भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 924

[ 2/72-73 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्थात् “चित्त सात्त्विक भाव प्राप्त करनेपर चञ्चल मनको प्राणमें समर्पण कर देता है, उससे प्राण भी विकार प्राप्त होनेपर देहको क्षुब्ध करते हैं। तब भजनशीलकी देहपर स्तम्भादि सात्त्विक भावोंका उदय होता है। प्राण पञ्चभूतोंमेंसे भूमिपर स्थित होनेसे ‘स्तम्भ’ विकार होता है। हर्ष, भय, विस्मय, विषाद और क्रोधसे स्तम्भ उत्पन्न होता है। स्तम्भमें वाणी-हस्त-पादादिका चेष्टारहित होना, निश्चलता एवं शून्यताके कारण अन्य इन्द्रियोंकी क्रियाओंका स्थगित होना लक्षण प्रकाशित होते हैं। स्तम्भ मनकी एक विशेष अवस्थाका नाम है। वाक्यादि रहित देहमें उत्पन्न विकार बाहरमें और अन्तरमें व्याप्त होकर अवस्थान करते हैं। ये विकार पहले सूक्ष्म देहमें अवस्थित होते हैं और बादमें स्थूल देहमें अवस्थित होते हैं। वाक्यादि-हीनता कर्मेन्द्रियोंकी और शून्यता ज्ञानेन्द्रियोंकी क्रियारहित होनेके ज्ञापक हैं।” ‘कम्प’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “वित्रासामर्षहर्षाद्यैर्वेपथुर्गात्रलौल्यकृत्॥” अर्थात् “विशेष भय, क्रोध और हर्षादिके द्वारा शरीरमें जो चञ्चलता उत्पन्न होती है, उसे ‘वेपथु’ या ‘कम्प’ कहते हैं।” ‘वैवर्ण्य’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “विषादरोषभीत्यादेर्वैवर्ण्यं वर्णविक्रिया। भावज्ञैरत्र मालिन्यकार्श्याद्याः परिकीर्त्तिताः॥” अर्थात् “विषाद, क्रोध और भयादिसे शरीरमें वर्ण-विकारको ‘वैवर्ण्य’ कहते हैं। वैवर्ण्यसे देहमें मलिनता और कृशतादि होती है।” ‘अश्रु’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “हर्षरोषविषादाद्यैरश्रु नेत्रे जलोद्गमः। हर्षजेऽश्रुणि शीतत्वमौष्ण्यं रोषादि सम्भवे। सर्वत्र नयनक्षोभ-रागसंमार्जनादयः॥” अर्थात् “हर्ष, क्रोध और विषादादिके द्वारा बिना प्रयत्नके नेत्रोंमें जो जल-भर आता है, उसे ‘अश्रु’ कहते हैं। हर्षजनित अश्रुओमें शीतलता और क्रोधादिजनित अश्रुओंमें उष्णता लक्षित होनेपर भी सभी अश्रुओंमें नेत्रोंकी चञ्चलता, लालिमा और उनका पोंछनाादि देखा जाता है।” ‘स्वेद’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “स्वेदो हर्षभयक्रोधादिजः क्लेदकरस्तनोः॥” अर्थात् “हर्ष, भय और क्रोधादिसे उत्पन्न जो शरीरमें क्लेद (पसीना) आता है उसको ‘स्वेद’ कहते हैं।” ‘गद्गद’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “विषादविस्मयामर्षहर्षभीत्यादिसम्भवम्। वैस्वर्यं स्वरभेदः स्याद्देश गद्गदिकादिकृत्।” अर्थात् “विषाद, आश्चर्य, क्रोध, आनन्द और भयादिसे ‘स्वरभेद’ या ‘वैस्वर्य’ होता है। इस स्वरभेदमें वाणी गद्गद हो जाती है।” ‘पुलक’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)— “रोमाञ्चोऽयं किलाश्चर्यहर्षोत्साहभयादिजः। रोम्णामभ्युद्गमस्तत्र गात्रसंस्पर्शनादयः॥” अर्थात् “विस्मय, हर्ष, उत्साह और भयादिसे रोम खड़े होनेसे ‘पुलक’ या ‘रोमाञ्च’ होता है और शरीरमें किसी वस्तुके स्पर्श जैसा अनुभव होने लगता है॥”72॥ महाप्रभुको कृष्णदर्शनका भ्रम :— मूर्च्छाय हैल साक्षात्कार, उठि’ करे हुहुङ्कार, कहे—एइ आइला महाशय। कृष्णेर माधुरी-गुणे, नाना भ्रम हय मने, श्लोक पड़ि’ करये निश्चय॥ 73 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको मूर्च्छित अवस्थामें श्रीकृष्णका साक्षात्कार हुआ। वे आनन्दमें भरकर सहसा उठे और जोरसे हुङ्कार करके कहने लगे,—‘ये महाशय (श्रीकृष्ण) आये हैं।’ श्रीकृष्णकी माधुरी और गुणोंके प्रभावसे उनका मन अनेक प्रकारसे भ्रमित होने लगा और वे एक श्लोक पढ़कर श्रीकृष्णकी उपस्थितिको निश्चित करने लगे॥ 73 ॥ 72 ।