श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 926, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/76–79 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद— निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, क्रोधादि भाव गुरुके समान महाप्रभुके शरीर और मनरूपी शिष्यको अनेक प्रकारसे सदा नचाते। इसी प्रकार उनका सारा समय व्यतीत होता॥ ७६॥ अनुभाष्य— गुरु जिस प्रकार शासन करके शिष्योंको कलाकी शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके हृदयके भाव गुरु बनकर महाप्रभुके श्रीअङ्ग और मनरूपी दो शिष्योंको नाना प्रकारसे नृत्य कराते॥ ७६॥ स्वरूप-रामानन्दके साथ महाप्रभुकी प्रतिदिनकी कार्यावली :— चण्डीदास, विद्यापति, रायेर नाटक–गीति, कर्णामृत, श्रीगीतगोविन्द। स्वरूप–रामानन्द–सने, महाप्रभु रात्रि–दिने, गाय, शुने—परम आनन्द॥ ७७॥ अनुवाद— श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दके साथ महाप्रभु (अपने भावोंके अनुरूप) रात-दिन श्रीचण्डीदास और श्रीविद्यापतिके पद, श्रीराय रामानन्दके जगन्नाथवल्लभ-नाटक, श्रीबिल्वमङ्गलके श्रीकृष्णकर्णामृत और श्रीजयदेव गोस्वामीके श्रीगीतगोविन्दके श्लोक गाते और सुनते परम आनन्दसे समय बिताते॥ ७७॥ अनुभाष्य— 'रायेरे नाटक'—'जगन्नाथवल्लभ' नाटक; 'गीति'— श्रीचण्डीदास, श्रीविद्यापति, श्रीराय रामानन्द, श्री बिल्वमङ्गल और श्रीजयदेव—इनके द्वारा रचित ग्रन्थोंकी पदावलीका गान॥ ७७॥ महाप्रभुके विभिन्न रसाश्रित भक्तगण :— पुरीर वात्सल्य मुख्य, रामानन्देर शुद्धसख्य, गोविन्दाद्येर शुद्धदास्यरस। गदाधर, जगदानन्द, स्वरूपेरे मुख्य रसानन्द, एइ चारि भावे प्रभु वश॥ ७८॥ अनुवाद— श्रीपरमानन्द पुरीका महाप्रभुके प्रति वात्सल्यभाव था। श्रीराय रामानन्दका उनमें शुद्धसख्य-भाव, श्रीगोविन्दादिका उनमें दास्यभाव था। श्रीगदाधर पण्डित, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीस्वरूप दामोदरका महाप्रभुमें मुख्य (मधुर) रसमें प्रेम था। महाप्रभु इन चार भावोंके वशीभूत रहते थे॥ ७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'पुरीर'— श्रीपरमानन्द पुरीका। 'मुख्यरस'— मधुर रस॥ ७८॥ अनुभाष्य— श्रीपरमानन्द पुरीका (व्रजके उद्धवका) वात्सल्य-रसप्रधान भाव, श्रीरामानन्दका (अर्जुन या विशाखाका) शुद्ध सख्यभाव, श्रीगोविन्दादि सेवकोंका शुद्ध दास्यभाव, और अन्तरङ्ग-भक्त श्रीगदाधर, श्रीजगदानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरका मुख्य मधुररस,—इन चार भावोंमें महाप्रभु उनकी भजन-सङ्गसुख-सेवा ग्रहण करके उनके वशीभूत थे॥ ७८॥ महाप्रभुके पक्षमें मधुररसमें महाभाव आश्चर्यजनक नहीं :— लीलाशुक–मर्त्यजन, ताँर हय भावोद्गम, ईश्वरे से–कि इहा विस्मय। ताहे मुख्य–रसाश्रय, हइयाछे महाशय, ताते हय सर्वभावोदय॥ ७९॥ अनुवाद— लीलाशुक (श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुर) यद्यपि मनुष्य थे, तो भी उनके शरीरमें अनेक भावोंके विकार प्रकट होते थे। तो फिर इसमें क्या आश्चर्यकी बात है कि ये भाव स्वयं भगवान् महाप्रभुके शरीरमें उदित हुए। मधुररसके भावोंमें डूबे हुए महाप्रभुकी तो सर्वोच्च स्थिति है, इसलिये सभी प्रकारके भाव उनके शरीरमें दिखायी देते थे॥ ७९॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'लीलाशुक'— श्रीबिल्वमङ्गल गोस्वामी। इनके पूर्व आश्रमका नाम शिहलण मिश्र था और ये दक्षिण भारतके ब्राह्मण थे। गृहस्थ-धर्मका शास्त्रोचित रूपसे पालन करते-करते चिन्तामणि नामक वेश्यासे उपदेश सुनकर इन्हें वैराग्य हो गया और 'शान्तिशतक' नामक ग्रन्थकी रचना की। बादमें श्रीकृष्ण-वैष्णव कृपासे भक्तिलाभ करके इनका नाम 74 ।