके द्वारा रचित है और उसकी टीकाएँ भी संस्कृतमें हैं, तो जगत्के लोग उसे कैसे समझ लेते हैं? इस ग्रन्थमें मैंने कहीं-कहीं ही श्लोक लिखे हैं और उसकी व्याख्या भी सरल भाषामें दी है, तब सभी उसे क्यों नहीं समझ सकेंगे ? ॥ 88 ॥ अनुभाष्य-पयर संख्या 85में वादियोंके वादके सम्बन्धमें मेरा यह कहना है—'श्रीमद्भागवत-ग्रन्थमें सभी श्लोक संस्कृतमें हैं; उसकी सभी व्याख्याएँ भी संस्कृत भाषामें लिखी गयी हैं। यदि उसे त्रिभुवनके लोग समझकर कृष्णभक्ति लाभ करते हैं, तब इस चैतन्यचरितामृतमें मैंने जो दो-चार संस्कृतके श्लोक उद्धृत करके उनकी बङ्गला कवितामें व्याख्या भी की है, उसे सभी गौरभक्त क्यों नहीं समझ सकेंगे ? ॥ 88 ॥ श्रद्धापूर्वक चैतन्यलीला श्रवणके फलस्वरूप कृष्णप्रीतिका उदय :- येबा नाहि जाने केह, शुनिते शुनिते सेह, कि अद्भुत चैतन्यचरित। कृष्ण उपजिबे प्रीति, जानिबे रसेर रीति, शुनिलेइ बड़ हय हित ॥ 87 ॥ महाप्रभुकी शेषलीला-वर्णन करनेकी इच्छा :- शेष-लीलार सूत्रगण, कैलुँ किछु विवरण, इँहा विस्तारिते चित्त हय। थाके यदि आयु-शेष, विस्तारिब लीला-शेष, यदि महाप्रभुर कृपा हय ॥ 89 ॥ । 77

[ 2/89-94 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা अनुवाद—मैंने शेषलीलाका सूत्ररूपमें कुछ वर्णन किया है और अब मेरी यह इच्छा है कि मैं विस्तारसे इसका वर्णन करूँ। यदि मेरा जीवन रहा और मेरे सौभाग्यसे महाप्रभुकी कृपा हुई, तो मैं शेष लीलाको विस्तारसे कहूँगा॥89॥ ग्रन्थकारका अपनी अयोग्यता और दैन्य ज्ञापन :- आमि वृद्ध जरा Provideतुर, लिखते काँपये कर, मने किछु स्मरण ना हय। ना देखिये नयने, ना शुनिये श्रवणे, तबु लिखि-ए बड़ विस्मय॥90॥ अनुवाद—मैं वृद्ध हो गया हूँ और चलने-फिरनेमें असमर्थ हूँ। जब मैं लिखता हूँ, तो मेरे हाथ काँपते हैं। मुझे कुछ स्मरण भी नहीं रहता है और न ही मैं ठीकसे देख और सुन पाता हूँ। तो भी मैं लिख रहा हूँ, यह बहुत बड़ा आश्चर्य है॥90॥ महाप्रभुकी दिव्योन्मादात्मक अन्त्यलीला ही गौरभक्तोंके लिये नित्य आलोच्य :- एइ अन्त्यलीला-सार, सूत्रमध्ये विस्तार, करि’ किछु करिलुँ वर्णन। इहा-मध्ये मरि यबे, वर्णिते ना पारि तबे, एइ लीला भक्तगण-धन॥91॥ अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाके सारका सूत्रोंके मध्य कुछ विस्तार करके वर्णन किया है। यदि मैं इसे विस्तार करते हुए बीचमें ही देह त्याग दूँगा, तो भी सूत्ररूपमें यह लीला भक्तोंके लिये दिव्य निधि होगी॥91॥ अभी संक्षेपमें और बादमें विस्तारकी इच्छा :- संक्षेपे एइ सूत्र कैल, येइ इँहा ना लिखिल, आगे ताहा करिब विचार। यदि तत दिन जिये, महाप्रभुर कृपा हये, इच्छा भरि’ करिब विस्तार॥92॥ अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें कहा है। इस लीलाके विषयमें जो कुछ मैंने नहीं कहा है, आगे उसपर विचार करके लिखूँगा। यदि महाप्रभुकी कृपासे मैं उतने दिनों तक जीवित रहूँगा, तो मन भरके इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥92॥ भक्तों की वन्दना और श्रौतपन्थामें अवस्थान :- छोट बड़ भक्तगण, वन्दों सबार-चरण, सबे मोरे करह सन्तोष। स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत, ताइ लिखि, नाहि मोर दोष॥93॥ अनुवाद—मैं कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम भक्त, सभीके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ कि वे मुझसे सन्तुष्ट हों। मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा, उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई दोष नहीं है॥93॥ अनुभाष्य—‘भजनविज्ञ’ (भजनमें दक्ष), ‘भजनशील’ और ‘कृष्णनाममें दीक्षित कृष्णनामकारी’—ये तीन प्रकारके छोटे-बड़े भक्त हैं, सभी मुझपर कृपा करें। कनिष्ठ भक्तोंकी तर्क करनेमें रुचि होती है। वे सिद्धान्त नहीं जानते हैं, परन्तु अपनेको रसिकभक्त मानते हैं। मैंने लीलाके साथ सिद्धान्तको भी लिखा है, परन्तु कहीं ये कनिष्ठ भक्त इसे मेरा पाण्डित्य, भक्तिहीनता और कुतर्कमें निष्ठाका फल मानकर मुझे दोषी समझकर मुझपर कृपा न करें, इस आशङ्कासे मैं विनीत-भावसे निवेदन कर रहा हूँ कि मैं इस विषयमें स्वतन्त्र नहीं हूँ। मैं जिनके चरणकमलोंमें बिका हुआ हूँ, उन श्रीरूप-रघुनाथ-श्रीदामोदरस्वरूपसे जो श्रीगौरलीला-तत्त्व मैंने जाना है, उसीको मैंने लिखा है॥93॥ पञ्चतत्त्व, गुरुवर्ग और हरिदास-पण्डितकी वन्दना :- श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्तवृन्द, शिरे धरि सबार चरण। 78

दूसरा अध्याय 2/94-95 ] स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण, धूलि करों मस्तके भूषण ॥ 94 ॥ पाञा याँर आज्ञाधन, व्रजेर वैष्णवगण, वन्दों ताँर मुख्य हरिदास। चैतन्यविलास-सिन्धु- कल्लोलेर एक बिन्दु, तार कणा कहे कृष्णदास ॥ 95 ॥ गोस्वामी आदि भक्तोंके श्रीचरणोंकी धूलिको अपने मस्तकका भूषण बनाना चाहता हूँ। इस प्रकार मैं उनकी कृपाकी वाञ्छा करता हूँ। इन सभीकी और व्रजके सभी वैष्णवों, विशेषकर श्रीहरिदास पण्डित (श्रीगोविन्ददेवजीके पुजारी) की आज्ञा पाकर मैं, कृष्णदास, श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला-विलासके समुद्रकी लहरकी एक बिन्दुके एक कणको कह रहा हूँ॥ 94-95 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अन्त्यलीला सूत्रकथने प्रेमोन्माद-प्रलापवर्णनं नाम द्वितीय-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीलामें अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें प्रेमोन्माद-प्रलाप-वर्णन नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त। अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतादि भक्तोंके चरणकमलोंको अपने शीशपर धारण करनेकी अभिलाषा करता हूँ। मैं श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथ अनुभाष्य—आदिलीला 8/49-60 संख्या देखें ॥ 95 ॥ दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। । 79

तीसरा अध्याय कथासार-कटोया-ग्राममें संन्यास ग्रहणके बाद तीन दिनोंतक राढ़देशमें भ्रमण करते-करते महाप्रभुका श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चतुराईसे शान्तिपुरके पश्चिम पारमें आगमन हुआ। महाप्रभुने गङ्गाको यमुना समझकर उनकी स्तव-स्तुति की। उसके बाद श्रीअद्वैतप्रभु नौका लेकर आये और महाप्रभुको स्नान करवाकर उन्हें अपने घर ले आये। वहाँपर नवद्वीप धामवासियों और श्रीशचीमाताके साथ महाप्रभुका मिलन हुआ। उनके साथ मिलनेके बाद शचीमाताने भोजन बनाया। जब महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु भोजन कर रहे थे, तब श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ श्रीअद्वैतप्रभुका नाना प्रकारसे कौतुक हुआ। दोपहरके बाद भक्त समुदायके साथ सङ्कीर्तन होने लगा। इस प्रकार वहाँ कुछ दिन बीतनेके बाद भक्तोंनें शचीमाताके साथ परामर्श करके महाप्रभुसे नीलाचलमें रहनेका अनुरोध किया। महाप्रभुने उसे स्वीकार करके श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीदामोदर पण्डितको साथ लिया तथा शान्तिपुरके भक्तों और शचीमातासे विदायी लेकर छत्रभोग मार्गसे श्रीपुरुषोत्तमकी यात्रा की। -(अमृतप्रवाहभाष्य) संन्यास लेते ही भ्रमण करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :- न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ गौरो वृन्दावनं गन्तुमना भ्रमाद् यः। राढ़े भ्रमन् शान्तिपुरीमयित्वा ललास भक्तैरिह तं नतोऽस्मि ॥ १ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - संन्यास ग्रहण करनेके बाद श्रीकृष्णप्रेममें वृन्दावन जानेकी इच्छा करनेपर भी भ्रान्तचित्तके कारण राढ़देशमें भ्रमण करते-करते शान्तिपुर पहुँचकर भक्तोंसे भेंट करके हर्षित हुए श्रीगौरचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य- यः गौरः (विश्वम्भरः) न्यासं (तुर्याश्रमं) विधाय (वेदविहित-संन्यास-संस्कारादिकं गृहीत्वा) उत्प्रणयः (प्रेमाकृष्टः सन्) वृन्दावनं गन्तुमनाः (व्रजगमनोत्सुकमानसः) भ्रमात् (प्राकृतनेत्रेषु भ्रमं प्रदर्शनात्, प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्ति-विलोचनपदं कृष्णधाम प्राकृतचेष्टया दुर्लभं शुद्धभजनलभ्यं चेति प्रदर्शयन्) राढ़े (गङ्गायाः पश्चिमे राष्ट्र (गत्वा) इह (अस्मिन् शान्तिपुर्यां) भक्तैः सह ललास, तं गौरं नतोऽस्मि। श्लोक भावानुवाद-जिन विश्वम्भरने वैदिक नियमानुसार संन्यास ग्रहण किया और श्रीकृष्णप्रेममें विह्वल होकर वृन्दावन जानेकी इच्छा की, किन्तु प्रेमावेशमें भ्रमवश राढ़देशमें भ्रमण करते हुए शान्तिपुर पहुँच गये और वहाँ भक्तोंसे मिलकर आनन्दित हुए, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ। (श्रीकृष्णधामकी प्राप्ति केवल प्रेमरूपी अञ्जनसे रञ्जित भक्तिनेत्रोंके द्वारा ही सम्भव है। प्राकृत चेष्टासे इसका पाना अति दुर्लभ है। जड़ीय नेत्र और जड़ीय चेष्टा केवल भ्रम ही उत्पन्न करते हैं, वास्तव वस्तुका दर्शन नहीं, महाप्रभुकी लीला इसी सत्यको दिखानेके लिये हुई)। 'राढ़े'-गङ्गाका पश्चिम प्रदेश ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो; श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो तथा समस्त गौरभक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ । 81

[ 3/3-4 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चौबीस वर्षके अन्तमें महाप्रभुका संन्यास-ग्रहण :- चब्बिश वत्सर शेष येइ माघ-मास। तार शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास ॥ ३ ॥ अनुवाद—चौबीस वर्षके अन्तमें माघ मासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया ॥ ३ ॥ त्रिदण्डि भिक्षुकका गीत पढ़ते हुए महाप्रभुका राढ़देशमें तीन दिन तक भ्रमण :- संन्यास करि' प्रेमावेशे चलिला वृन्दावन। राढ़-देशे तिन दिन करिला भ्रमण ॥ ४ ॥ अनुवाद—संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु प्रेमके आवेशमें वृन्दावनकी ओर चले, परन्तु वे तीन दिनोंतक राढ़देशमें ही भ्रमण करते रहे ॥ ४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राढ़देश'—'राष्ट्र' बना है। गङ्गाके पश्चिमपार गौड़-भूमिको 'राढ़देश' कहते हैं; इसका एक नाम 'पौण्ड्र' पौण्ड्र राजधानी थी ॥ ४ ॥ अमृताणुकणा—(जावालोपनिषत्)— “यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।” अर्थात् 'जिस दिन कोई संसारसे विरक्त होगा, उसी दिन वह प्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करेगा।' यह बात श्रीमद्भागवत (1/13/27)में और अधिक स्पष्ट रूपसे कहा गयी है— “यः स्वकात् परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्। हृदि कृत्वा हरिं गेहात् प्रव्रजेत् स नरोत्तमः॥” अर्थात् “जो आत्मज्ञ-व्यक्ति अपने विवेकसे अथवा दूसरोंके उपदेशोंको सुनकर संसारको दुःखपूर्ण समझकर श्रीहरिको अपने हृदयमें धारण करके गृह त्याग करके संन्यास ग्रहण करते हैं, वे नरोत्तम (मनुष्योंमें उत्तम) हैं।” इस प्रकार शास्त्रोंमें संन्यास ग्रहण और अधिकारके विषयमें कहा गया है। पुराणोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीमद्भागवत, याज्ञवल्क्य यति-प्रकरण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, हारित-संहिता, संवर्त्त-संहिता, दक्ष-संहिता, मनु-संहिता आदि विविध शास्त्रोंमें त्रिदण्ड-संन्यासकी विधिका वर्णन है। किन्तु तो भी कोई-कोई, “अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्। देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत्॥” —इस ब्रह्मवैवर्त्त-पुराणके वाक्यके अनुसार कहते हैं कि कलियुगमें संन्यास ग्रहण करना वर्जित है। समस्त वेद-इतिहास-पुराण जिनके श्वाससे प्रकाशित हुए हैं, उनके भी जो अंशी हैं, वे सर्वावतारी स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने कलियुगमें अवतरित होकर चतुर्थ आश्रमरूप संन्यासको ग्रहण करके महाभारतमें कहे गये विष्णुसहस्रनामके अन्तर्गत अपने 'संन्यासकृत्' नामको सार्थक किया। इसलिये उपरोक्त पुराण वाक्यका तात्पर्य अन्य प्रकारसे ग्रहण करना चाहिये। “कलियुगमें संन्यास वर्जित है, ऐसा कहनेका भाव यह है—आचार्य-शङ्करके द्वारा प्रवर्त्तित 'सोऽहं', 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि अवैध चिन्तनसे उत्पन्न एकदण्ड संन्यास कभी भी ग्रहण करनेके योग्य नहीं है; इसलिये संन्यासको निषिद्ध कहा गया है। त्रिदण्ड संन्यास ही वास्तविक सनातन चतुर्थ आश्रम है। यह सदा ही ग्रहण योग्य है, कभी भी निषिद्ध नहीं है। त्रिदण्ड-संन्यास किसी-किसी समय बाहरसे एकदण्डाकारमें भी देखा जाता है। इस श्रेणीके एकदण्डी संन्यासी महाजन 'सेव्य-सेवक-सेवा'-रूप त्रिदण्डका नित्यत्व स्वीकार करके शङ्कर-प्रवर्त्तित 'एकदण्ड'-संन्यासको सभी प्रकारसे अवैध जानकर ग्रहण करनेके अयोग्य मानते हैं। इसलिये (रघुनन्दन)-स्मार्त्ताचार्यके द्वारा संग्रहीत उक्त वचनोंके बलपर भी निवृत्तिपथके साधकोंके पक्षमें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करना ही उक्त प्रमाणका तात्पर्य है।” (—त्रिदण्डीस्वामी श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज) श्रीचैतन्यभागवत (मध्यखण्ड 28/154-159)के पाठसे यह जाना जाता है कि श्रीगौरसुन्दरने शङ्कर-सम्प्रदायके 82 ।

तीसरा अध्याय 3/4-6 ] एकदण्डी संन्यासी श्रीमत् केशव-भारतीसे संन्यास ग्रहणके समय पहले श्रीकेशव-भारतीके कानमें संन्यास-मन्त्र प्रदान करके उनको संन्यास प्रदान किया या परात्मनिष्ठामें परिनिष्ठित किया था। उसके बाद उनसे महाप्रभुने अपने द्वारा दिये हुए संन्यास-मन्त्रको ग्रहण किया। “सर्व-शिक्षागुरु-गौरचन्द्र वेदे बले। केशव-भारती-स्थाने ताहा कहे छले॥ 154॥ प्रभु कहे,-'स्वप्ने मोर कोन महाजन। कर्णे संन्यासेर मन्त्र करिल कथन॥ 155॥ बूझ देखि ताहा तुमि हय किंवा नहे।' एत बलि' प्रभु तार कर्णे मन्त्र कहे॥ 156॥ छले प्रभु कृपा करि' तारे शिष्य कैल। भारतीर चित्ते महा-विस्मय जन्मिल॥ 157॥ प्रभुर आज्ञाय तबे केशव भारती। सेइ मन्त्र प्रभुरे कहिला महामति॥” 159॥ अर्थात् “समस्त वेद श्रीगौरचन्द्रको 'सर्व-शिक्षागुरु' कहते हैं। उन्होंने श्रीकेशव-भारतीसे छलसे कहा, - 'स्वप्नमें किसी महाजनने मेरे कानमें यह संन्यास-मन्त्र दिया। देखो, आप इसे समझ पाते हो अथवा नहीं।' यह कहकर महाप्रभुने उनके कानमें मन्त्र कहा। छलसे महाप्रभुने उनपर कृपा करके उन्हें अपना शिष्य बना लिया। यह मन्त्र सुनकर श्रीभारतीके हृदयमें बड़ा विस्मय हुआ और महाप्रभुकी आज्ञासे तब श्रीकेशव भारतीने वही मन्त्र उनको प्रदान किया।” इस प्रकार स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने शाङ्कर- संन्यासको अस्वीकार करके श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्ड- संन्यास ग्रहणका ही दृष्टान्त स्थापित किया। उन्होंने उपरोक्त 'अश्वमेधं---' संन्यास निषेध करनेवाले पुराण- वाक्यके तात्पर्यको प्रकाशित करते हुए शास्त्रीय संन्यास-विधिकी परम सार्थकता स्थापित की। संन्यास ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्डी- भिक्षु-गीतका कीर्तन करते हुए वृन्दावनकी ओर गमनकी लीला की। इसके द्वारा महाप्रभुने संन्यास ग्रहण करनेके तात्पर्य और त्रिदण्ड ग्रहणकर वृन्दावनधाम जानेकी विधिको प्रकाश किया। मनुसंहिता (12/10)— “वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च। यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते॥” अर्थात् “जिसकी बुद्धिमें ये तीन-वाणीपर नियन्त्रण (वाग्दण्ड), मनपर नियन्त्रण (मनोदण्ड) और देहपर नियन्त्रण (कायदण्ड) दृढ़तासे स्थित हैं, उसे ही (वास्तविक) त्रिदण्डी कहा जाता है।” इसलिये वाग्दण्ड, मनोदण्ड और कायदण्ड-ग्रहणरूप त्रिदण्ड-विचारको अस्वीकार करनेसे जीव जिह्वा-मन-कायको अपने नियन्त्रणमें रखनेके स्थानपर उनके अधीन रहेगा। ऐसी अनियन्त्रित इन्द्रियाँ व्यक्तिको व्यभिचारमें प्रवृत्त होनेके लिये बाध्य करेंगी और वह केवल मायाके चङ्गुलमें ही फंसा रहेगा। ऐसा मायाबद्ध जीव श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रदर्शित श्रीकृष्णसे विरहका कैसे अनुभव करेगा? अर्थात् वह विप्रलम्भात्मक (विरहमें) भजनमें कभी भी अधिकार नहीं प्राप्त कर सकता। (आदिलीला 3/20)— “आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे।” अर्थात् “महाप्रभुने स्वयं आचरण करके सभीको भक्तिकी शिक्षा दी।” सर्वलोकगुरु श्रीगौरसुन्दरकी यह त्रिदण्डसंन्यास- ग्रहणलीला एकमात्र उत्तमा-भक्तिकी प्राप्तिके इच्छुक साधक जीवोंके लिये एक विशेष उदाहरण स्थापित करनेके लिये ही हुई, किन्तु कलिसे प्रभावित जीव इसे समझ नहीं पाते॥ 4॥ एइ श्लोक पड़ि' प्रभु भावेर आवेशे। भ्रमिते पवित्र कैल सब राढ़-देशे॥ 5॥ अनुवाद—महाप्रभुने राढ़देशमें भ्रमण करते हुए उसे पवित्र कर दिया और भावावेशमें एक श्लोक पढ़ा॥ 5॥ श्रौतपन्था-अनुसरणसे ही त्रिदण्डिभिक्षुकी सिद्धि-प्राप्तिकी आशा :- (श्रीमद्भागवत 11/23/57 श्लोक)— एतां समास्थाय परात्म- निष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः। अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव॥ 6॥ 83