श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 925, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/74-76 ] श्रीकृष्णकर्णामृतमें (68) बिल्वमङ्गल-वाक्य :- मारः स्वयं नु मधुरद्युतिमण्डलं नु माधुर्यमेव नु मनो नयनामृतं नु। वेणीमृजो नु मम जीवितवल्लभो नु कृष्णोऽयमभ्युदयते मम लोचनाय॥ 74 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! साक्षात् कन्दर्पस्वरूप, द्युतिसमूहके माधुर्यस्वरूप, मूर्त्तिमान् माधुर्यस्वरूप, मन-नयनके अमृतस्वरूप, गोपियोंके (वेणी-मोचनकारी) आनन्दस्वरूप, मेरे प्राणवल्लभस्वरूप, साक्षात् नन्दनन्दन ही हैं, जो मेरे दर्शनपथपर प्रकट हुए हैं॥ 74 ॥ अनुभाष्य— मारः (कन्दर्पः) नु (किं) स्वयं नु (वितर्के) मधुरद्युतिमण्डलं (हृत्स्पर्शि सुन्दरस्निग्धज्योतिर्बिम्बं) नु (किं न) तत् माधुर्यम् एव नु (किं), मनोनयानामृतं (हृदयनेत्रसुधास्वरूपः) नु (किं), वेणीमृजः (वेण्युन्मोचनकारी) नुः (किं) अयं जीवितवल्लभः (कृष्णः) मम लोचनाय (लोचनसुखदातुं) अभ्युदयते (मत्सन्निधौ प्रकटयति)। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि! क्या साक्षात् कामदेव यहाँ आये हैं? नहीं, क्या ये पुरुष हृदयस्पर्शि सुन्दर-स्निग्ध ज्योतिर्बिम्ब हैं? अथवा क्या मूर्त्तिमान माधुर्य हैं? अथवा क्या मेरे मन-नयनोंके अमृतस्वरूप हैं? क्या ये गोपियोंके वेणी-मोचनकारी कान्त हैं? अथवा क्या ये मेरे जीवन-वल्लभ कृष्ण हैं, जो मेरे नयनोंको आनन्द प्रदान करनेके लिये मेरे दृष्टिपथपर प्रकट हुए हैं?॥ 74 ॥ अमृतानुकणिका—'श्रीकृष्णका दर्शन मेरे भाग्यमें नहीं हैं'—इस प्रकार सखियोंके साथ बात करते-करते अकस्मात् श्रीकृष्णको दूरसे देखकर विरहमें व्याकुल राधाजी कहने लगीं,—'मारः स्वयं नु', हे सखियों! जो अदृश्य रहकर भी जगत्को मारते हैं, वे 'मार' अर्थात् कन्दर्प क्या स्वयं आये हैं?' 'नु'—शब्दका अर्थ वितर्क से है। पुनः माधुर्य अनुभव करके आश्चर्यसहित बोलीं, —'कन्दर्प इस प्रकार मधुर नहीं हो सकता, तो क्या ये मधुर ज्योतिसमूहके मण्डल हैं?' पुनः अत्यन्त आश्चर्य अनुभव करके कहने लगीं,—'माधुर्य ही क्या साक्षात् मूर्त्तिमान् होकर प्रकट हुआ है?' पुनः मन और नयनोंकी अतिशय तृप्तिसे परम सन्तोषसे कहने लगीं,—'ये क्या मन और नयनोंको तृप्त करनेवाले अमृतस्वरूप हैं?' पुनः अपनी देहको अनुभव करके सम्भ्रमसे कहने लगीं,—'मेरी वेणी खोलनेवाले विदेशसे आये मेरे कान्त हैं क्या?' पुनः सम्पूर्णरूपसे अवलोकन करके आनन्दके साथ बोलीं,—'हे सखियों! ये मेरे प्राणवल्लभ नवकिशोर कृष्ण हैं, जो मेरे नयनोंके आनन्दको वर्धित करनेके लिये आये हैं, तुम सब उनके दर्शन करो।' 'मारः स्वयं नु' आदिसे लेकर 'वेणीमृजः' तक सन्देह ही है। 'मम जीवितवल्लभः कृष्णः अभ्युदयते'—यह निश्चित है। इसलिये यह सन्देहान्त निश्चय अलङ्कार है॥ 74 ॥ श्लोकका अर्थ :- "किवा एइ साक्षात् काम, द्युतिबिम्ब मूर्त्तिमान्, कि माधुर्य स्वयं मूर्त्तिमन्त। किवा मनो-नेत्रोत्सव, किवा प्राणवल्लभ, सत्य कृष्ण आइला नेत्रानन्द॥" 75 ॥ अनुवाद—"क्या ये साक्षात् कामदेव हैं अथवा ज्योतिपुञ्ज मूर्त्तिमान होकर प्रकट हुए हैं? क्या समस्त माधुर्य ही मूर्त्तिमान होकर प्रकट हुआ है? या ये मेरे मन-नेत्रोंके उत्सवस्वरूप हैं? क्या ये मेरे प्राणवल्लभ हैं? ये सचमुच कृष्ण ही हैं जो मेरे नेत्रोंको आनन्द देनेके लिये आये हैं॥" 75 ॥ भावके वशीभूत महाप्रभु :- गुरु—नाना भावगण, शिष्य—प्रभुर तनु-मन, नाना रीते सतत नाचाय। निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, मन्यु, एइ नृत्ये प्रभुर काल याय॥ 76 ॥ । 73